Dairy Crisis : गांव की गलियों में कभी सुबह-सुबह दूध की धार बहती दिखती थी, लेकिन अब वही धार धीमी पड़ती नजर आ रही है. 21वीं पशुगणना के ताजा आंकड़े यही कहानी बयां कर रहे हैं. जिले में कुल पशुओं की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन दूध का मुख्य सहारा मानी जाने वाली भैंसों की संख्या पिछले पांच साल में करीब 66 हजार कम हो गई है. यह गिरावट सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और दूध उत्पादन पर मंडराते संकट की भी चेतावनी है.
आंकड़ों ने खोली असल तस्वीर
पशुपालन विभाग के मुताबिक 21वीं पशुगणना अक्टूबर 2024 से अप्रैल 2025 तक चली. इसके मुताबिक, हाथरस जिले में कुल पशुओं की संख्या बढ़कर करीब 7.05 लाख हो गई है, जबकि पिछली गणना में यह संख्या 6.81 लाख थी. लेकिन चिंता की बात यह है कि भैंसों की संख्या 4.04 लाख से घटकर करीब 3.38 लाख रह गई. इसके उलट गायों की संख्या में करीब दो लाख का इजाफा हुआ है. भेड़ और बकरियों की संख्या में भी हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. साफ है कि पशुपालन का संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है.
भैंस पालन से क्यों दूर हो रहे लोग
पशुपालकों की मानें तो भैंस पालना अब पहले जितना आसान नहीं रहा. चारे की भारी कमी और बढ़ती कीमतों ने लागत बढ़ा दी है. खेत अब खाली नहीं रहते, जिससे जानवरों को चराने की जगह नहीं मिलती. ऊपर से बाहर से भूसा और हरा चारा मंगाना महंगा पड़ता है. कई पशुपालक बताते हैं कि भैंस की कीमत एक लाख रुपये से ऊपर होती है, ऐसे में चोरी का डर भी बना रहता है. खर्च बढ़ता जा रहा है, लेकिन दूध के दाम उतने नहीं बढ़े, जिससे मुनाफा कम होता जा रहा है.
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गायों की संख्या बढ़ने के पीछे ये वजहें
जहां भैंसों की संख्या घटी है, वहीं गायों की गिनती तेजी से बढ़ी है. इसकी एक बड़ी वजह सरकारी योजनाएं हैं. नंदनी कृषक समृद्धि योजना, मिनी नंदिनी और स्वदेश गो संवर्धन जैसी योजनाओं से गाय पालन को बढ़ावा मिल रहा है. साथ ही धार्मिक आस्था और स्वास्थ्य कारणों से भी लोग गाय पालना ज्यादा पसंद कर रहे हैं. गाय का दूध हल्का होता है और घर की जरूरतों के लिए उपयुक्त माना जाता है, इसलिए कई परिवार भैंस की जगह गाय चुन रहे हैं.
दूध उत्पादन पर मंडराता खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भैंसों की संख्या इसी तरह घटती रही, तो आने वाले समय में दूध की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. भैंस का दूध गाढ़ा होता है और डेयरियों में इसकी मांग ज्यादा रहती है. पशुपालन विभाग के मुताबिक, दुधारू पशुओं की संख्या में यह गिरावट गंभीर संकेत है. अगर चारा संकट, महंगाई और सुरक्षा जैसी समस्याओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो पशुपालन से लोगों का भरोसा और कमजोर पड़ सकता है.