मौसम की मार से जूझती खेती को सहारा देगी तकनीक, जानिए क्या है क्लाइमेट-रेजिलिएंट फार्मिंग
पहले जहां मार्च और अप्रैल जैसे महीने खेती के लिए सुरक्षित माने जाते थे, वहीं अब इन महीनों में भी मौसम का मिजाज बदल गया है. इस साल 1 मार्च से 7 अप्रैल के बीच 38 दिनों में से 29 दिन अलग-अलग राज्यों में बारिश और ओलावृष्टि दर्ज की गई.व केवल मार्च महीने में ही करीब 65,000 हेक्टेयर फसल को नुकसान हुआ, जो पिछले पांच सालों में सबसे ज्यादा है.
climate resilient farming: भारत में खेती अब पहले जैसी नहीं रही. मौसम की अनिश्चितता, अचानक बारिश, ओलावृष्टि और सूखे जैसे हालात किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं. ऐसे समय में खेती को बचाने और किसानों की आय को सुरक्षित रखने के लिए “क्लाइमेट-रेजिलिएंट फार्मिंग” यानी जलवायु के अनुकूल खेती की जरूरत तेजी से महसूस की जा रही है. यह खेती का ऐसा तरीका है, जिसमें पारंपरिक ज्ञान के साथ नई तकनीकों का इस्तेमाल कर जोखिम को कम किया जाता है और उत्पादन को स्थिर रखा जाता है.
खेती और देश की अर्थव्यवस्था का गहरा रिश्ता
भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है और इसका कारण भी साफ है. देश की करीब 42 प्रतिशत आबादी आज भी खेती पर निर्भर है और यह क्षेत्र देश की GDP में लगभग 18 प्रतिशत का योगदान देता है. यानी जब खेती अच्छी होती है, तो देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है. लेकिन बदलते मौसम ने इस संतुलन को बिगाड़ना शुरू कर दिया है.
मौसम की अनिश्चितता बनी सबसे बड़ी चुनौती
इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पहले जहां मार्च और अप्रैल जैसे महीने खेती के लिए सुरक्षित माने जाते थे, वहीं अब इन महीनों में भी मौसम का मिजाज बदल गया है. इस साल 1 मार्च से 7 अप्रैल के बीच 38 दिनों में से 29 दिन अलग-अलग राज्यों में बारिश और ओलावृष्टि दर्ज की गई.व केवल मार्च महीने में ही करीब 65,000 हेक्टेयर फसल को नुकसान हुआ, जो पिछले पांच सालों में सबसे ज्यादा है.
इसके अलावा मौसम विभाग ने भी इस साल मानसून सामान्य से कम यानी लगभग 92 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो पिछले 25 सालों में सबसे कम शुरुआती अनुमान है.
अल नीनो का खतरा और बढ़ी चिंता
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस साल अल नीनो का असर देखने को मिल सकता है, जिससे मानसून कमजोर पड़ सकता है. पहले भी जब एल नीनो आया है, तब सूखा पड़ा है, फसलें खराब हुई हैं और किसानों की आय पर असर पड़ा है. ऐसे में इस साल खरीफ सीजन को लेकर चिंता बढ़ गई है.
छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित
भारत में ज्यादातर किसानों के पास छोटी जमीन होती है. ऐसे में अगर फसल खराब हो जाती है, तो उन्हें सीधे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है और कई बार कर्ज में भी फंस जाते हैं. मौसम की मार और कम आमदनी के कारण उनकी स्थिति और भी कमजोर हो जाती है.
तकनीक कैसे बदल रही खेती की तस्वीर
अब खेती में तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, जो किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बन रहा है.
1. AI आधारित मौसम पूर्वानुमान
अब किसान मोबाइल ऐप्स के जरिए 10-14 दिन पहले तक मौसम की जानकारी पा सकते हैं. इससे वे समय पर बुवाई या कटाई का फैसला ले सकते हैं और नुकसान से बच सकते हैं.
2. हाइपरलोकल मौसम अलर्ट
अब सामान्य मौसम जानकारी की बजाय गांव या खेत स्तर की सटीक जानकारी मिल रही है. इससे किसान अपने इलाके के हिसाब से फैसले ले सकते हैं.
3. स्मार्ट सिंचाई सिस्टम
पानी की कमी को देखते हुए अब स्मार्ट सिंचाई तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है. इसमें मिट्टी की नमी, मौसम और डेटा के आधार पर पानी दिया जाता है, जिससे पानी की बचत होती है और फसल भी सुरक्षित रहती है.
4. सैटेलाइट से निगरानी
अब सैटेलाइट के जरिए खेतों की निगरानी की जा रही है. इससे बाढ़ या जलभराव की स्थिति का तुरंत पता चल जाता है और समय रहते कार्रवाई की जा सकती है.
5. फसल बदलने की रणनीति
तकनीक की मदद से अब किसान यह तय कर सकते हैं कि किस मौसम में कौन-सी फसल ज्यादा सुरक्षित और लाभदायक होगी. इससे नुकसान का खतरा कम होता है.
जल संकट भी बड़ी चिंता
एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2000 से 2015 के बीच सिंचाई के लिए पानी का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल हुआ है. आज लगभग 17 प्रतिशत भूजल क्षेत्र “ओवर-एक्सप्लॉइटेड” यानी जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल की स्थिति में पहुंच चुके हैं, जबकि करीब 4 प्रतिशत क्षेत्र गंभीर स्थिति में हैं. ऐसे में पानी का सही उपयोग करना बेहद जरूरी हो गया है.
तकनीक अपनाने में चुनौतियां
हालांकि तकनीक खेती को बेहतर बना सकती है, लेकिन इसे हर किसान तक पहुंचाना आसान नहीं है. ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच जानकारी और संसाधनों का अंतर अभी भी बड़ी समस्या है. कई किसानों तक सही समय पर जानकारी नहीं पहुंच पाती, जिससे वे इन तकनीकों का पूरा फायदा नहीं उठा पाते.
भविष्य की खेती कैसी होगी
आने वाले समय में खेती पूरी तरह बदलने वाली है. अब सिर्फ मेहनत से काम नहीं चलेगा, बल्कि जानकारी और तकनीक भी उतनी ही जरूरी होगी. पारंपरिक खेती के अनुभव और आधुनिक तकनीक का मेल ही किसानों को भविष्य के संकटों से बचा सकता है.