ग्लोबल वार्मिंग के असर से भारत में तापमान बढ़ता देखा जा रहा है. आईआईटी और अमेरिकन संस्था के शोध में कहा गया है कि जलवायु बदलावों के साथ भारत के मॉनसून की गर्मी और उमस, गर्मियों के ‘अनकम्पेन्सेबल हीट स्ट्रेस’ (UHS) के समय को बढ़ा सकती है. यह स्थिति मानव स्वास्थ्य के साथ ही कृषि अर्थव्यवस्था के लिए खतरे के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. शोध में कहा गया है कि मॉनसून सीजन में तापमान 2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तर भी देखी जा रही है.
IIT गांधीनगर और अमेरिका की स्टैनफोर्ड और पर्ड्यू यूनिवर्सिटीज के रिसर्चर्स के शोध को ‘अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन (AGU) एडवांसेज’ जर्नल में प्रकाशित किया गया है. इसके नतीजों में कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होने पर भारत के मॉनसून सीजन (जुलाई-अक्टूबर) के दौरान रहने वाली गर्मी और उमस भरी स्थिति गर्मियों के सीजन में होने वाले ‘अनकम्पेन्सेबल हीट स्ट्रेस’ (UHS) की अवधि को बढ़ा सकती है.
क्या है अनकम्पेन्सेबल हीट स्ट्रेस
शोध में बताया गया है कि जैसे-जैसे जलवायु गर्म हो रही है, मॉनसून सीजन (जुलाई-अक्टूबर) के दौरान UHS में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. बता दें कि अनकम्पेन्सेबल हीट स्ट्रेस (Uncompensable Heat Stress – UHS) वह स्थिति है, जिसमें अत्यधिक गर्मी और नमी (humidity) के चलते शरीर का पसीना सूख नहीं पाता और शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता. इससे शरीर का आंतरिक तापमान लगातार बढ़ता है, जिससे हीट स्ट्रोक और ऑर्गन फेल्योर का का खतरा बढ़ता है.
कृषि उत्पादन पर हल्के असर के संकेत
रिसर्चर्स ने शोध में कहा कि गर्मी और मॉनसून दोनों सीजन में लंबे समय तक रहने वाला UHS घनी आबादी वाले और संवेदनशील इलाकों में पब्लिक हेल्थ, लेबर प्रोडक्टिविटी और क्लाइमेट रेजिलिएंस (जलवायु के प्रति लचीलापन) के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकता है. जबकि, कृषि उत्पादन पर हल्का नकारात्मक असर देखा जा सकता है. ‘अनकम्पेन्सेबल हीट स्ट्रेस’ तब होता है जब अत्यधिक गर्मी और उमस के कारण शरीर पसीने या अन्य तरीकों से खुद को ठंडा नहीं कर पाता है. कहा गया है कि लगातार गर्मी जमा होने से इंसानी सेहत को खतरा हो सकता है, जिससे गर्मी से जुड़ी बीमारियां, अंगों का काम करना बंद करना (ऑर्गन फेलियर) और मौत भी हो सकती है.
भारत के ज्यादा इलाकों पर असर की आशंका
शोध से पता चलता है कि 1979-2021 के दौरान UHS की घटनाएं ज्यादा बार होने लगी हैं और भारत में ज्यादा इलाकों को प्रभावित कर रही हैं. 1980 के दशक में 0.01 मिलियन वर्ग किलोमीटर से कम इलाके से बढ़कर 2020 तक यह 0.04 मिलियन वर्ग किलोमीटर हो गया है. UHS गर्मियों के महीनों (मार्च-जून) में ज्यादा आम पाया गया, जिससे भारत का 8 फीसदी हिस्सा प्रभावित हुआ और यह सालाना गर्मी से होने वाली मौतों से ज्यादा मजबूती से जुड़ा था. जबकि, मॉनसून सीजन के दौरान केवल एक फीसदी हिस्सा ही इससे प्रभावित पाया गया.
60 फीसदी आबादी प्रभावित होने के संकेत
रिसर्चर्स ने कहा कि मॉनसून सीजन (जुलाई-अक्टूबर) में UHS मुख्य रूप से गर्मी और उमस भरी स्थितियों से पहचाना जाता है, जलवायु के गर्म होने के साथ तेजी से बढ़ने का अनुमान है. यह स्थिति के लगभग उतने ही हिस्से को प्रभावित करेगा जितना गर्मियों के सीजन में होता है. गर्मियों में 60 फीसदी हिस्सा प्रभावित होता है. इलाके के हिसाब से देखें तो गर्मियों में ‘अनकम्पेन्सेबल हीट स्ट्रेस’ मुख्य रूप से भारत के इंडो-गैंगेटिक मैदान और तटीय इलाकों में होता है. इसकी वजहें ज्यादा तापमान और बंगाल की खाड़ी से आने वाली प्री-मानसून हवाओं के जरिए जमीन की तरफ नमी का आना हो सकती हैं. इसके उलट रिसर्चर्स ने पाया कि मानसून के मौसम में ज्यादा नमी वाला ‘अनकम्पेन्सेबल हीट स्ट्रेस’ मुख्य रूप से 35 डिग्री सेल्सियस से 38 डिग्री सेल्सियस के बीच के तापमान में होता है.
पंजाब में ज्यादा दिखेगा हीट स्ट्रेस का असर
टीम ने बताया कि मानसून के मौसम में ‘अनकम्पेन्सेबल हीट स्ट्रेस’ देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के पंजाब राज्य में देखा गया है. उन्होंने कहा कि मानसून के मौसम में ज्यादा नमी और हवा का काफी ज्यादा तापमान मिलकर बहुत ज्यादा हीट स्ट्रेस के लिए अनुकूल हालात बनाते हैं. गैंगेटिक मैदान उत्तर-पश्चिमी भारत और पूर्वी तटीय इलाकों की पहचान ऐसे हॉटस्पॉट के तौर पर की गई जहाँ मुख्य रूप से गर्मियों के मौसम में ‘अनकम्पेन्सेबल हीट स्ट्रेस’ होता है.