धान की पैदावार पर ब्रेक! सिर्फ 0.5 फीसदी बढ़ी उत्पादकता, अब जीनोम धान बनेगा गेमचेंजर

भारत में चावल की उत्पादकता वृद्धि महज 0.5 फीसदी पर सिमट गई है. अब सरकार जीनोम-एडिटेड धान की नई किस्म पूसा राइस DST1 लॉन्च करने जा रही है, जो सूखा और खारी मिट्टी में बेहतर उपज देकर किसानों की आय बढ़ाने की उम्मीद जगा रही है.

नोएडा | Updated On: 21 Aug, 2026 | 12:00 PM

Rice Productivity: भारत दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन अब इसकी उत्पादकता की रफ्तार चिंता बढ़ाने लगी है. कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 में चावल की उत्पादकता वृद्धि दर घटकर महज 0.5 फीसदी रह गई है. ऐसे समय में सरकार जीनोम-एडिटेड धान की नई किस्मों, खासकर पूसा राइस DST1, को रबी सीजन से किसानों तक पहुंचाने की तैयारी कर रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए अब रकबा नहीं, बल्कि प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ाना सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी.

9.4 फीसदी से 0.5 फीसदी तक पहुंची उत्पादकता की रफ्तार

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, दो दशक पहले चावल की पैदावार तेज गति से बढ़ रही थी. वर्ष 2001-02 में उत्पादकता वृद्धि दर 9.4 फीसदी थी, जो 2005-06 में घटकर 5.9 फीसदी रह गई. इसके बाद गिरावट लगातार जारी रही और 2023-24 तथा 2024-25 में यह केवल 1.6 फीसदी रही. अब 2025-26 में यह आंकड़ा घटकर 0.5 फीसदी पर पहुंच गया है. हालांकि, चावल का रकबा  बढ़ने की रफ्तार अभी भी बेहतर है. 2025-26 में धान का क्षेत्रफल 3.1 फीसदी बढ़ा, जबकि औसत उत्पादकता 2,915 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई. कुल उत्पादन 1,500 लाख टन से ऊपर पहुंच चुका है, लेकिन उत्पादन वृद्धि भी अब 2.6 फीसदी तक सीमित हो गई है.

क्यों थम गई पैदावार बढ़ने की रफ्तार?

विशेषज्ञों के अनुसार, हरित क्रांति के बाद सिंचाई, उर्वरक और उच्च उपज वाली किस्मों से मिलने वाला शुरुआती लाभ अब लगभग अपनी सीमा तक पहुंच चुका है. आर्या.एजी के कार्यकारी निदेशक आनंद चंद्रा का कहना है कि अनुसंधान केंद्रों में मिलने वाली पैदावार और किसानों के खेतों की वास्तविक उपज के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है. फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया के चेयरमैन अजय राणा के अनुसार, भारत में केवल 7-8 फीसदी क्षेत्र में हाइब्रिड चावल की खेती होती है, जबकि चीन और अमेरिका में यह हिस्सा 50 फीसदी से अधिक है. उनका मानना है कि जलवायु अनुकूल और स्थानीय स्वाद वाली नई हाइब्रिड व जीनोम-एडिटेड किस्में ही अगला बदलाव ला सकती हैं.

पूसा राइस DST1 और DRR धान 100 से नई उम्मीद

सरकार ने 2025 में विकसित जीनोम-एडिटेड धान की किस्मों  पर विशेष फोकस किया है. पूसा राइस DST1 को सूखा और खारी मिट्टी जैसी कठिन परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन के लिए तैयार किया गया है. इसे रबी सीजन में व्यावसायिक खेती के लिए उपलब्ध कराने की योजना है. वहीं, परीक्षणों में DRR धान 100 (कमला) ने पारंपरिक किस्मों की तुलना में लगभग 19 फीसदी अधिक पैदावार दर्ज की है. वैज्ञानिकों का कहना है कि ये किस्में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच किसानों की आय और उत्पादन दोनों बढ़ाने में मदद कर सकती हैं.

अगले दशक की खाद्य सुरक्षा का रोडमैप

विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 10 वर्षों में भारत को 150-200 लाख टन अतिरिक्त चावल की आवश्यकता होगी. यह लक्ष्य नए कृषि क्षेत्र जोड़कर नहीं, बल्कि प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ाकर ही हासिल किया जा सकता है. इसके लिए केवल बेहतर बीज पर्याप्त नहीं होंगे. समय पर बुवाई, संतुलित पोषण, वैज्ञानिक जल प्रबंधन और नियमित सीड रिप्लेसमेंट जैसी तकनीकों को अपनाना भी जरूरी होगा. सरकार का लक्ष्य आने वाले 10-15 वर्षों में चावल की औसत उत्पादकता को 3,600 से 6,000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंचाने का है, ताकि देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत बनी रहे.

Published: 21 Aug, 2026 | 12:00 PM

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