पंजाब में धान का दबदबा, रकबा 32 लाख हेक्टेयर के पार.. 92 फीसदी जमीन पर चावल की खेती
पंजाब में फसल विविधीकरण की कोशिशों के बावजूद धान पर निर्भरता बढ़ती जा रही है. 2026 के खरीफ सीजन में चावल का रकबा रिकॉर्ड 32.86 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है. वहीं कपास, मक्का और दलहन की खेती घट रही है. दलहन का रकबा 81 फीसदी तक कम हुआ है. इससे भूजल संकट और मिट्टी की सेहत को लेकर चिंता बढ़ी है.
पंजाब कई सालों से अपनी खेती को धान की फसल से हटाकर दूसरी फसलों की ओर ले जाने की कोशिश कर रहा है. हालांकि, इस साल के खरीफ आंकड़े बताते हैं कि राज्य में फसल विविधीकरण की जगह धान पर निर्भरता और बढ़ गई है. 2026 के खरीफ सीजन में पंजाब में धान और बासमती समेत चावल की खेती का रकबा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. राज्य के कुल खरीफ कृषि क्षेत्र का 92 फीसदी से ज्यादा हिस्सा अब चावल की खेती के तहत आ गया है. इस साल खरीफ सीजन में कुल 35.55 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में खेती हुई है. इसमें चावल का रकबा बढ़कर करीब 32.86 लाख हेक्टेयर हो गया है. इसमें सामान्य धान (परमल या नॉन-बासमती) के साथ बासमती भी शामिल है.
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब में खरीफ सीजन के दौरान करीब 41 लाख हेक्टेयर शुद्ध बोया गया क्षेत्र है. इसमें लगभग 36 लाख हेक्टेयर में कृषि फसलें उगाई जाती हैं, जबकि बाकी क्षेत्र में बागवानी फसलें होती हैं. अगर 10 साल पहले के आंकड़ों से तुलना करें तो धान पर पंजाब की निर्भरता और साफ नजर आती है. 2016-17 में करीब 28.98 लाख हेक्टेयर में धान की खेती हुई थी. यह उस समय के करीब 36 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र का लगभग 80.5 फीसदी था.
पंजाब में धान का दबदबा बढ़ा
यानी एक दशक में पंजाब में धान का रकबा करीब 4 लाख हेक्टेयर बढ़ गया है और इसका हिस्सा 80 फीसदी से बढ़कर 92 फीसदी से ज्यादा हो गया है. इससे राज्य में पानी की ज्यादा खपत वाली फसल पर बढ़ती निर्भरता को लेकर चिंता बढ़ गई है. पंजाब में धान की खेती बढ़ने के साथ दूसरी खरीफ फसलों का रकबा लगातार घट रहा है. 2016-17 में धान के अलावा दूसरी फसलों के लिए करीब 7.02 लाख हेक्टेयर जमीन थी, जो अब घटकर सिर्फ 2.69 लाख हेक्टेयर रह गई है. यानी 10 साल में इसमें करीब 4.33 लाख हेक्टेयर या 62 फीसदी की कमी आई है. सीधे शब्दों में कहें तो इस दौरान धान की खेती का रकबा करीब 3.88 लाख हेक्टेयर बढ़ा, जबकि गैर-धान फसलों का क्षेत्र इससे भी ज्यादा घट गया.
कपास की खेती में बड़ी गिरावट
पंजाब में कपास की खेती को सबसे बड़ा झटका लगा है. 2016-17 में करीब 2.85 लाख हेक्टेयर में कपास बोई गई थी, लेकिन 2026-27 में इसका रकबा घटकर सिर्फ 80 हजार हेक्टेयर रह गया. यानी एक दशक में कपास का क्षेत्र करीब 72 फीसदी घट गया है. यह अब तक का सबसे कम रकबा है. कभी मालवा क्षेत्र की खेती की रीढ़ मानी जाने वाली कपास अब राज्य की कृषि में काफी पीछे चली गई है.
मक्का भी किसानों को नहीं कर रहा आकर्षित
मक्का की खेती का रकबा भी करीब 25 फीसदी घटा है. 2016-17 में जहां 1.16 लाख हेक्टेयर में मक्का बोया गया था, वहीं अब इसका क्षेत्र घटकर करीब 87 हजार हेक्टेयर रह गया है. मक्का को अक्सर धान के बेहतर विकल्प के तौर पर बढ़ावा दिया जाता है. पंजाब में राज्य की जरूरत पूरी करने के लिए करीब 5-6 लाख हेक्टेयर में मक्का उगाने की क्षमता है. इसके बावजूद किसान बड़े स्तर पर इसकी खेती की ओर नहीं बढ़े हैं.
गन्ने का रकबा लगभग स्थिर
गन्ने की खेती में हालांकि ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है. 2016-17 में करीब 88 हजार हेक्टेयर में गन्ना बोया गया था, जो अब बढ़कर करीब 97 हजार हेक्टेयर हो गया है. यानी एक दशक में गन्ने के रकबे में सिर्फ 10 फीसदी के आसपास बढ़ोतरी हुई है. पंजाब में गन्ने की खेती का रकबा भले ही करीब 97 हजार हेक्टेयर है, लेकिन यह धान से हटने वाली जमीन को दूसरी फसलों में बदलने के लिए पर्याप्त नहीं है. राज्य में 2.25 लाख हेक्टेयर तक गन्ने की खेती की क्षमता है. इसके बावजूद किसान बड़े पैमाने पर गन्ने की ओर नहीं बढ़ रहे हैं.
दलहन की खेती में गिरावट
दलहन की खेती में गिरावट और भी चिंताजनक है. 2016-17 में खरीफ मूंग, उड़द और अरहर को मिलाकर करीब 15-16 हजार हेक्टेयर में खेती होती थी. अब 2026-27 में यह रकबा घटकर करीब 3 हजार हेक्टेयर रह गया है. यानी एक दशक में दलहन की खेती में करीब 81 फीसदी की भारी गिरावट आई है. पंजाब में मिट्टी की सेहत खराब होने और भूजल स्तर लगातार गिरने के बीच दलहन का रकबा घटना चिंता बढ़ाने वाला है. राज्य अपनी जरूरत की 15 फीसदी दलहन भी पैदा नहीं कर पा रहा है.