केरल के मछुआरों की कमाई पर लगा ब्रेक, ईंधन की कमी से समुद्र में नहीं जा पा रहीं सैकड़ों नावें

जनवरी से मई के बीच समुद्र के किनारों का तापमान बढ़ने के कारण मछलियां गहरे पानी में चली जाती हैं. ऐसे में मछुआरों को 50 मीटर से ज्यादा गहराई तक जाना पड़ता है. इससे समुद्र में बिताया गया समय और ईंधन की खपत दोनों बढ़ जाते हैं, जिससे लागत और बढ़ जाती है.

नई दिल्ली | Published: 16 Apr, 2026 | 01:30 PM

Kerala fisheries crisis: केरल में मछली पकड़ने का काम इन दिनों बड़ी मुश्किलों से गुजर रहा है. पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण देश में ईंधन की सप्लाई प्रभावित हुई है, जिसका सीधा असर मछुआरों की आजीविका पर पड़ रहा है. डीजल और रसोई गैस की कमी के साथ-साथ केरोसीन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी ने स्थिति को और कठिन बना दिया है. हालात ऐसे हैं कि कई नावें समुद्र में जाने के बजाय किनारे पर ही खड़ी हैं.

गैस की कमी से ठप पड़ी गहरे समुद्र की मछली पकड़

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, सबसे ज्यादा असर गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले मछुआरों पर पड़ा है. इन नावों में काम करने वाले लोगों के लिए खाना बनाने के लिए कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर बेहद जरूरी होता है. लेकिन इन दिनों इसकी सप्लाई लगातार बाधित हो रही है.

कोच्चि के थोप्पुम्पडी हार्बर की बात करें तो यहां करीब 2000 लोग सीधे तौर पर मछली पकड़ने और उससे जुड़े कामों में लगे हैं. गैस की कमी के कारण गिलनेट, लॉन्गलाइन और ट्रॉल बोट जैसी कई नावें बंद पड़ी हैं.

600 नावों पर असर, कई यात्राएं बीच में ही रोकनी पड़ी

थोप्पुम्पडी हार्बर पर हर महीने करीब 600 गहरे समुद्र में जाने वाली नावें आती हैं. ये नावें आमतौर पर 15 से 20 दिन तक समुद्र में रहती हैं. ऐसे में गैस की कमी के कारण कई नावों को अपनी यात्रा बीच में ही रोककर वापस लौटना पड़ा है.

कोच्चि लॉन्गलाइन बोट और गिलनेट बाइंग एजेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष ए.एम. नौशाद बिजनेस लाइन को बताते हैं कि यह स्थिति किसी बड़े आर्थिक संकट से कम नहीं है. उन्होंने इसे होटल इंडस्ट्री में आई मंदी जैसी स्थिति बताया. फिलहाल कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन अब भी करीब 50 नावें पूरी तरह बंद पड़ी हैं.

डीजल की कमी से बढ़ी परेशानी

सिर्फ गैस ही नहीं, बल्कि डीजल की कमी ने भी मछुआरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. खासतौर पर छोटे और पारंपरिक मछुआरे, जो पर्स सीन जैसी तकनीक से मछली पकड़ते हैं, वे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. इन नावों को ईंधन देने वाले अंदरूनी पेट्रोल पंपों पर डीजल की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है, जिससे कई मछुआरे समुद्र में जा ही नहीं पा रहे हैं.

केरोसीन की कीमत में भारी उछाल

मछुआरों की समस्याओं को और बढ़ाने वाला एक बड़ा कारण केरोसीन की कीमतों में अचानक आई बढ़ोतरी है. मत्स्य मजदूर संघ के अनुसार, केरोसीन की कीमत एक झटके में 52.37 रुपये प्रति लीटर बढ़ गई है. पहले जहां यह 103 रुपये प्रति लीटर था, अब यह बढ़कर 155.37 रुपये प्रति लीटर हो गया है. यह बढ़ोतरी मछुआरों के लिए बहुत भारी साबित हो रही है, क्योंकि उनके खर्च में अचानक बड़ा इजाफा हो गया है.

सब्सिडी भी नहीं दे पा रही राहत

राज्य सरकार ने मछुआरों को राहत देने के लिए ‘मत्स्यफेड’ के माध्यम से केरोसीन पर 50 रुपये प्रति लीटर की सब्सिडी दी है. लेकिन कीमतों में इतनी बड़ी बढ़ोतरी के कारण यह राहत भी नाकाफी साबित हो रही है. प्रत्येक नाव को उसकी क्षमता के अनुसार 140 से 180 लीटर केरोसीन दिया जाता है, लेकिन यह मात्रा कुछ दिनों के लिए भी पर्याप्त नहीं है.

काला बाजार का सहारा लेने को मजबूर मछुआरे

केरल फिशरीज वर्कर्स कोऑर्डिनेशन फोरम के अध्यक्ष चार्ल्स जॉर्ज के अनुसार, मछुआरे अब महीने में केवल एक-दो दिन ही सब्सिडी वाले केरोसीन से काम चला पा रहे हैं. बाकी समय उन्हें महंगे दामों पर काला बाजार से ईंधन खरीदना पड़ता है. इससे उनकी लागत काफी बढ़ गई है और आमदनी पर सीधा असर पड़ रहा है.

गहरे समुद्र में जाना बना मजबूरी

जनवरी से मई के बीच समुद्र के किनारों का तापमान बढ़ने के कारण मछलियां गहरे पानी में चली जाती हैं. ऐसे में मछुआरों को 50 मीटर से ज्यादा गहराई तक जाना पड़ता है. इससे समुद्र में बिताया गया समय और ईंधन की खपत दोनों बढ़ जाते हैं, जिससे लागत और बढ़ जाती है.

अगर जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो न सिर्फ मछुआरों की आजीविका प्रभावित होगी, बल्कि पूरे मत्स्य उद्योग पर इसका असर पड़ेगा.

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