Cinnamon farming: भारतीय रसोई में दालचीनी एक ऐसा मसाला है जिसकी खुशबू और स्वाद खाने का जायका पूरी तरह बदल देते हैं. चाय, मिठाई, पुलाव, सब्जी या किसी खास पकवान में इसकी हल्की सी मात्रा ही स्वाद को खास बना देती है. लेकिन दालचीनी सिर्फ स्वाद बढ़ाने वाला मसाला ही नहीं है, बल्कि यह कई औषधीय गुणों से भी भरपूर होती है. आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में इसका उपयोग लंबे समय से किया जाता रहा है.
कर्नाटक सरकार की साइट karnataka.gov.in के मुताबिक, आज के समय में दालचीनी की मांग सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है. यही वजह है कि कई किसान अब इसकी खेती की ओर भी ध्यान देने लगे हैं. सही तकनीक और अनुकूल मौसम मिलने पर इसकी खेती किसानों के लिए अच्छा मुनाफा देने वाली फसल बन सकती है. आइए जानते हैं दालचीनी के प्रमुख प्रकार और इसकी खेती करने का सही तरीका.
दालचीनी के प्रमुख प्रकार
दालचीनी को मुख्य रूप से चार प्रकारों में बांटा जाता है. इन सभी किस्मों की सुगंध, स्वाद और उपयोग अलग-अलग होता है.
सीलोन दालचीनी
पहली किस्म सीलोन दालचीनी है, जिसे असली दालचीनी भी कहा जाता है. इसका स्वाद हल्का मीठा और सुगंधित होता है. इसकी छाल पतली और नाजुक होती है, इसलिए इसे आसानी से तोड़ा जा सकता है. यह मुख्य रूप से श्रीलंका में उगाई जाती है और स्वास्थ्य के लिए सबसे बेहतर मानी जाती है. बाजार में इसकी कीमत भी अन्य किस्मों की तुलना में ज्यादा होती है.
कासिया दालचीनी
दूसरी किस्म कासिया दालचीनी है, जिसकी खेती चीन में ज्यादा की जाती है. इसकी छाल मोटी और थोड़ी सख्त होती है. इसका स्वाद तेज और हल्का तीखा होता है. बाजार में यह आसानी से उपलब्ध होने के कारण ज्यादा इस्तेमाल की जाती है और कीमत भी अपेक्षाकृत कम होती है.
कोरिंटजे दालचीनी
तीसरी किस्म कोरिंटजे दालचीनी है, जो इंडोनेशिया में बड़ी मात्रा में उगाई जाती है. इसका स्वाद संतुलित और हल्का होता है, इसलिए इसका उपयोग कई तरह के व्यंजनों में किया जाता है. यह विश्व बाजार में काफी लोकप्रिय किस्मों में से एक मानी जाती है.
वियतनामी दालचीनी
चौथी किस्म वियतनामी दालचीनी है, जिसे साइगॉन दालचीनी भी कहा जाता है. इसमें प्राकृतिक तेलों की मात्रा अधिक होती है, जिससे इसकी खुशबू काफी तेज होती है. इसका उपयोग मीठे और नमकीन दोनों प्रकार के व्यंजनों में किया जाता है.
दालचीनी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु
दालचीनी की खेती के लिए गर्म और नम जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है. इस पौधे की अच्छी वृद्धि के लिए लगभग 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान बेहतर रहता है. समुद्र तल से लगभग 500 से 1000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इसकी खेती अच्छी तरह की जा सकती है.
मिट्टी की बात करें तो दोमट या हल्की रेतीली मिट्टी इस फसल के लिए सबसे अच्छी रहती है. मिट्टी में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे पौधों की जड़ें प्रभावित हो सकती हैं.
दालचीनी की खेती कैसे करें
दालचीनी की खेती बीज या पौध की कटिंग दोनों तरीकों से की जा सकती है. खेत तैयार करते समय मिट्टी को अच्छी तरह से जोतकर उसमें जैविक खाद मिलानी चाहिए. इससे पौधों की बढ़वार अच्छी होती है.
पौधे लगाते समय उनके बीच लगभग 3 से 4 मीटर की दूरी रखनी चाहिए ताकि पौधों को फैलने और बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके. सामान्यतः जुलाई से सितंबर के बीच इसका रोपण करना अच्छा माना जाता है क्योंकि इस समय बारिश के कारण पौधों को पर्याप्त नमी मिलती रहती है.
सिंचाई और पौधों की देखभाल
जहां अच्छी बारिश होती है वहां दालचीनी के पौधों को ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती. हालांकि गर्मियों में मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिए हल्की सिंचाई करना जरूरी होता है. खेत में समय-समय पर निराई-गुड़ाई करने से खरपतवार नियंत्रण में रहते हैं और पौधों को पर्याप्त पोषण मिलता है. जैविक खाद या गोबर की खाद का उपयोग करने से पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन भी बढ़ता है.
फसल की कटाई
दालचीनी का पौधा आमतौर पर दो से तीन साल में तैयार हो जाता है. इसके बाद पेड़ की छाल को सावधानीपूर्वक निकाला जाता है. छाल निकालने के लिए मानसून का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इस दौरान छाल आसानी से अलग हो जाती है. कटाई के बाद छाल को सुखाकर गोल आकार में मोड़कर दालचीनी की स्टिक तैयार की जाती है. यही दालचीनी बाजार में मसाले के रूप में बेची जाती है.
किसानों को कैसे मिलेगा मुनाफा
दालचीनी की मांग खाद्य उद्योग, आयुर्वेदिक दवाओं और मसाला बाजार में लगातार बढ़ रही है. खासकर असली सीलोन दालचीनी की कीमत बाजार में काफी ज्यादा होती है. कई जगह इसकी कीमत 1000 से 1500 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है.
यदि किसान सही तरीके से इसकी खेती करें तो एक हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 500 से 600 किलो तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. इस तरह दालचीनी की खेती किसानों के लिए अच्छी आय का स्रोत बन सकती है.