अल नीनो की दस्तक से चावल-गेहूं समेत कई फसलों पर संकट, मौसम बिगड़ा तो बढ़ सकती हैं कीमतें
अल नीनो से चावल, गेहूं, मक्का, चीनी, कोको और पाम ऑयल समेत कई कृषि जिंसों पर मौसम का जोखिम बढ़ गया है. चावल सबसे ज्यादा चिंता का विषय है. हालांकि, भारत का बढ़ा हुआ बफर स्टॉक राहत दे रहा है. वहीं, यूरोप और ब्लैक सी क्षेत्र में गर्मी व सूखे से गेहूं-मक्का की वैश्विक सप्लाई प्रभावित होने की आशंका है.
पिछले महीने अल नीनो की शुरुआत के बाद दुनिया की कई कृषि फसलों पर मौसम का खतरा बढ़ गया है. चावल, गेहूं, कोको, पाम ऑयल, चीनी और रोबस्टा कॉफी जैसी खाद्य पदार्थों पर इसका असर पड़ सकता है. हालांकि, अल नीनो का प्रभाव हर फसल पर एक जैसा नहीं होगा. इसका असर उत्पादन वाले क्षेत्रों और वहां के मौसम पर निर्भर करेगा. हालांकि, फिच सॉल्यूशंस की यूनिट, रिसर्च एजेंसी BMI ने कहा है कि चावल सबसे ज्यादा चिंता का विषय है. इसकी वजह यह है कि दुनिया में चावल का अतिरिक्त स्टॉक सीमित है और उत्पादन व निर्यात का बड़ा हिस्सा एशियाई देशों पर निर्भर है. इन देशों में मौसम में बदलाव का असर चावल की फसल पर जल्दी पड़ सकता है.
हालांकि, भारत में चावल का बफर स्टॉक बढ़ने से कुछ राहत मिली है. BMI के अनुसार, भारत का चावल भंडार 2023-24 में कुल खपत के 30.1 फीसदी के बराबर था, जो 2026-27 में बढ़कर अनुमानित 42.2 फीसदी हो गया है. एजेंसी का कहना है कि बढ़ा हुआ स्टॉक भारत को चावल के निर्यात पर अचानक प्रतिबंध लगाने से बचा सकता है. 2023-24 में चावल की कीमतों में तेजी का बड़ा कारण फसल को हुए नुकसान से ज्यादा भारत समेत कुछ देशों की ओर से पहले ही लगाए गए निर्यात प्रतिबंध थे. इस बार पर्याप्त भंडार होने से ऐसी स्थिति बनने की संभावना कम है.
यूरोप का सूखा और ब्लैक सी की परेशानी बढ़ा रही अनाज की चिंता
रिसर्च एजेंसी BMI के मुताबिक, मक्का और गेहूं पर अल नीनो का सीधा असर फिलहाल सीमित रहने की संभावना है. इन फसलों का उत्पादन और कारोबार ऐसे क्षेत्रों में ज्यादा होता है, जहां अल नीनो का असर कम से मध्यम रहता है. हालांकि, ब्लैक सी क्षेत्र में बढ़ती परेशानी, यूरोप में सूखा और कुछ प्रमुख निर्यातक देशों में उत्पादन घटने से गेहूं और मक्का की वैश्विक सप्लाई पहले ही प्रभावित हो रही है.
कोको, पाम ऑयल और चीनी पर अल नीनो का खतरा बढ़ा
वहीं, डच वित्तीय कंपनी राबोबैंक के अनुसार, मजबूत होता अल नीनो कोको, पाम ऑयल, चीनी, रोबस्टा कॉफी और ऑस्ट्रेलियाई अनाज के लिए मौसम संबंधी जोखिम बढ़ा रहा है. इन जिंसों पर खराब मौसम का असर ज्यादा पड़ सकता है. राबोबैंक ने कहा कि खाद्य और पेय कंपनियों पर इसका असर मुख्य रूप से कच्चे माल की उपलब्धता और कीमतों के जरिए देखने को मिलेगा. हालांकि, अलग-अलग बाजारों में असर का समय और उसकी तीव्रता अलग हो सकती है.
आगे का मौसम तय करेगा उत्पादन
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की कृषि बाजार सूचना प्रणाली (AMIS) ने कहा कि अभी तक मौसम की स्थिति सामान्य तौर पर फसलों के लिए अनुकूल रही है. हालांकि, आगे बचे फसल सीजन में मौसम का रुख उत्पादन की अंतिम तस्वीर तय करने में अहम भूमिका निभाएगा. मौसम की स्थिति इस समय कृषि बाजार के लिए बड़ी चिंता बनी हुई है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की कृषि बाजार सूचना प्रणाली (AMIS) के मुताबिक, यूरोप, ब्लैक सी क्षेत्र और उत्तरी अमेरिका के कुछ हिस्सों में फसल के अहम चरण के दौरान गर्म और शुष्क मौसम का असर पड़ा है.
गर्मी से मक्के की फसल पर खतरा
हालांकि, कई इलाकों में हुई बारिश से कुछ राहत मिली है, लेकिन लगातार गर्मी से फसल जल्दी पक सकती है. इससे दाने भरने का समय कम हो जाता है और उत्पादन घट सकता है. खासकर उन क्षेत्रों में जोखिम ज्यादा है, जहां मिट्टी में पहले से नमी कम है. AMIS ने कहा कि उत्तरी गोलार्ध के बड़े हिस्से में मक्के की फसल अभी उत्पादन तय करने वाले चरण में है. इसलिए आने वाले कुछ हफ्तों में मौसम में होने वाले बदलाव पर बाजार की नजर बनी रहेगी.
मक्के पर अल नीनो का असर सीमित
रिसर्च एजेंसी BMI के मुताबिक, अल नीनो का मक्के पर सीधा असर सबसे कम रहने की संभावना है. इसकी वजह यह है कि दुनिया के प्रमुख मक्का उत्पादक अमेरिका, ब्राजील और अर्जेंटीना ऐसे क्षेत्रों में हैं, जहां अल नीनो का जोखिम तुलनात्मक रूप से कम है. रिसर्च एजेंसी BMI के मुताबिक, मौसम में बदलाव से फसलों की बुवाई और कटाई का समय प्रभावित हो सकता है, लेकिन बड़े पैमाने पर उत्पादन घटने की संभावना फिलहाल कम है. दक्षिण अफ्रीका में शुरुआती स्टॉक भी मजबूत है. यहां शुरुआती भंडार कुल खपत के 17.9 फीसदी तक पहुंच गया है, जो पहले 14.9 फीसदी था. इससे क्षेत्र को कुछ राहत मिली है.