सुपारी की खेती में बड़ा झटका! रकबा 11 लाख हेक्टेयर के पार, फिर भी घट गया उत्पादन, जानें वजह

Arecanut Farming: देश में सुपारी की खेती का रकबा पिछले कुछ सालों में 8.49 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 11.06 लाख हेक्टेयर हो गया है, लेकिन इसके बावजूद कुल उत्पादन और प्रति हेक्टेयर उपज में गिरावट दर्ज की गई है. कर्नाटक में फल सड़न और लीफ स्पॉट जैसी बीमारियों ने उत्पादन को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है.

नोएडा | Updated On: 6 Aug, 2026 | 03:10 PM

Supari Farming: देश में सुपारी (अरेका नट) की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद उत्पादन और प्रति हेक्टेयर पैदावार में गिरावट दर्ज की गई है. यानी किसान ज्यादा जमीन पर सुपारी उगा रहे हैं, लेकिन पहले जितनी उपज नहीं मिल पा रही है. सरकार ने लोकसभा में यह जानकारी देते हुए बताया कि पिछले कुछ सालों में सुपारी की खेती का विस्तार तो हुआ है, लेकिन कई राज्यों में बीमारियों और घटती उत्पादकता के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ है.

विशेषज्ञों का मानना है कि, अगर समय रहते रोग नियंत्रण और वैज्ञानिक खेती पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले सालों में सुपारी उत्पादकों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं.

रकबा बढ़ा, लेकिन उत्पादन घट गया

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2021-22 में देश में सुपारी की खेती  का कुल रकबा 8.49 लाख हेक्टेयर था. यह बढ़कर 2025-26 के दूसरे शुरुआती अनुमान में 11.06 लाख हेक्टेयर हो गया. यानी करीब 2.56 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बढ़ोतरी हुई. आमतौर पर खेती का रकबा  बढ़ने पर उत्पादन भी बढ़ता है, लेकिन सुपारी के मामले में ऐसा नहीं हुआ. साल 2021-22 में देश का कुल उत्पादन 16.66 लाख टन था, जो अब घटकर 15.29 लाख टन रह गया है. इससे साफ है कि ज्यादा क्षेत्र में खेती होने के बावजूद किसानों को पहले जितनी उपज नहीं मिल रही है.

प्रति हेक्टेयर पैदावार भी घटी

सिर्फ कुल उत्पादन ही नहीं, बल्कि प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन में भी कमी आई है. पिछले कुछ सालों में सुपारी की औसत उत्पादकता लगभग 1.96 टन प्रति हेक्टेयर थी, जो अब घटकर 1.38 टन प्रति हेक्टेयर रह गई है. इसका मतलब है कि किसानों की लागत बढ़ रही है, लेकिन उत्पादन उसी अनुपात में नहीं बढ़ पा रहा. इससे उनकी कमाई पर भी असर पड़ सकता है.

नए राज्यों में तेजी से बढ़ रही खेती

रिपोर्ट की खास बात यह है कि अब सुपारी की खेती केवल पारंपरिक  राज्यों तक सीमित नहीं रही. कई नए राज्यों में भी किसान इसकी खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं. पिछले पांच सालों में मेघालय में सुपारी के रकबे में लगभग 195 प्रतिशत, नगालैंड में 177 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 171 प्रतिशत और तमिलनाडु में 92 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. ऑल इंडिया सुपारी उत्पादक संघ के अध्यक्ष महेश पुच्चापडी के अनुसार, इन राज्यों के किसान अब पारंपरिक जल स्रोतों की बजाय बोरवेल से सिंचाई कर सुपारी की खेती को बढ़ावा दे रहे हैं.

सबसे बड़े उत्पादक राज्य कर्नाटक की बढ़ी चिंता

देश के कुल सुपारी उत्पादन में लगभग 75 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला कर्नाटक इस समय सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है. राज्य में सुपारी का रकबा करीब 32 प्रतिशत बढ़ा है, लेकिन उत्पादन में लगभग 16 प्रतिशत और उत्पादकता में 36 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है. दक्षिण कन्नड़, शिवमोग्गा और तुमकुरु जैसे प्रमुख उत्पादक जिलों में पैदावार काफी कम हुई है. उदाहरण के तौर पर दक्षिण कन्नड़ में उत्पादन 2.74 लाख टन से घटकर 1.41 लाख टन रह गया है.

बीमारियां बनीं सबसे बड़ी वजह

विशेषज्ञों का कहना है कि सुपारी के बागानों में फैल  रही बीमारियां इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह हैं. फल सड़न (Fruit Rot) और लीफ स्पॉट (Leaf Spot) जैसी बीमारियों ने पिछले कुछ सालों में लगभग 50 से 60 प्रतिशत बागानों को प्रभावित किया है. इन रोगों के कारण पौधों की बढ़वार और फल उत्पादन दोनों पर असर पड़ा है. हालांकि कर्नाटक के सूखे क्षेत्रों के किसान भी अब सुपारी की खेती करने लगे हैं, लेकिन रोगों के कारण उन्हें उम्मीद के मुताबिक उत्पादन नहीं मिल पा रहा है.

वैज्ञानिक खेती पर देना होगा जोर

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल खेती का रकबा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है. अगर किसानों को बेहतर उत्पादन  चाहिए, तो उन्हें रोग नियंत्रण, संतुलित पोषण, सही सिंचाई और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाना होगा. समय पर रोगों की पहचान, वैज्ञानिक सलाह के अनुसार दवा का उपयोग और बागानों की नियमित देखभाल से उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है. अगर इस दिशा में काम किया गया, तो आने वाले सालों में सुपारी उत्पादन फिर से बढ़ सकता है और किसानों की आय में भी सुधार होगा.

Published: 6 Aug, 2026 | 03:10 PM

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