हिमाचल प्रदेश में सेब खरीद में घोटाले का आरोप लगाया गया है. शिमला के चिड़गांव खरीद केंद्र में अनियमितताएं मिलने के बाद एफआईआर दर्ज की गई है और एसडीएम स्तर की टीम जांच के लिए राज्य सरकार ने गठित की है. घोटाले के आरोपों में कहा गया है कि खरीद केंद्र से जुड़े अफसरों ने ज्यादा खरीद के बिल दिखाकर पैसा डकार गए हैं. क्योंकि, पिछले साल के समान ही सेब का उत्पादन हुआ है तो खरीद आंकड़े ज्यादा कैसे हो सकते हैं.
हिमाचल सरकार ने शिमला के रोहड़ू में स्थिति चिड़गांव खरीद केंद्र में सेब खरीद मामले में अनियमितताएं मिली हैं. जिसके बाद कई लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. हिमाचल प्रदेश बागवानी उत्पाद विपणन एवं प्रसंस्करण निगम (HPMC) ने एसडीएम और तहसीलदार स्तर के अधिकारियों को मामले की जांच के निर्देश दिए हैं. मामले ने अब तूल पकड़ लिया है और आरोप लगाए गए हैं कि सभी खरीद केंद्रों पर भ्रष्टाचार गया है. पूरी सेब खरीद की जांच की जाए.
40 हजार किसानों से 115 करोड़ का सेब खरीदा
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता संदीपनी भारद्वाज ने हिमाचल प्रदेश सरकार की मंडी मध्यस्थता योजना (MIS) में सामने आ रही गंभीर अनियमितताओं और फर्जीवाड़े की आशंकाओं को लेकर कांग्रेस सरकार पर जोरदार हमला बोला है. उन्होंने कहा कि यह मामला केवल प्रशासनिक चूक का नहीं, बल्कि किसानों के नाम पर सरकारी धन के दुरुपयोग और संभावित बड़े घोटाले की ओर इशारा करता है. एचपीएमसी के अनुसार इस वर्ष लगभग 40 हजार बागवानों ने एमआईएस योजना के तहत सेब दिया है और लगभग 115 करोड़ रुपये की खरीद की गई है.
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जांच कमेटी बनाकर सरकार भ्रष्टाचार छुपाने की कोशिश कर रही
संदीपनी भारद्वाज ने कहा कि सरकारी उपक्रम बागवानी उत्पाद विपणन एवं प्रसंस्करण निगम (HPMC) द्वारा एमआईएस के तहत सेब की खरीद में प्रिक्योरमेंट असिस्टेंट स्तर पर गड़बड़ी सामने आना अत्यंत गंभीर विषय है. सरकार पहले से चली आ रही लापरवाही और विफल निगरानी को अब ढकने की कोशिश कर रही है. सवाल यह उठता है कि जब सेब की खरीद चल रही थी, तब इन कमेटियों की जरूरत क्यों नहीं पड़ी? अब रिपोर्टों का इंतजार कर सरकार समय निकालने का प्रयास कर रही है.
किसानों के दस्तावेज मांगकर उन्हें फंसाने की कोशिश हो रही
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता ने कहा कि एमआईएस की पेमेंट के लिए बागवानों से आधार कार्ड, उद्यान कार्ड और जमीन के दस्तावेज अनिवार्य करना किसानों के साथ सीधा अन्याय है. जब उद्यान कार्ड में पहले ही जमीन, बागवानी क्षेत्र और उत्पादन से जुड़ी समस्त जानकारी दर्ज है, तो बार-बार दस्तावेज मांगकर किसानों को शक के दायरे में क्यों लाया जा रहा है? यह स्पष्ट संकेत है कि सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए अब ईमानदार बागवानों को परेशान कर रही है. यदि केवल एक-दो केंद्रों पर ही गड़बड़ी थी, तो पूरे प्रदेश के बागवानों से दस्तावेज क्यों मंगवाए जा रहे हैं? यह किसानों को डराने और दबाव में लेने की कोशिश है।.
बीते साल के समान उत्पादन तो खरीद ज्यादा कैसे
उन्होंने कहा कि इस वर्ष एमआईएस के तहत 98,500 मीट्रिक टन से अधिक सेब की खरीद ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. वर्ष 2023 में जब आपदा और प्राकृतिक नुकसान इससे कहीं अधिक था, तब लगभग 80 हजार मीट्रिक टन सेब खरीदा गया था. इस बार सेब की पैदावार लगभग समान होने के बावजूद रिकॉर्ड खरीद होना अपने आप में संदेहास्पद है. सरकार का यह तर्क कि सड़कों के बंद होने के कारण सेब खराब हुआ और किसानों ने एचपीएमसी को दिया, किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं लगता.
खरीद से ज्यादा के बिल दिखाकर भ्रष्टाचार
उन्होंने कहा कि मानसून सीजन में सड़कों के लंबे समय तक बंद रहने की आड़ में कई खरीद केंद्रों पर अनियमितताएं की गईं. कहा गया कि जितना सेब वास्तव में खरीदा गया, उससे कहीं अधिक का बिल तैयार किया गया. कई क्षेत्रों में वास्तविक उत्पादन से कहीं ज्यादा सेब की एंट्री दर्शाई गई, जबकि परिवहन की स्थिति ही संभव नहीं थी. यह पूरे एमआईएस सिस्टम में संगठित गड़बड़ी की ओर संकेत करता है.