ईरान युद्ध संकट गहराया: क्या चावल की कीमतों में आएगा उछाल? आज होगी बड़ी बैठक
भारत दुनिया का बड़ा चावल निर्यातक देश है. हमारे यहां से अफ्रीका और पश्चिम एशिया को भारी मात्रा में चावल भेजा जाता है. आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच पश्चिम एशिया को करीब 39 लाख टन और अफ्रीका को 71 लाख टन से ज्यादा चावल निर्यात किया गया.
Iran war crisis impact: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने दुनिया भर के व्यापार को चिंता में डाल दिया है. ईरान और उसके आसपास के इलाकों में युद्ध जैसे हालात बनने से समुद्री रास्तों पर अनिश्चितता बढ़ गई है. भारत जैसे देश, जिनका बड़ा हिस्सा आयात-निर्यात समुद्री मार्गों से होता है, वहां भी असर महसूस किया जा रहा है. सबसे ज्यादा चिंता चावल जैसे जरूरी खाद्य उत्पादों को लेकर जताई जा रही है. सवाल उठ रहा है कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो क्या आने वाले दिनों में चावल की कीमतों में उछाल देखने को मिल सकता है?
इसी मुद्दे पर चर्चा के लिए वाणिज्य मंत्रालय ने निर्यातकों, शिपिंग कंपनियों और संबंधित विभागों के अधिकारियों की एक अहम बैठक बुलाई है. इस बैठक में यह आकलन किया जाएगा कि मौजूदा हालात का भारतीय व्यापार पर कितना और कैसा प्रभाव पड़ सकता है.
क्यों बढ़ी है चिंता?
मिंट की खबर के अनुसार, पश्चिम एशिया का इलाका भारत के लिए बेहद अहम व्यापारिक मार्गों से जुड़ा है. होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंडेब जैसे समुद्री रास्ते भारत को खाड़ी देशों, यूरोप और अमेरिका से जोड़ते हैं. अगर इन रास्तों पर किसी तरह की रुकावट आती है या जहाजों को लंबा रास्ता लेना पड़ता है, तो समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं.
निर्यातकों का कहना है कि पहले ही कुछ जहाजों के रूट बदले जा रहे हैं. लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. यदि स्थिति और बिगड़ती है, तो जहाजों को अफ्रीका के रास्ते लंबा चक्कर लगाकर जाना पड़ सकता है. इससे माल पहुंचने में 15 से 20 दिन तक की देरी हो सकती है. देरी का मतलब है ज्यादा ईंधन खर्च, ज्यादा बीमा प्रीमियम और ज्यादा लागत.
लॉजिस्टिक पर बढ़ता दबाव
शिपिंग कंपनियों का कहना है कि युद्ध जैसे हालात में सबसे पहले बीमा कंपनियां अपने प्रीमियम बढ़ाती हैं. जोखिम ज्यादा होने पर जहाज मालिक अतिरिक्त शुल्क लेते हैं. इसके अलावा बंकर ईंधन यानी जहाजों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की कीमत भी बढ़ सकती है. इन सभी कारणों से माल ढुलाई दरों में तेज उछाल आ सकता है.
जब माल ढुलाई महंगी होती है, तो उसका सीधा असर निर्यातकों पर पड़ता है. अगर उन्होंने पहले से तय कीमत पर माल भेजने का करार किया है, तो बढ़ी हुई लागत उन्हें अपनी जेब से चुकानी पड़ सकती है. यही वजह है कि कई निर्यातक फिलहाल नए सौदों को लेकर सतर्क रुख अपना रहे हैं.
चावल निर्यात पर क्या असर पड़ेगा?
भारत दुनिया का बड़ा चावल निर्यातक देश है. हमारे यहां से अफ्रीका और पश्चिम एशिया को भारी मात्रा में चावल भेजा जाता है. आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच पश्चिम एशिया को करीब 39 लाख टन और अफ्रीका को 71 लाख टन से ज्यादा चावल निर्यात किया गया. यानी कुल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा इन इलाकों पर निर्भर है.
अगर शिपिंग लागत बढ़ती है, तो या तो निर्यातक अपनी कमाई घटाकर माल भेजेंगे या फिर खरीदारों पर अतिरिक्त बोझ डालेंगे. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय चावल की कीमत बढ़ सकती है. अगर निर्यात महंगा होता है, तो घरेलू बाजार में भी कीमतों पर दबाव बन सकता है.
निर्यातकों को नई सलाह
इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन ने अपने सदस्यों को सलाह दी है कि फिलहाल CIF यानी लागत, बीमा और माल ढुलाई सहित सौदे करने से बचें. इसके बजाय एफओबी यानी फ्री ऑन बोर्ड शर्तों पर काम करने की सलाह दी गई है. इस व्यवस्था में शिपिंग और बीमा की जिम्मेदारी खरीदार की होती है, जिससे भारतीय निर्यातक अचानक बढ़ी लागत के जोखिम से बच सकते हैं. यह कदम एहतियात के तौर पर उठाया गया है ताकि अनिश्चित हालात में नुकसान कम से कम हो.
आगे क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव जल्दी कम हो जाता है तो व्यापार पर असर सीमित रहेगा. लेकिन यदि संघर्ष लंबा खिंचता है और समुद्री मार्ग बाधित होते हैं, तो माल ढुलाई दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं. इससे न केवल चावल बल्कि अन्य कृषि उत्पादों, पेट्रोकेमिकल्स और औद्योगिक सामानों की कीमतों पर भी असर पड़ेगा.