Indian spice export quality issues: भारत का नाम आते ही दुनिया भर में मसालों की खुशबू याद आती है. सदियों से भारतीय मसाले न सिर्फ रसोई का स्वाद बढ़ाते रहे हैं, बल्कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी अहम भूमिका निभाई है. लेकिन अब यही क्षेत्र नई चुनौतियों का सामना कर रहा है.
हाल ही में केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री चिराग पासवान ने भारतीय मसालों की गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि विदेशों में भारतीय मसालों की खेप लौटना न सिर्फ निराशाजनक है, बल्कि देश की छवि के लिए भी नुकसानदायक है.
गुणवत्ता क्यों बनी सबसे बड़ी चुनौती
दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान चिराग पासवान ने कहा कि किसी भी देश का ब्रांड उसकी गुणवत्ता से बनता है. अगर उत्पाद में लगातार एक जैसी गुणवत्ता नहीं होगी, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भरोसा बनाना मुश्किल हो जाएगा.
उन्होंने यह भी बताया कि जब विदेशी बंदरगाहों से भारतीय मसालों की खेप वापस लौटाई जाती है, तो इसका सीधा असर भारत की छवि पर पड़ता है. एक ब्रांड बनाने में वर्षों की मेहनत लगती है, लेकिन एक छोटी सी गलती भी उस भरोसे को तोड़ सकती है.
आखिर क्यों लौट रहे हैं मसालों के कंसाइनमेंट
पिछले कुछ समय में कई देशों ने भारतीय मसालों को गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरने के कारण वापस लौटा दिया है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह मसालों में पाए जाने वाले कीटनाशकों और हानिकारक रसायनों के अवशेष हैं.
हर देश अपने खाद्य उत्पादों के लिए अलग-अलग नियम तय करता है, जिन्हें अधिकतम अवशेष सीमा (MRL) कहा जाता है. इन मानकों का पालन करना जरूरी होता है. लेकिन जब ये मानक पूरे नहीं होते, तो निर्यात किए गए उत्पादों को अस्वीकार कर दिया जाता है.
आंकड़े बताते हैं समस्या की गंभीरता
इकोनॉमिक्स टाइम्स टाइम्स की खबर के अनुसार, इस मुद्दे की गंभीरता को समझने के लिए आंकड़े काफी हैं. पिछले साल दुनिया भर में करीब 13,800 मसाला खेपों को खारिज किया गया, जिनमें से 6,800 से ज्यादा भारत से संबंधित थीं.
विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें सबसे बड़ी समस्या एथिलीन ऑक्साइड जैसे रसायनों की मौजूदगी है, जो यूरोप जैसे बड़े बाजारों में अलर्ट का कारण बनती है. इससे भारत के मसालों की साख पर असर पड़ता है.
भारत का मसाला बाजार कितना बड़ा है
भारत दुनिया का सबसे बड़ा मसाला उपभोक्ता है. यहां का घरेलू बाजार 10 अरब डॉलर से ज्यादा का है. वहीं भारत करीब 200 देशों में 225 से ज्यादा तरह के मसाले और उनसे जुड़े उत्पाद निर्यात करता है, जिनकी कुल कीमत 4 अरब डॉलर से अधिक है.
भारत से मिर्च पाउडर, जीरा, हल्दी, इलायची और मिक्स मसाले बड़े पैमाने पर निर्यात किए जाते हैं. इसके अलावा हींग, केसर, सौंफ, जायफल, लौंग और दालचीनी की भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छी मांग है. चीन, अमेरिका और बांग्लादेश भारतीय मसालों के प्रमुख खरीदार हैं.
समस्या की जड़ खेत से शुरू होती है
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या केवल निर्यात स्तर की नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत खेत से ही होती है. कई बार किसान सही जानकारी के अभाव में कीटनाशकों का ज्यादा या गलत इस्तेमाल कर लेते हैं.
इससे उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है. इसलिए जरूरी है कि किसानों को सही प्रशिक्षण दिया जाए, मिट्टी की नियमित जांच हो और उर्वरकों का संतुलित उपयोग किया जाए. साथ ही कीटनाशकों की बिक्री और इस्तेमाल पर भी सख्ती जरूरी है.
गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा
चिराग पासवान का मानना है कि अब भारत को सिर्फ ज्यादा उत्पादन पर नहीं, बल्कि बेहतर गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा. उन्होंने सुझाव दिया कि फूड प्रोसेसिंग, नई तकनीक और वैश्विक बाजार से बेहतर जुड़ाव के जरिए भारत अपने मसाला उद्योग को मजबूत बना सकता है.
सरकार की योजनाएं जैसे 100 फीसदी एफडीआई और प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) इस दिशा में मददगार साबित हो सकती हैं.
भविष्य के लिए क्या जरूरी है
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अब कच्चे मसालों के निर्यात से आगे बढ़कर ब्रांडेड और प्रोसेस्ड उत्पादों पर ध्यान देना होगा. इसके साथ ही जीआई टैग जैसे उपायों को मजबूत करना भी जरूरी है, जिससे भारतीय मसालों को वैश्विक स्तर पर अलग पहचान मिल सके.