मॉनसून में इस तकनीक से करें सब्जियों की खेती, सड़न रुकेगी और मुनाफा 2 गुना तक बढ़ेगा

मॉनसून के मौसम में बेलदार सब्जियों की फसल को सड़न और रोगों से बचाना बड़ी चुनौती होती है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मचान विधि अपनाकर किसान फसल की गुणवत्ता सुधार सकते हैं. ये तकनीक उत्पादन बढ़ाने, रोगों का खतरा कम करने और बेहतर बाजार भाव दिलाने में मददगार साबित हो रही है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 1 Jun, 2026 | 03:48 PM

Monsoon Farming: मॉनसून के मौसम में सब्जी उत्पादक किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती फसलों को सड़न, कीटों और रोगों से बचाने की होती है. लगातार बारिश और अधिक नमी के कारण बेलदार सब्जियों की फसल अक्सर प्रभावित हो जाती है, जिससे उत्पादन और किसानों की आय दोनों पर असर पड़ता है. कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार, ऐसे मौसम में मचान विधि अपनाकर किसान न केवल फसल को सुरक्षित रख सकते हैं, बल्कि उत्पादन और मुनाफे में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर सकते हैं.

कद्दू वर्गीय सब्जियों के लिए बेहद कारगर है मचान विधि

कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार बताते हैं कि मचान विधि विशेष रूप से कद्दू वर्गीय सब्जियों जैसे लौकी, तोरई, करेला और कद्दू की खेती के लिए फायदेमंद है. इस तकनीक में बेलों को जमीन पर फैलाने के बजाय जालीनुमा संरचना के सहारे ऊपर चढ़ाया जाता है. इससे फल मिट्टी के सीधे संपर्क में नहीं आते और हवा में लटके रहते हैं. जमीन से दूरी बने रहने के कारण फलों में सड़न और खराब होने का खतरा काफी कम हो जाता है. साथ ही सब्जियों की गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहती है, जिससे बाजार में अच्छी कीमत मिलने की संभावना बढ़ जाती है.

कम लागत में तैयार हो जाता है मजबूत मचान

विशेषज्ञों के अनुसार किसान बांस, लकड़ी, लोहे या सीमेंट के खंभों की मदद से मचान तैयार  कर सकते हैं. आमतौर पर खेत में 5 से 7 फीट ऊंचे खंभे लगाए जाते हैं और उनके बीच लगभग 10×10 फीट की दूरी रखी जाती है. इसके बाद ऊपर तार या मजबूत रस्सियों की सहायता से जालीनुमा ढांचा बनाया जाता है, जिस पर बेलदार पौधे आसानी से फैल जाते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में बांस और लकड़ी आसानी से उपलब्ध होने के कारण इसकी लागत भी अपेक्षाकृत कम आती है. एक बार तैयार की गई संरचना का उपयोग लगभग तीन वर्षों तक किया जा सकता है, जिससे किसानों का खर्च और कम हो जाता है.

रोग और कीट नियंत्रण में भी मिलती है मदद

मचान विधि  अपनाने से पौधों के बीच वायु संचार बेहतर बना रहता है. पर्याप्त हवा मिलने से पौधों में नमी कम जमती है, जिससे फफूंदजनित रोगों और कीटों का प्रकोप घट जाता है. यदि किसी कारण फसल में बीमारी दिखाई भी देती है, तो मचान पर चढ़ी फसल में दवा का छिड़काव करना काफी आसान हो जाता है. इससे उपचार प्रभावी होता है और फसल को नुकसान कम पहुंचता है. खरपतवार की समस्या भी सामान्य खेती की तुलना में कम देखने को मिलती है.

देसी उपाय और सही सिंचाई से बढ़ेगा उत्पादन

कृषि विशेषज्ञ प्रमोद कुमार के अनुसार किसान रोगों से बचाव  के लिए कुछ देसी उपाय भी अपना सकते हैं. इसके तहत 5 लीटर खट्टा छाछ, 2 लीटर गोमूत्र और 40 लीटर पानी मिलाकर घोल तैयार किया जाता है. इस मिश्रण का छिड़काव करने से बेलों को कई प्रकार के रोगों से बचाने में मदद मिलती है और लगभग तीन सप्ताह तक सुरक्षा बनी रह सकती है. वहीं, फसल की बेहतर बढ़वार के लिए नमी के अनुसार हर तीसरे दिन सिंचाई करना लाभदायक माना जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि बरसात के मौसम में मचान विधि अपनाने से फसल खराब होने का खतरा कम होता है, उत्पादन बढ़ता है और किसानों को अधिक मुनाफा मिलने की संभावना बनती है.

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