CRISIL रिपोर्ट: होर्मुज संकट के बीच भी भारत के बासमती चावल की वैश्विक मांग मजबूत, निर्यात में 2 प्रतिशत तक बढ़ोतरी संभव

India basmati rice export: रेटिंग एजेंसी CRISIL Ratings की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत का बासमती चावल निर्यात इस वित्त वर्ष और अगले वित्त वर्ष में लगभग स्थिर रह सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल के मुकाबले निर्यात में करीब 2 प्रतिशत तक बढ़ोतरी भी हो सकती है.

नई दिल्ली | Published: 16 Mar, 2026 | 03:47 PM

India basmati rice export: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और ईरान से जुड़े हालात को लेकर दुनियाभर में चिंता बनी हुई है. इस स्थिति का असर भारत के कई व्यापारिक क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है, खासकर कृषि निर्यात पर. लेकिन राहत की बात यह है कि विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा संकट के बावजूद भारत के बासमती चावल के निर्यात पर बहुत बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है.

रेटिंग एजेंसी CRISIL Ratings की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत का बासमती चावल निर्यात इस वित्त वर्ष और अगले वित्त वर्ष में लगभग स्थिर रह सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल के मुकाबले निर्यात में करीब 2 प्रतिशत तक बढ़ोतरी भी हो सकती है.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा बासमती निर्यातक

भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश है. वैश्विक बाजार में बासमती चावल के कुल निर्यात का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा भारत से जाता है. यही वजह है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय हालात बदलते हैं, तो इसका असर इस उद्योग पर पड़ने की आशंका रहती है.

भारत में बासमती चावल का बड़ा हिस्सा विदेशों में निर्यात किया जाता है. कुल बिक्री का लगभग दो-तिहाई हिस्सा निर्यात के माध्यम से ही होता है, इसलिए यह उद्योग अंतरराष्ट्रीय राजनीति और व्यापारिक परिस्थितियों से काफी प्रभावित होता है.

ईरान में कमी, लेकिन अन्य देशों से बढ़ेगी मांग

CRISIL की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष में भारत ने लगभग 6.06 मिलियन टन बासमती चावल निर्यात किया था. इस साल भी निर्यात का स्तर लगभग इसी के आसपास रहने की संभावना है.

हालांकि ईरान भारत का एक बड़ा खरीदार है और वहां निर्यात कुछ समय के लिए प्रभावित हो सकता है. पिछले साल भारत के कुल बासमती निर्यात में करीब 14 प्रतिशत हिस्सा ईरान का था. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया के अन्य देशों से बढ़ती मांग इस कमी को काफी हद तक पूरा कर सकती है.

इन देशों से मिल सकती है ज्यादा मांग

रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और यमन जैसे देशों में बासमती चावल की मांग बढ़ सकती है. ये देश पहले से ही भारत के बड़े खरीदार हैं और कुल निर्यात का लगभग 55 से 60 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं देशों में जाता है.

बिजनेसलाइन की खबर के अनुसार, CRISIL Ratings के डायरेक्टर नितिन कंसल के बताते हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तरह की रुकावट से चावल की सप्लाई और भुगतान में थोड़ी देरी हो सकती है. लेकिन इन देशों से आने वाली 5 से 6 प्रतिशत अतिरिक्त मांग इस स्थिति को संतुलित कर सकती है.

होर्मुज मार्ग में रुकावट से चुनौती

मध्य-पूर्व के देशों में बासमती चावल भेजने के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक अहम समुद्री मार्ग है. अगर इस मार्ग में रुकावट आती है तो माल की आवाजाही प्रभावित हो सकती है. रिपोर्ट के अनुसार यदि लॉजिस्टिक समस्या करीब एक महीने तक जारी रहती है, तो बासमती चावल के व्यापार में करीब 3.5 से 3.7 लाख टन तक की कमी आ सकती है. हालांकि निर्यातक अब वैकल्पिक समुद्री रास्तों की तलाश भी कर रहे हैं ताकि सप्लाई जारी रखी जा सके.

निर्यातकों की लागत बढ़ सकती है

मौजूदा हालात के कारण निर्यातकों के सामने कुछ नई चुनौतियां भी आ सकती हैं. जहाजों की कमी, लंबा रास्ता और भुगतान में देरी जैसी वजहों से कारोबार थोड़ा धीमा पड़ सकता है. वहीं मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, CRISIL Ratings की एसोसिएट डायरेक्टर स्मृति सिंह के अनुसार, वैकल्पिक रास्तों से माल भेजने में ज्यादा समय लगेगा. इससे निर्यातकों का वर्किंग कैपिटल साइकिल लंबा हो सकता है और उन्हें कारोबार चलाने के लिए 10 से 15 प्रतिशत तक ज्यादा पूंजी की जरूरत पड़ सकती है.

कंपनियों की वित्तीय स्थिति मजबूत

हालांकि चुनौतियों के बावजूद रिपोर्ट में कहा गया है कि बासमती चावल निर्यात करने वाली कंपनियों की वित्तीय स्थिति फिलहाल मजबूत बनी हुई है. CRISIL ने 47 कंपनियों का विश्लेषण किया है, जो इस उद्योग के लगभग 60 प्रतिशत राजस्व का प्रतिनिधित्व करती हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक अगले वित्त वर्ष में इन कंपनियों का गियरिंग रेशियो करीब 0.8 से 0.9 गुना और इंटरेस्ट कवर लगभग 3.5 गुना रहने की उम्मीद है. इसका मतलब है कि कंपनियां बढ़ी हुई लागत के बावजूद अपने कारोबार को संभाल सकती हैं.

मांग बनी रहने से बाजार रहेगा स्थिर

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में अधिक बारिश के कारण इस साल बासमती धान का उत्पादन लगभग स्थिर रह सकता है. ऐसे में मांग और आपूर्ति का संतुलन बना रहेगा और कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव की संभावना कम होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही पश्चिम एशिया में हालात थोड़े चुनौतीपूर्ण हों, लेकिन भारत के बासमती चावल की वैश्विक मांग मजबूत है. यही वजह है कि आने वाले समय में भी भारत का बासमती निर्यात स्थिर बना रह सकता है.

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