मार्च में नींबू के बाग में भूलकर भी न करें ये गलती! अपनाएं एक्सपर्ट के ये 8 टिप्स, फलों से लद जाएंगे पेड़

Nimbu Ki Kheti: मार्च का महीना नींबू और अन्य साइट्रस फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है. इस समय पौधों में नई कोंपलें, फूल और फल बनने की प्रक्रिया शुरू होती है. अगर किसान इस दौरान सही तरीके से खाद प्रबंधन, सिंचाई, छंटाई और कीट-रोग नियंत्रण करें तो उत्पादन और क्वालिटी दोनों में बड़ा सुधार किया जा सकता है. पढ़ें एक्सपर्ट ने क्या टिप्स दिए हैं..

नोएडा | Updated On: 11 Mar, 2026 | 11:50 AM

Lemon Farming In March: भारत में नींबू वर्गीय फसलें-जैसे नींबू, कागजी नींबू, संतरा, मौसमी और किन्नू-किसानों की आय का एक महत्वपूर्ण सोर्स माने जाते हैं. खासकर उत्तर भारत में मार्च का महीना इन फसलों के लिए बहुत अहम माना जाता है. बिहार स्थित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में कृषि वैज्ञानिक डॉ. एस.के. सिंह ने किसान इंडिया (Kisan India) से बातचीत में कहा कि इस समय सर्दी धीरे-धीरे खत्म होती है, तापमान बढ़ने लगता है और वसंत ऋतु का प्रभाव दिखाई देता है. यह मौसम पौधों में नई कोंपलें निकलने, फूल बनने और फल बनने की प्रक्रिया के लिए बेहद अनुकूल होता है.

अगर किसान इस समय नींबू के बागों की वैज्ञानिक तरीके से देखभाल करें, तो पौधों में फलधारण बेहतर होता है, फलों का गिरना कम होता है और उत्पादन की गुणवत्ता भी अच्छी रहती है. इसलिए मार्च महीने में किए जाने वाले जरूरी कृषि कार्यों की जानकारी किसानों के लिए बेहद जरूरी है.

नई वृद्धि और फूलों का प्रबंधन

डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार मार्च महीने में नींबू के पौधों में नई कोंपलें निकलने लगती हैं और कई किस्मों में फूल आने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है. यह समय पौधों की तेज ग्रोथ का होता है, इसलिए पौधों को स्वस्थ और मजबूत बनाए रखने के लिए छंटाई करना जरूरी होता है.

किसानों को सबसे पहले सूखी, रोगग्रस्त और आपस में टकराने वाली टहनियों को काट देना चाहिए. इससे पौधों में हवा और रोशनी का संचार बेहतर होता है, जिससे कीट और रोगों का खतरा भी कम हो जाता है. छंटाई के बाद कटे हुए हिस्से पर बोर्डो पेस्ट या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का लेप लगाना लाभकारी होता है. साथ ही पौधों को संतुलित पोषण देना भी जरूरी है, जिससे फूलों की संख्या बढ़ती है और बाद में फल बनने की संभावना अधिक रहती है.

खाद और पोषण प्रबंधन

मार्च महीने में पौधों को पर्याप्त पोषक तत्व देना बहुत जरूरी होता है क्योंकि इसी समय पौधे नई वृद्धि और पुष्पन के लिए अधिक ऊर्जा लेते हैं. एक वयस्क पौधे के लिए लगभग 200-250 ग्राम नाइट्रोजन, 100-150 ग्राम फास्फोरस और 150-200 ग्राम पोटाश देना उपयुक्त माना जाता है.

इन उर्वरकों को पौधे के चारों ओर गोलाई में मिट्टी में मिलाकर देना चाहिए. इसके अलावा प्रति पौधा 10-15 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद या वर्मी कम्पोस्ट देना भी फायदेमंद होता है. इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों की जड़ों को बेहतर पोषण मिलता है.

जैव उर्वरकों जैसे एजोटोबैक्टर और फॉस्फेट सोल्युबलाइजिंग बैक्टीरिया (PSB) का उपयोग भी मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में मदद करता है.

सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति

नींबू के पौधों में अक्सर जिंक, बोरान और आयरन की कमी देखी जाती है. इसकी पूर्ति के लिए जिंक सल्फेट, बोरॉन और फेरस सल्फेट का 0.3 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव किया जा सकता है. इससे पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और फूलों की संख्या भी बढ़ती है.

