Heatwave Impact: पिछले कुछ सालों में जलवायु परिवर्तन का असर अब साफ दिखाई देने लगा है. खासकर उत्तर भारत और गंगा के मैदानी इलाकों में अप्रैल से जून के बीच तापमान 40-45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचना आम बात बन गई है. पहले जो तापमान असामान्य माना जाता था, अब वही नॉर्मल होता जा रहा है. तेज गर्म हवाएं, बारिश की कमी और मिट्टी में नमी का तेजी से खत्म होना खेती के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है. बिहार स्थित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. एस.के. सिंह ने किसान इंडिया (Kisan India) को बताया कि, फल और सब्जी फसलें इस बदलाव के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं, क्योंकि इनमें पानी की मात्रा ज्यादा होती है और ये तापमान में होने वाले थोड़े से बदलाव से भी प्रभावित हो जाती हैं.
गर्मी का फसलों पर सीधा असर
- हीट स्ट्रेस से रुकती है ग्रोथ: जब तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो पौधों में भोजन बनाने की प्रक्रिया (Photosynthesis) धीमी हो जाती है. पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और पौधे का विकास रुक जाता है. लीची और केले जैसी फसलों में इसका असर साफ दिखता है.
- पानी की कमी से सूखने लगती हैं फसलें: तेज गर्मी में मिट्टी की नमी तेजी से खत्म होती है, जिससे पौधों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता. इसका नतीजा-पत्तियां मुरझाना, फल गिरना और कई बार पौधों का सूख जाना.
अंदरूनी बदलाव भी बढ़ा रहे नुकसान
एंजाइम और हार्मोन पर असर
ज्यादा तापमान पौधों के अंदर होने वाली जरूरी प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है. एंजाइम सही से काम नहीं कर पाते और एथिलीन हार्मोन बढ़ने से फल समय से पहले पकने लगते हैं. इससे उनकी गुणवत्ता और स्टोरेज क्षमता दोनों घट जाती हैं.
उत्पादन और गुणवत्ता पर बड़ा झटका
- फूल और छोटे फल जल्दी झड़ने लगते हैं
- परागण की प्रक्रिया प्रभावित होती है
- फल छोटे, टेढ़े-मेढ़े और कम आकर्षक हो जाते हैं
- टमाटर, आम, लीची जैसी फसलों में खास समस्याएं बढ़ जाती हैं
साथ ही, फलों में विटामिन C और मिठास कम हो जाती है, जिससे बाजार में उनकी कीमत गिर जाती है.
कीट और बीमारियों का बढ़ता खतरा
गर्म और सूखा मौसम कीटों के लिए सबसे अनुकूल होता है. थ्रिप्स, माइट्स, सफेद मक्खी और फल मक्खी तेजी से बढ़ते हैं. कमजोर पौधों पर रोगों का हमला भी जल्दी होता है, जिससे फसल को दोहरा नुकसान झेलना पड़ता है.
कटाई के बाद भी नुकसान जारी
उच्च तापमान का असर केवल खेत तक सीमित नहीं रहता.
- फलों की शेल्फ लाइफ 20-30 फीसदी तक घट जाती है
- परिवहन के दौरान जल्दी खराब होने लगते हैं
- कोल्ड स्टोरेज की कमी से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है
बचाव के कारगर उपाय
- माइक्रोक्लाइमेट मैनेजमेंट: शेड नेट, मल्टी-टियर खेती और नेट हाउस तकनीक अपनाकर तापमान को नियंत्रित किया जा सकता है.
- स्मार्ट सिंचाई: ड्रिप सिंचाई से पानी की बचत होती है और पौधों को नियमित नमी मिलती है. सुबह-शाम सिंचाई करना ज्यादा फायदेमंद रहता है.
- मल्चिंग और पोषण: मल्चिंग से मिट्टी की नमी बनी रहती है. साथ ही संतुलित उर्वरक और सूक्ष्म पोषक तत्व पौधों की सहनशीलता बढ़ाते हैं.
- कीट और रोग नियंत्रण: नीम आधारित जैविक उपाय और नियमित निगरानी से नुकसान को कम किया जा सकता है.
आज के समय में AI आधारित मौसम पूर्वानुमान, सेंसर आधारित सिंचाई और हीट-टॉलरेंट किस्मों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है. ये तकनीकें किसानों को सही समय पर सही निर्णय लेने में मदद कर रही हैं.