कपास की कमी और बढ़ती लागत से टेक्सटाइल सेक्टर बेहाल, 11 प्रतिशत आयात शुल्क हटाने की उठी मांग
अभी तक सूत मिलें किसी तरह बढ़ती कीमतों के बावजूद काम कर रही हैं, लेकिन अगर यही स्थिति बनी रही, तो आगे चलकर उनके लिए उत्पादन जारी रखना मुश्किल हो सकता है. उद्योग के जानकार मानते हैं कि अगर जल्द कोई कदम नहीं उठाया गया, तो यह संकट और गहरा सकता है.
India cotton prices surge: देश में कपास की कीमतें इन दिनों लगातार बढ़ रही हैं और इसका सीधा असर कपड़ा उद्योग पर पड़ रहा है. कपास इस उद्योग का सबसे अहम कच्चा माल है, इसलिए इसके दाम बढ़ते ही पूरी व्यवस्था प्रभावित हो जाती है. यही वजह है कि अब उद्योग जगत सरकार से मांग कर रहा है कि कपास के आयात पर लगने वाला 11 प्रतिशत शुल्क कुछ समय के लिए हटा दिया जाए, ताकि हालात संभाले जा सकें.
कपास महंगी, उद्योग पर बढ़ा दबाव
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसर, पिछले कुछ हफ्तों में कपास के दाम तेजी से बढ़े हैं. यह बढ़ोतरी सिर्फ देश के अंदर ही नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार के असर से भी हो रही है. कपास महंगी होने से सूत बनाने वाली मिलों, कपड़ा बनाने वाले कारखानों और तैयार कपड़े निर्यात करने वाली कंपनियों, सभी पर लागत का बोझ बढ़ गया है. उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि कपास के दाम रोजाना बढ़ रहे हैं, जिससे पूरे कारोबार की योजना बनाना मुश्किल हो गया है.
निर्यातकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती
जो कंपनियां विदेशों में कपड़ा भेजती हैं, उनके लिए यह समय सबसे कठिन है. ज्यादातर निर्यातक लंबे समय के अनुबंध पर काम करते हैं, जिसमें कीमत पहले ही तय होती है. ऐसे में जब कच्चा माल महंगा हो जाता है, तो वे अपनी कीमत नहीं बढ़ा पाते और उनका मुनाफा घट जाता है. कई मामलों में कंपनियों को नुकसान भी उठाना पड़ रहा है. यही कारण है कि उद्योग लगातार चिंता जता रहा है.
पहले से ही मुश्किल दौर में था सेक्टर
कपड़ा उद्योग पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण कई देशों में मांग कम हो गई है. हालांकि चीन से सूत की मांग कुछ हद तक बनी हुई है, लेकिन कुल मिलाकर निर्यात का माहौल कमजोर है. ऐसे में कपास की बढ़ती कीमतों ने स्थिति और खराब कर दी है.
उत्पादन कम, जरूरत ज्यादा
इस साल देश में कपास का उत्पादन करीब 290 लाख गांठ बताया जा रहा है, जबकि जरूरत लगभग 330 लाख गांठ की है. यानी करीब 40 लाख गांठ की कमी बनी हुई है. इस कमी की वजह पिछले साल की बेमौसम बारिश है, जिसने कपास की फसल को काफी नुकसान पहुंचाया. इससे न सिर्फ उत्पादन घटा, बल्कि गुणवत्ता भी प्रभावित हुई. अच्छी गुणवत्ता का कपास कम मिलने के कारण मिलों को अतिरिक्त परेशानी झेलनी पड़ रही है.
मिलों के सामने बढ़ती चिंता
अभी तक सूत मिलें किसी तरह बढ़ती कीमतों के बावजूद काम कर रही हैं, लेकिन अगर यही स्थिति बनी रही, तो आगे चलकर उनके लिए उत्पादन जारी रखना मुश्किल हो सकता है. उद्योग के जानकार मानते हैं कि अगर जल्द कोई कदम नहीं उठाया गया, तो यह संकट और गहरा सकता है.
आयात शुल्क हटाने की मांग
इसी स्थिति को देखते हुए उद्योग ने सरकार से मांग की है कि मई से अक्टूबर के बीच कपास के आयात पर लगने वाला 11 प्रतिशत शुल्क हटा दिया जाए. यह समय ऐसा होता है जब नई फसल बाजार में नहीं आती और कपास की कमी सबसे ज्यादा होती है. अगर इस दौरान आयात सस्ता हो जाएगा, तो बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतों पर काबू पाया जा सकेगा.
किसानों को नुकसान नहीं होगा
उद्योग का कहना है कि इस फैसले से किसानों पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा. आमतौर पर किसान 31 मार्च तक अपनी फसल बेच देते हैं और उसके बाद उनके पास ज्यादा स्टॉक नहीं बचता. इसलिए कुछ महीनों के लिए शुल्क हटाने से किसानों के हित सुरक्षित रहेंगे.
पहले भी दी जा चुकी है छूट
सरकार पहले भी दिसंबर 2025 तक कपास के आयात पर शुल्क में छूट दे चुकी है. उस समय करीब 30 लाख गांठ कपास का आयात हुआ था. इसके अलावा अग्रिम अनुमति योजना के तहत करीब 7 लाख गांठ कपास और आयात किया गया. इसके बावजूद इस साल करीब 30 लाख गांठ अतिरिक्त कपास की जरूरत बताई जा रही है.
अब तुरंत फैसले की जरूरत
उद्योग का कहना है कि अब समय बहुत महत्वपूर्ण है. अगर सरकार ने जल्द फैसला नहीं लिया, तो आने वाले महीनों में कपास की कमी और बढ़ सकती है. इससे कीमतों में और तेजी आएगी और इसका असर उद्योग के साथ-साथ आम लोगों पर भी पड़ेगा, क्योंकि कपड़े महंगे हो सकते हैं.