अल-नीनो बढ़ाएगा किसानों की चिंता! जानें कमजोर मानसून का किन फसलों पर पड़ सकता है सबसे बड़ा असर?

El Nino Impact on Crops: अल-नीनो के कारण भारतीय मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे कई क्षेत्रों में बारिश कम होने की आशंका रहती है. इसका सबसे ज्यादा असर धान, कपास, गन्ना और दलहनी फसलों पर पड़ सकता है. कम बारिश और बढ़ते तापमान से फसलों की ग्रोथ प्रभावित होने के साथ कीटों का प्रकोप भी बढ़ सकता है.

नोएडा | Updated On: 3 Jun, 2026 | 06:55 PM

El Nino Impact: देश के कई हिस्सों में गर्मी लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है. हीटवेव और बदलते मौसम के बीच अब किसानों की चिंता एक और वजह से बढ़ गई है-अल नीनो. मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रशांत महासागर में होने वाला यह मौसमी बदलाव दुनिया के कई देशों के मौसम को प्रभावित करता है और भारत भी इससे अछूता नहीं रहता. अल-नीनो के दौरान समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है, जिससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ सकता है. इसका सीधा असर खेती-किसानी पर देखने को मिलता है, खासकर खरीफ सीजन की फसलों पर.

क्या है अल-नीनो और क्यों बढ़ती है चिंता?

अल-नीनो एक प्राकृतिक मौसमी घटना है, जो प्रशांत महासागर के पानी के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी के कारण होती है. जब यह स्थिति बनती है, तो मानसूनी हवाओं की ताकत कमजोर पड़ जाती है. नतीजतन, कई इलाकों में सामान्य से कम बारिश होती है और सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून खेती की रीढ़ माना जाता है. ऐसे में अगर बारिश कम हो जाए या समय पर न पहुंचे, तो किसानों की फसलें प्रभावित होना तय है.

खरीफ फसलों पर सबसे ज्यादा असर

अल-नीनो का सबसे बड़ा असर खरीफ सीजन की फसलों पर पड़ता है. इनमें सबसे पहले धान की खेती प्रभावित होती है. धान की रोपाई और शुरुआती ग्रोथ के लिए पर्याप्त पानी की जरूरत होती है. अगर मानसून कमजोर रहता है, तो रोपाई में देरी हो सकती है और पैदावार भी घट सकती है.

धान के अलावा कपास की फसल भी इस मौसमीय बदलाव से प्रभावित होती है. अधिक तापमान और कम नमी के कारण सफेद मक्खी और एफिड्स जैसे कीट तेजी से बढ़ने लगते हैं, जिससे फसल को नुकसान पहुंचता है.

गन्ना और दलहनी फसलें भी खतरे में

गन्ना एक ऐसी नकदी फसल है जिसे लंबे समय तक पर्याप्त सिंचाई की जरूरत होती है. बारिश कम होने और जल स्रोतों पर दबाव बढ़ने से गन्ने की फसल प्रभावित हो सकती है. कई क्षेत्रों में पानी की कमी के कारण फसल की क्लाविटी और उत्पादन दोनों पर असर पड़ सकता है. वहीं अरहर, मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलें भी मिट्टी में नमी की कमी से प्रभावित होती हैं. अगर समय पर बारिश न मिले, तो पौधों की बढ़वार धीमी पड़ जाती है और उत्पादन घट सकता है.

किसानों के लिए क्या हैं बचाव के उपाय?

मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए किसानों को खेती के तरीकों में कुछ बदलाव करने की जरूरत है. किसान कम पानी में तैयार होने वाली और सूखा सहन करने वाली उन्नत किस्मों का चयन करें. इससे कम बारिश की स्थिति में भी फसल को बचाया जा सकता है. इसके साथ ही ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों को अपनाना भी फायदेमंद हो सकता है. ये तकनीकें कम पानी में अधिक क्षेत्र की सिंचाई करने में मदद करती हैं.

मौसम की जानकारी पर रखें नजर

किसानों के लिए मौसम विभाग (IMD) के पूर्वानुमानों पर लगातार नजर रखना बेहद जरूरी है. बारिश की स्थिति को देखते हुए बुवाई के समय में बदलाव किया जा सकता है, जिससे नुकसान की संभावना कम हो जाती है. मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल भी कारगर साबित हो सकता है. इसके अलावा केवल एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय मल्टी-क्रॉपिंग यानी एक से अधिक फसलों की खेती करने से जोखिम कम किया जा सकता है.

Published: 3 Jun, 2026 | 10:30 PM

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