सिंचाई का सही प्रबंधन

मार्च में तापमान बढ़ने के कारण मिट्टी की नमी तेजी से कम होने लगती है. इसलिए पौधों को नियमित अंतराल पर पानी देना जरूरी होता है. अगर बारिश नहीं हो रही हो तो 10 से 15 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई करनी चाहिए.

ध्यान रखें कि जरूरत से ज्यादा पानी देने से जड़ों में सड़न की समस्या हो सकती है. आजकल ड्रिप सिंचाई प्रणाली को काफी प्रभावी माना जाता है, क्योंकि इससे पानी की बचत होती है और पौधों की जड़ों तक धीरे-धीरे नमी पहुंचती रहती है.

कीटों से बचाव

मार्च में तापमान बढ़ने के साथ नींबू के बागों में कई कीट सक्रिय हो जाते हैं. इनमें सिट्रस लीफ माइनर, सिट्रस पायला और स्केल कीट प्रमुख हैं. सिट्रस लीफ माइनर नई पत्तियों में सुरंग बनाकर उन्हें नुकसान पहुंचाता है. इसके नियंत्रण के लिए नीम तेल या डाइमिथोएट का छिड़काव किया जा सकता है. सिट्रस पायला पत्तियों से रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देता है, जिसके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड का प्रयोग किया जाता है. वहीं स्केल कीट शाखाओं और फलों पर चिपककर नुकसान पहुंचाते हैं, जिन्हें नियंत्रित करने के लिए नीम तेल या क्लोरपायरीफॉस का छिड़काव उपयोगी होता है.

रोगों से सुरक्षा

नींबू की फसल में एन्थ्रेक्नोज, साइट्रस कैंकर और गमोसिस जैसे रोग भी देखने को मिलते हैं. एन्थ्रेक्नोज रोग में पत्तियों और फलों पर काले धब्बे बन जाते हैं, जिसे नियंत्रित करने के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या कार्बेन्डाजिम का छिड़काव किया जाता है.

साइट्रस कैंकर एक बैक्टीरियल रोग है जिसमें पत्तियों और फलों पर घाव बन जाते हैं. इसके नियंत्रण के लिए स्ट्रेप्टोसाइक्लिन और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का मिश्रण प्रभावी होता है. गमोसिस रोग में तने से गोंद निकलने लगता है, जिसके उपचार के लिए प्रभावित भाग को साफ करके उस पर बोर्डो पेस्ट लगाना चाहिए.

मल्चिंग और खरपतवार नियंत्रण

मार्च में खरपतवार तेजी से बढ़ते हैं, जिससे पौधों को मिलने वाले पोषक तत्व और पानी कम हो सकते हैं. इसे रोकने के लिए पौधों के आसपास सूखी घास, पत्तियां या भूसे से मल्चिंग करना फायदेमंद होता है. इससे मिट्टी की नमी बनी रहती है और खरपतवार की वृद्धि भी कम होती है.

फलों के गिरने की समस्या कैसे रोकें

नींबू में फूल आने के बाद कई बार छोटे फल गिरने लगते हैं, जिससे उत्पादन कम हो जाता है. इसे रोकने के लिए पौधों को पर्याप्त पोषण और सिंचाई देना जरूरी है. इसके अलावा बोरॉन 0.3 प्रतिशत और जिबरेलिक एसिड (GA₃) का छिड़काव करने से फलधारण बढ़ता है और फल गिरने की समस्या कम होती है. मार्च में बाग का नियमित निरीक्षण करना भी जरूरी है. अगर किसी पौधे में कीट या रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई दें तो तुरंत नियंत्रण के उपाय करने चाहिए. संक्रमित पत्तियों और टहनियों को काटकर नष्ट कर देना चाहिए और बाग के आसपास साफ-सफाई बनाए रखनी चाहिए.

मार्च का महीना नींबू की खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है. इस समय पौधों में नई वृद्धि, फूल और फल बनने की प्रक्रिया शुरू होती है. अगर किसान इस दौरान खाद प्रबंधन, सिंचाई, छंटाई और कीट-रोग नियंत्रण पर ध्यान दें, तो उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में काफी सुधार किया जा सकता है.

Note: डॉ. एस.के. सिंह बिहार के डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (पूसा-848125, समस्तीपुर) में पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी के विभागाध्यक्ष एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान हैं. इन्होंने कृषि क्षेत्र में कई उल्लेखनीय शोध किए हैं.

Published: 11 Mar, 2026 | 11:10 AM

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