कपास की BG किस्मों को अपनाने पर छिड़ी रार, किस्में फेल हुईं तब भी सरकार बिक्री मूल्य क्यों तय कर रही?  

Cotton Seeds: सेंट्र्ल इंस्टीट्यूट फॉर कॉटन रिसर्च ने माना है बीटी कपास का लक्ष्य था कि पिंक बालवर्म (गुलाबी सुंडी) को मारना है. लेकिन दो साल में पिंक बालवर्म ने प्रतिरोधक क्षमता पैदा कर ली और पहले की तरह प्रकोप फैला रहा. इसके नतीजे में फसल फेल हो गई.

नोएडा | Updated On: 9 Mar, 2026 | 04:09 PM

कपास की जेनेटिकली मोडिफाइड किस्में बीजी-1 और बीजी-2 (bollgard 1 and bollgard 2 cotton seeds) को लेकर फिर से घमासान छिड़ गया है. किसान संगठन भारतीय किसान संघ ने सरकार की ओर से बिक्री मूल्य तय करने को लेकर बुवाई गई बैठक और नीतियों का विरोध किया है. बीकेएस ने कहा कि जब जो किस्में फेल हो गई हैं तो उनके बीजों की कीमत तय करने का क्या मतलब बनता है. ऐसी किस्मों को बाजार से ही हटा देना चाहिए. उन्होंने दादा लाड की ओर से विकसित कपास तकनीक अपनाने की मांग की है. बता दें कि दादा लाड को कपास बीज तकनीक के लिए पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया है.

जीएम कपास बीजी 1 व बीजी 2 फेल तो उनकी कीमत तय करने की जरूरत क्यों

केंद्रीय कृषि व कल्याण मंत्रालय की ओर से बीटी कॉटन बीज का अधिकतम विक्रय मूल्य निर्धारित करने के लिये विगत 18 फरवरी को कृषि भवन नई दिल्ली में संयुक्त सचिव (बीज) की अध्यक्षता में बैठक का आयोजन किया गया था. जिसमें भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय महामंत्री मोहिनी मोहन मिश्र ने जीएम कपास बीजी 1 व बीजी 2 के अधिकतम विक्रय मूल्य निर्धारण करने को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करते हुये प्रक्रिया को सिरे से नकार दिया. उन्होंने कहा कि जब सभी स्वीकारते हैं कि बीटी कपास फेल हो चुका है तो उसकी कीमत कैसे और क्यों तय करना. जब अमेरिकी कंपनी मोनसेंटो ने स्वंय घोषणा की कि वर्ष 2002 में आया बीजी1 वर्ष 2005 में फेल हो गया है. साथ ही सरकार व कंपनी ने भी माना है कि बीजी2 जो 2006 में आया था वह भी 2009 में फेल हो गया है. जिसके फेल होने का कारण मुख्य गुलाबी सुंडी में प्रतिरोध क्षमता विकसित होना बताया गया था.

जीएम बीजी1 व बीजी2 बीज किसानों की आत्महत्या के लिये जिम्मेदार

बयान में महामंत्री ने कहा कि मोनसेंटो व सेंट्र्ल इंस्टीट्यूट फॉर कॉटन रिसर्च ने माना है बीटी कपास का लक्ष्य था कि पिंक बालवर्म (गुलाबी सुंडी) को मारना है. लेकिन दो साल में पिंक बालवर्म ने प्रतिरोधक क्षमता पैदा कर ली और पहले की तरह प्रकोप फैला रहा. इसके नतीजे में फसल फेल हो गई. फिर पिंक बालवर्म के साथ साथ नये चूसने वाले कीड़ों की संख्या बढ़ने लगी और दवाईयों का छिड़काव बढ़ गया. इससे बीजी1 व बीजी2 की उत्पादन लागत में बढ़ोत्तरी होने के बावजूद उसकी उत्पादकता में कमी आने से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. इसके चलते किसानों को आत्महत्या जैसे गंभीर कदम उठाने के लिये मजबूर होना पड़ा है.

बीज खराब तो बाजार से वापिस क्यों नहीं लिए जा रहे

भारतीय किसान संघ ने सरकार से प्रश्न करते हुये कहा कि जब बीज खराब थे तो उन्हें बाजार से वापिस क्यों नहीं लिया गया. जबकि आत्महत्या करने वाले किसानों में बहुतायत संख्या बीटी कॉटन की खेती करने वाले किसानों की है. बयान में आगे कहा कि विडंबना है कि खराब बीज बेचने वाले रायल्टी लेते रहे जो अभी भी जारी है और सरकार है कि फेल व खराब बीजों के विक्रय रेट तय करने में लगी है. जबकि 2014 में कर्नाटक में महिको कंपनी को खराब बीज सप्लाई करने पर प्रतिबंध का सामना करना पड़ा. इसमें सामने आया था कि पिंक बॉलवर्म को नियंत्रित करने में कोई परिणाम नहीं आये और तकनीक अस्थिर, मंहगी व कम उत्पादन देने वाली है. महाराष्ट सरकार की ओर से कपास किसानों के नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा देना इसका बड़ा उदाहरण है.

खराब बीजों के रेट तय करने की प्रक्रिया से किसान संघ हुआ अलग

भारतीय किसान संघ ने स्पष्ट कहा कि देश की जिम्मेदार सरकार से किसानों को इन खराब बीजों को उपलब्ध कराने के लिये किसान संघ कैसे कह सकता है. विफल जीएम बीजों की सप्लायर कंपनी के खिलाफ तुरंत कार्यवाही करनी चाहिये. बाजार से बीज वापिस कराकर इन कंपनियों के बड़े अधिकारियों पर जेल जैसी कड़ी सजा का प्रावधान किया जाना चाहिये. इन बीजों के मुफ्त वितरण पर प्रतिबंध लगाकर नॉन जीएम व कम दाम में उपलब्ध अधिक पैदावार वाली वैराइटी किसानों को उपलब्ध कराने की व्यवस्था सरकार को करना चाहिये.

दादा लाड कपास तकनीक अपनाने को बढ़ावा दे सरकार

भारतीय किसान संघ के महामंत्री मोहिनी मोहन मिश्र ने सुझाव दिया कि सरकार जीएम बीजों के बजाय नॉन जीएम हाइब्रिड कपास बीजों के विकास उनके उत्पादन और बिक्री के लिए प्रोत्साहन की व्यवस्था करे. घरेलू जरूरतों को मैनेज करने व निर्यात की दृष्टि से नॉन जीएम कपास उत्पादन बढ़ाने कि लिये आईसीएआर से प्रमाणित दादा लाड कपास तकनीक अपनाने की सलाह दी. इसमें कपास की पैदावार 300 फीसदी तक बढ़ जाती है.

Published: 9 Mar, 2026 | 03:59 PM

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