GMO के आरोप में चीन ने भारतीय चावल की 3 खेप ठुकराई, निर्यातकों की बढ़ी चिंता

भारत में अभी तक किसी भी खाने वाली फसल की GMO खेती की इजाजत नहीं दी गई है. केवल कपास ही एक ऐसी फसल है जिसे GMO रूप में उगाया जाता है. ऐसे में चावल में GMO होने की बात पर सवाल उठना लाजिमी है. कई विशेषज्ञ इसे सामान्य जांच से ज्यादा व्यापार से जुड़ा मामला मान रहे हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 25 Mar, 2026 | 10:02 AM

GMO rice controversy: भारत और चीन के बीच चावल के व्यापार को लेकर एक नई समस्या सामने आई है. चीन ने भारत से भेजी गई नॉन-बासमती चावल की तीन खेपों को वापस लौटा दिया है. चीन का कहना है कि इन खेपों में जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म यानी GMO मौजूद है.

हालांकि, हैरानी की बात यह है कि इन खेपों को भेजने से पहले चीन की ही जांच एजेंसी ने इन्हें सही बताया था. इसके बावजूद वहां पहुंचने के बाद इन्हें रिजेक्ट कर दिया गया. इस पूरे मामले ने भारतीय निर्यातकों को परेशानी में डाल दिया है.

भारत में नहीं होती GMO चावल की खेती

भारत में अभी तक किसी भी खाने वाली फसल की GMO खेती की इजाजत नहीं दी गई है. केवल कपास ही एक ऐसी फसल है जिसे GMO रूप में उगाया जाता है. ऐसे में चावल में GMO होने की बात पर सवाल उठना लाजिमी है. कई विशेषज्ञ इसे सामान्य जांच से ज्यादा व्यापार से जुड़ा मामला मान रहे हैं.

कंपनियों ने सरकार से मांगी मदद

बिजनेसलाइन की खबर के अनुसार, इस मामले के सामने आने के बाद प्रभावित कंपनियों ने सरकार से मदद मांगी है. उन्होंने APEDA और ICAR से इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करने को कहा है. नागपुर की श्रीराम फूड इंडस्ट्री ने ICAR से मांग की है कि एक आधिकारिक प्रमाण जारी किया जाए, जिसमें साफ लिखा हो कि भारत में उगाया जाने वाला चावल पूरी तरह नॉन-GMO है. कंपनी का कहना है कि ऐसे प्रमाण की कमी से भविष्य में भी निर्यात में दिक्कत आ सकती है.

मंजूरी के बाद भी क्यों लौटी खेप?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब चीन की एजेंसी ने पहले ही इन चावल की खेपों को क्लियर कर दिया था, तो बाद में उन्हें क्यों खारिज किया गया? निर्यातकों का कहना है कि यह मामला सामान्य नहीं है और इसकी सही वजह सामने आनी चाहिए. इसी वजह से उन्होंने जांच की मांग की है.

क्या व्यापारिक चाल है चीन की?

कुछ जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ गुणवत्ता का मामला नहीं, बल्कि एक तरह का व्यापारिक दबाव भी हो सकता है. चीन भारत से ही GMO-फ्री प्रमाणपत्र मांग रहा है, जबकि अन्य देशों से ऐसी कोई सख्ती नहीं दिखाई जा रही. दिलचस्प बात यह भी है कि चीन खुद अपने यहां GMO चावल की खेती करता है, जिससे इस पूरे विवाद पर और सवाल उठ रहे हैं.

चीन भारत के लिए क्यों अहम बाजार है?

भारत हर साल बड़ी मात्रा में चावल निर्यात करता है. साल 2024-25 में भारत ने चीन को करीब 1.80 लाख टन नॉन-बासमती चावल भेजा, जिसकी कीमत करीब 79.43 मिलियन डॉलर रही. हालांकि यह कुल निर्यात का छोटा हिस्सा है, लेकिन चीन एक बड़ा बाजार है और भविष्य में इसकी भूमिका और बढ़ सकती है.

किसानों पर भी पड़ सकता है असर

अगर इस तरह की समस्याएं लगातार बनी रहीं, तो इसका असर सिर्फ व्यापारियों पर ही नहीं, बल्कि किसानों पर भी पड़ेगा. निर्यात कम होने से बाजार में कीमतें गिर सकती हैं, जिससे किसानों की आमदनी प्रभावित हो सकती है. इसलिए इस मुद्दे का जल्द हल निकालना जरूरी है.

सरकार कर रही है समाधान की कोशिश

सरकार और संबंधित एजेंसियां इस मामले को गंभीरता से देख रही हैं. कोशिश की जा रही है कि जल्द से जल्द इस विवाद का समाधान निकले, ताकि निर्यात प्रभावित न हो. संभावना है कि भारत की तरफ से जल्द ही आधिकारिक रूप से यह स्पष्ट किया जाए कि देश में चावल पूरी तरह नॉन-GMO है.

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