कीटनाशक नहीं, ये देसी नुस्खा अपनाइए! लाही कंट्रोल के साथ नीलगाय से भी फसल सुरक्षित
लाही कीट और नीलगाय से परेशान किसानों के लिए देसी जैविक उपाय चर्चा में है. नीम, धतूरा, करंज और गौमूत्र से तैयार निर्मास्त्र का छिड़काव कीट प्रबंधन में मदद करता है. विशेषज्ञों के मुताबिक यह कम लागत वाली प्राकृतिक खेती का उपयोगी विकल्प बन सकता है.
Nirmastra Organic Pesticide: बारिश के मौसम में अरहर समेत कई खरीफ फसलों पर लाही (एफिड) का प्रकोप किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. वहीं कई राज्यों में नीलगाय के कारण फसलों को भारी नुकसान भी होता है. ऐसे में किसानों के बीच एक पारंपरिक जैविक घोल ‘निर्मास्त्र’ चर्चा में है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, यह नीम, धतूरा, करंज, अमरूद और पपीते की पत्तियों के साथ गौमूत्र से तैयार होने वाला जैविक मिश्रण है, जिसका उपयोग कीट प्रबंधन में किया जाता है. हालांकि नीलगाय को दूर रखने का दावा किसानों के स्थानीय अनुभव पर आधारित है और इस पर व्यापक वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है.
लाही कीट से बचाव में कैसे मदद करता है निर्मास्त्र?
कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार बताते हैं कि लाही एक रस चूसने वाला कीट है, जो अरहर, सब्जियों और अन्य दलहनी फसलों की पत्तियों व कोमल टहनियों का रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देता है. इसके कारण पत्तियां मुड़ने लगती हैं और उत्पादन प्रभावित हो सकता है. निर्मास्त्र में मौजूद नीम और करंज जैसे पौधों के प्राकृतिक तत्व कई प्रकार के चूसक कीटों पर प्रतिरोधी प्रभाव डालते हैं. नियमित अंतराल पर इसका छिड़काव करने से कीटों की संख्या नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है, जिससे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता भी घटती है.
घर पर ऐसे तैयार करें जैविक निर्मास्त्र
इस जैविक घोल को तैयार करने के लिए नीम, धतूरा, करंज, अमरूद और पपीते की लगभग 5-5 किलो पत्तियां लें. इन्हें अच्छी तरह पीसकर एक बड़े प्लास्टिक ड्रम में डालें. इसके बाद बरगद के पेड़ के पास की थोड़ी मिट्टी और पर्याप्त मात्रा में गौमूत्र मिलाएं. मिश्रण को ढककर लगभग 48 घंटे तक छाया वाली जगह पर रखें. तैयार होने के बाद इसे घड़ी की दिशा में अच्छी तरह चलाएं और छानकर पानी में मिलाकर फसलों पर छिड़काव करें. विशेषज्ञों का कहना है कि छिड़काव सुबह या शाम के समय करना अधिक उपयुक्त रहता है.
क्या नीलगाय को भी दूर रख सकती है यह दवा?
कई किसानों का अनुभव है कि निर्मास्त्र की तेज गंध वाले खेतों में नीलगाय कम आती है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, इसकी गंध कुछ जंगली जानवरों को असहज कर सकती है, लेकिन इसे नीलगाय से बचाव का वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उपाय नहीं माना जा सकता. यदि किसी क्षेत्र में नीलगाय की समस्या गंभीर है, तो जैविक घोल के साथ सौर फेंसिंग, जीवित बाड़, सामुदायिक सुरक्षा और खेत की नियमित निगरानी जैसे उपाय अपनाना अधिक प्रभावी रहेगा.
लागत घटाने में भी बन सकता है उपयोगी विकल्प
विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक खेती अपनाने वाले किसानों के लिए निर्मास्त्र कम लागत वाला विकल्प हो सकता है. इसकी अधिकांश सामग्री खेत या गांव में आसानी से उपलब्ध हो जाती है, जिससे बाजार से महंगी दवाएं खरीदने की जरूरत कम पड़ती है. हालांकि किसी भी जैविक या रासायनिक दवा का उपयोग फसल की स्थिति, कीट प्रकोप और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार ही करना चाहिए. इससे फसल सुरक्षा के साथ बेहतर उत्पादन प्राप्त करने की संभावना बढ़ जाती है.