पशुपालकों के लिए बड़ी चिंता! देश में कंसंट्रेट फीड की 37.5 फीसदी कमी, ICAR की रिपोर्ट ने किया अलर्ट
Cattle Feed Shortage: ICAR के आकलन के मुताबिक भारत में पशुधन उत्पादन बढ़ने के साथ चारे की मांग भी तेजी से बढ़ रही है. देश में कंसंट्रेट फीड की 37.5 फीसदी, हरे चारे की 14.1 फीसदी और सूखे चारे की 2.4 फीसदी कमी है. रिपोर्ट ने फसल अवशेष, वैकल्पिक फीड संसाधनों और बेहतर चारा प्रबंधन को बढ़ावा देने की जरूरत बताई है.
Livestock Feed Shortage: भारत में दूध, अंडे, मांस और मछली का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. इसके साथ ही पशुपालन देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा बनता जा रहा है. लेकिन इस तेजी के बीच पशुओं के लिए पर्याप्त और पौष्टिक चारा उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के एक आकलन के मुताबिक, देश में कंसंट्रेट फीड की 37.5 फीसदी कमी है. वहीं हरे चारे की कमी 14.1 फीसदी और सूखे चारे की कमी 2.4 फीसदी है.
कंसंट्रेट फीड की कमी सबसे ज्यादा
ICAR के आकलन के मुताबिक, अगर सभी पशुओं को उनकी जरूरत के हिसाब से पूरा पोषण दिया जाए तो देश को हर साल करीब 25.48 करोड़ टन कंसंट्रेट फीड की जरूरत होगी. इसके अलावा 93.11 करोड़ टन हरा चारा और 48.85 करोड़ टन सूखे चारे की जरूरत पड़ेगी. हालांकि, इतनी बड़ी मात्रा में चारा उपलब्ध कराना और किसानों के लिए उसका खर्च उठाना आसान नहीं है. समस्या सिर्फ चारे की मात्रा की नहीं, बल्कि उसमें मौजूद पोषक तत्वों की भी है. खासकर कंसंट्रेट फीड में कमी ज्यादा गंभीर है. इसका असर डेयरी, पोल्ट्री, सुअर पालन और मछली पालन जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है. पोल्ट्री, सुअर और मछली पालन में तेजी से वजन और उत्पादन बढ़ाने के लिए पौष्टिक कंसंट्रेट फीड की ज्यादा जरूरत होती है.
पशुधन उत्पादन बढ़ा, तो फीड की मांग भी बढ़ी
चारे की यह चुनौती ऐसे समय सामने आई है जब भारत का पशुधन क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है. 2013-14 से 2023-24 के बीच पशुधन क्षेत्र में सालाना करीब 12.77 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. 2023-24 में कृषि GVA में पशुधन क्षेत्र की हिस्सेदारी 31 फीसदी से ज्यादा रही.
भारत पहले ही दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा अंडा उत्पादक देश है. देश में दूध उत्पादन 2014-15 के 14.63 करोड़ टन से बढ़कर 2024-25 में 24.79 करोड़ टन हो गया. इसी तरह अंडे का उत्पादन 78.48 अरब से बढ़कर 149.1 अरब और मांस का उत्पादन 66.9 लाख टन से बढ़कर 105 लाख टन हो गया.
मछली उत्पादन में भी तेजी आई है. 2018-19 से 2024-25 के बीच इसमें करीब 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. ऐसे में आने वाले समय में फीड की जरूरत और बढ़ना तय माना जा रहा है.
फीड उद्योग भी तेजी से बढ़ रहा
देश में कंपाउंड फीड उद्योग का भी विस्तार हो रहा है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भारत में कंपाउंड फीड का उत्पादन 2024 में 552.4 लाख टन से बढ़कर 2025 में 577.3 लाख टन हो गया. यानी एक साल में करीब 4.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. भारत फिलहाल कई फीड संसाधनों के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर है. ऑयलकेक, ब्रान और कुछ अनाज जैसे उत्पादों का निर्यात भी किया जाता है. लेकिन दूध, मांस और अंडे की मांग बढ़ने के साथ घरेलू फीड जरूरतें भी बढ़ेंगी.
एक और समस्या यह है कि अनाज, ब्रान और ऑयलकेक जैसी चीजों का इस्तेमाल इंसानों के खाने और दूसरे उद्योगों में भी होता है. इसलिए इनकी कीमत और उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है.
घर पर तैयार फीड में पोषण का संतुलन जरूरी
कई किसान अलग-अलग फीड सामग्री को मिलाकर घर पर ही पशुओं के लिए आहार तैयार करते हैं. यह तरीका खर्च कम करने में मदद कर सकता है, लेकिन अगर सामग्री का सही अनुपात न हो तो पशुओं को जरूरी पोषण नहीं मिल पाता. इससे फीड की बर्बादी बढ़ सकती है और पशुओं की उत्पादकता पर भी असर पड़ सकता है. इसलिए सिर्फ ज्यादा चारा उपलब्ध कराना ही काफी नहीं है. पशुओं को सही मात्रा में प्रोटीन, ऊर्जा और दूसरे जरूरी पोषक तत्व मिलना भी जरूरी है.
फसल अवशेष बन सकते हैं बड़ा विकल्प
ICAR ने देश में उपलब्ध फीड संसाधनों का दायरा बढ़ाने पर जोर दिया है. इसके लिए फसल अवशेष, एग्रो-इंडस्ट्री के बाई-प्रोडक्ट और दूसरे वैकल्पिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है. भारत में हर साल 50 करोड़ टन से ज्यादा फसल अवशेष पैदा होते हैं. इनमें से बड़ी मात्रा का इस्तेमाल फीड के बजाय दूसरे कामों में होता है. अगर तकनीक की मदद से इनके पोषण मूल्य में सुधार किया जाए तो इन्हें पशुओं के लिए बेहतर चारे में बदला जा सकता है. इसके साथ सूखा-रोधी चारा किस्मों को बढ़ावा देने, अच्छे चारा बीज उपलब्ध कराने और हरे चारे की सप्लाई चेन मजबूत करने की जरूरत है.
सिर्फ उत्पादन नहीं, बेहतर इस्तेमाल भी जरूरी
ICAR के आकलन से साफ है कि भारत के सामने चुनौती सिर्फ ज्यादा चारा पैदा करने की नहीं है. उपलब्ध संसाधनों का सही और संतुलित इस्तेमाल करना भी उतना ही जरूरी है. अगर पशुओं को बेहतर पोषण वाला संतुलित आहार मिले, फीड की बर्बादी कम हो और वैकल्पिक संसाधनों का इस्तेमाल बढ़े तो सीमित संसाधनों में भी पशुधन उत्पादन बढ़ाया जा सकता है. इसके लिए फीड की मांग और उपलब्धता पर लगातार नजर रखने और भविष्य की जरूरतों के हिसाब से नीतियां बनाने की जरूरत होगी.