बासमती को टक्कर देता चिन्नौर चावल, स्वाद और सुगंध में भी खास.. केवल MP में होती है खेती

मध्य प्रदेश के बालाघाट का चिन्नौर चावल स्वाद, खुशबू और छोटे दाने के लिए खास पहचान रखता है. इसे 2021 में GI टैग मिला, जिससे देश-विदेश में इसकी पहचान बढ़ी है. करीब 2,700 किसान इसकी खेती कर रहे हैं. हालांकि, इसका उत्पादन हाइब्रिड धान से कम है, लेकिन बेहतर मांग और कीमत के कारण किसानों को अच्छी आमदनी मिल रही है.

नोएडा | Published: 7 Sep, 2026 | 01:43 PM

जब भी चावल की बात होती है, तो सबसे पहले बासमती का नाम आता है. लेकिन मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले का चिन्नौर चावल भी स्वाद और खुशबू के मामले में किसी से कम नहीं है. अपनी खास पहचान के चलते इसे GI टैग मिला है. जीआई टैग मिलने से चिन्नौर की बाजार में मांग बढ़ी है. वहीं, अब किसानों को बेहतर आमदनी भी हो रही है. ऐसे चिन्नौर धान की फसल को तैयार होने में करीब 150 से 160 दिन लगते हैं. इसके पौधे सामान्य धान की तुलना में लंबे होते हैं और इनकी ऊंचाई करीब 170 सेंटीमीटर तक होती है.

चिन्नौर सुगंधित चावल को साल 2021 में GI टैग मिला है. यह मध्य प्रदेश के कृषि क्षेत्र की पहली ऐसी जिंस है, जिसे GI टैग मिला है. चिन्नौर धान की खेती बालाघाट में लंबे समय से पारंपरिक तरीके से होती आ रही है. GI टैग मिलने से चिन्नौर को देश-विदेश में नई पहचान मिली है और किसानों को अपनी उपज का बेहतर दाम मिल रहे हैं. ऐसे चिन्नौर चावल अपनी खास खुशबू, स्वाद और चिकनाई के लिए जाना जाता है. इसके दाने का ऊपरी हिस्सा तलवार की नोक जैसा दिखाई देता है. यह चावल आसानी से पच जाता है, इसलिए इसकी मांग भी रहती है. बालाघाट के कई गांवों में किसान लंबे समय से इसकी खेती कर रहे हैं.

कम उत्पादन और मार्केटिंग बनी थी परेशानी

परंपरागत तरीके से खेती के कारण चिन्नौर का उत्पादन पर्याप्त नहीं हो पा रहा था. साथ ही, चिन्नौर धान में दूसरी सुगंधित और गैर-सुगंधित किस्मों का मिश्रण भी हो जाता था. सही मार्केटिंग व्यवस्था नहीं होने के कारण किसानों को अपनी मेहनत की उपज कम कीमत पर बेचनी पड़ती थी. लेकिन GI टैग मिलने के बाद चिन्नौर की पहचान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मिली है.

दक्षिण-पूर्व एशिया में छोटे दाने वाले चावल की मांग

दक्षिण-पूर्व एशिया में मीठी खुशबू और छोटे दाने वाले चावल काफी पसंद किए जाते हैं. चिन्नौर चावल भी अपनी खास खुशबू और छोटे दाने के लिए जाना जाता है. इसके अलावा चिन्नौर धान के चोकर में तेल की मात्रा दूसरी धान किस्मों के मुकाबले ज्यादा होती है. सामान्य धान के चोकर में 18-19 फीसदी तेल होता है, जबकि चिन्नौर के चोकर में यह 20-21 फीसदी तक होता है. ऐसे में चिन्नौर से राइस ब्रान ऑयल भी एक उपयोगी मूल्यवर्धित उत्पाद के तौर पर तैयार किया जा सकता है.

मीठी खुशबू और छोटे दाने के लिए मशहूर चिन्नौर

बालाघाट जिले में करीब 2,700 किसान 1,525 हेक्टेयर जमीन में पारंपरिक तरीके से चिन्नौर धान की खेती  कर रहे हैं. इससे करीब 1,980 टन धान का उत्पादन होता है. इस धान से लगभग 1,000 टन चिन्नौर चावल तैयार किया जाता है, जिसकी देश और विदेश के बाजारों में बिक्री की जाती है. चिन्नौर अपने छोटे दाने और मीठी खुशबू के लिए खास पहचान रखता है.

क्या है GI टैग?

GI टैग किसी खास क्षेत्र में बनने वाले उत्पाद को कानूनी पहचान और सुरक्षा देता है. इससे उस उत्पाद के नाम और पहचान का गलत इस्तेमाल रोका जा सकता है. GI टैग मिलने से उत्पाद को देश-विदेश के बाजारों में पहचान मिलती है, निर्यात को बढ़ावा मिलता है और उत्पादकों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ती है.

चिन्नौर धान की खेती और खासियत

चिन्नौर धान की खेती पारंपरिक तरीके से की जाती है. इसमें मुख्य रूप से गोबर की खाद और जैविक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है. इससे चावल का प्राकृतिक स्वाद और खुशबू बनी रहती है. ऐसे चिन्नौर धान की फसल को तैयार होने में करीब 150 से 160 दिन लगते हैं. इसके पौधे सामान्य धान की तुलना में लंबे होते हैं और इनकी ऊंचाई करीब 170 सेंटीमीटर तक होती है. चिन्नौर धान का उत्पादन दूसरी हाइब्रिड किस्मों के मुकाबले कम होता है. इससे करीब 7 से 10 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन मिलता है. हालांकि, खास स्वाद और खुशबू के कारण बाजार में इसकी मांग ज्यादा रहती है. इसकी कीमत भी कई बार बासमती चावल से अधिक मिलती है.

Topics: