धान किसानों के लिए खुशखबरी! ICAR-IRRI की ये 2 नई किस्में कम पानी में देंगी ज्यादा पैदावार, घटेगा खेती का खर्च

New Paddy Varieties 2026: ICAR और IRRI ने धान की दो नई किस्में DRR Dhan 92 और CR Dhan 217 विकसित की हैं. ये किस्में DSR तकनीक के लिए तैयार की गई हैं, जिससे 20-30 फीसदी तक पानी की बचत, कम मजदूरी और कम लागत में ज्यादा उत्पादन मिल सकता है.

नोएडा | Updated On: 6 Jun, 2026 | 10:03 AM

ICAR-IRRI New Rice Varieties: भारत में धान की खेती करने वाले किसानों के लिए एक अच्छी खबर सामने आई है. खेती में बढ़ती लागत, पानी की कमी और मजदूरों की समस्या के बीच वैज्ञानिकों ने धान की दो नई किस्में विकसित की हैं, जो कम संसाधनों में बेहतर उत्पादन देने का दावा करती हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI) द्वारा विकसित ये किस्में भविष्य की खेती को आसान और ज्यादा टिकाऊ बनाने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही हैं. खास बात यह है कि इन किस्मों को डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक के लिए तैयार किया गया है, जिससे किसानों का खर्च कम होगा और पानी की भी बचत होगी.

क्या है DSR तकनीक?

पारंपरिक धान की खेती में पहले नर्सरी तैयार की जाती है और बाद में पौधों की रोपाई की जाती है. इस प्रक्रिया में काफी पानी, मजदूरी और समय लगता है. वहीं DSR यानी डायरेक्ट सीडेड राइस तकनीक में धान के बीज सीधे खेत में बो दिए जाते हैं. इससे खेत में बार-बार पानी भरने की जरूरत नहीं पड़ती. इस तकनीक से 20 से 30 प्रतिशत तक पानी की बचत की जा सकती है. इसके अलावा मजदूरी का खर्च भी कम होता है और खेती की कुल लागत घट जाती है.

कौन-कौन सी नई किस्में हुईं विकसित?

वैज्ञानिकों ने DSR खेती को ध्यान में रखते हुए दो नई धान किस्में तैयार की हैं: DRR Dhan 92 और CR Dhan 217.

DRR Dhan 92

यह किस्म खासतौर पर DSR तकनीक के लिए विकसित की गई है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि कम अनुकूल परिस्थितियों में भी यह अच्छी पैदावार देने की क्षमता रखती है. राष्ट्रीय स्तर पर किए गए परीक्षणों में इस किस्म ने लगभग 5.8 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दिया. यह पारंपरिक MTU-1010 किस्म की तुलना में करीब 18 प्रतिशत अधिक उपज देने में सक्षम पाई गई है. पूर्वोत्तर भारत के किसानों के लिए इसे काफी उपयोगी माना जा रहा है.

CR Dhan 217

यह किस्म भी किसानों के लिए काफी लाभदायक मानी जा रही है. इसकी औसत उपज लगभग 5.9 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है. अनुकूल परिस्थितियों में यह 8.7 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दे सकती है. यह किस्म करीब 118 दिनों में तैयार हो जाती है और पूर्वी तथा मध्य भारत के क्षेत्रों के लिए उपयुक्त मानी जा रही है.

क्या हैं इन नई किस्मों की खासियत?

ICAR-IRRI के वैज्ञानिकों के अनुसार इन किस्मों में कई ऐसे गुण शामिल किए गए हैं जो इन्हें सामान्य किस्मों से अलग बनाते हैं. इन पौधों की शुरुआती बढ़वार तेज होती है, जिससे खरपतवारों को बढ़ने का मौका कम मिलता है. इसके अलावा तेज हवा या बारिश के दौरान फसल गिरने की संभावना भी कम रहती है. इन किस्मों में ऐसे गुण भी मौजूद हैं, जिनकी वजह से कम ऑक्सीजन या कुछ समय तक जलभराव जैसी परिस्थितियों में भी फसल बेहतर प्रदर्शन कर सकती है. बदलते मौसम में भी इनकी पैदावार स्थिर रहने की संभावना बताई जा रही है.

किसानों को कैसे होगा फायदा?

नई किस्मों के आने से किसानों को कई तरह के लाभ मिल सकते हैं. सबसे बड़ा फायदा पानी की बचत का होगा. जिन क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, वहां DSR तकनीक और ये नई किस्में काफी मददगार साबित हो सकती हैं. इसके अलावा मजदूरी पर होने वाला खर्च कम होगा, खेती की लागत घटेगी और उत्पादन बेहतर मिलने की संभावना बढ़ेगी. मौसम की अनिश्चितता के बीच भी किसानों को फसल नुकसान का खतरा कुछ हद तक कम हो सकता है.

क्यों जरूरी है खेती में यह बदलाव?

देश के कई हिस्सों में भूजल तेजी से घट रहा है. वहीं खेती के लिए मजदूरों की उपलब्धता भी पहले जैसी नहीं रही. इसके अलावा मौसम में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है, जिससे खेती करना पहले की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है. ऐसे समय में कम पानी और कम लागत वाली तकनीकों को अपनाना जरूरी माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि DSR तकनीक और नई धान किस्में किसानों को भविष्य की चुनौतियों से निपटने में मदद कर सकती हैं.

Published: 6 Jun, 2026 | 10:01 AM

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