इंडोनेशिया ने हटाई भारतीय मूंगफली से रोक, लेकिन इन शर्तों ने बढ़ाई चिंता

भारतीय व्यापारियों ने इंडोनेशिया की जांच व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं. उनका कहना है कि वहां अपनाई जा रही सैंपलिंग प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल नहीं खाती. इंडोनेशिया में एक पूरी खेप से केवल एक किलो मूंगफली का नमूना लेकर जांच की जाती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 9 Jan, 2026 | 09:04 AM

Groundnut export: भारत दुनिया के बड़े मूंगफली उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है. हर साल लाखों टन मूंगफली विदेशों में भेजी जाती है और इससे किसानों से लेकर कारोबारियों तक को अच्छी कमाई होती है. लेकिन हाल के महीनों में इंडोनेशिया के साथ मूंगफली व्यापार को लेकर हालात कुछ उलझे हुए नजर आ रहे हैं. भले ही इंडोनेशिया ने भारतीय मूंगफली के आयात पर लगी रोक हटा ली हो, लेकिन इसके बावजूद निर्यातकों के मन में अब भी कई तरह की आशंकाएं बनी हुई हैं.

रोक हटी, लेकिन भरोसा नहीं लौटा

पिछले महीने इंडोनेशिया ने भारत से मूंगफली के आयात पर लगाया गया प्रतिबंध हटा दिया. यह खबर सुनते ही उम्मीद जगी कि व्यापार फिर से रफ्तार पकड़ेगा. लेकिन जमीनी हकीकत इससे थोड़ी अलग है. भारतीय निर्यातक फिलहाल इंडोनेशिया को दोबारा बड़ी मात्रा में मूंगफली भेजने से बच रहे हैं. उनका कहना है कि नए नियम इतने सख्त हैं कि छोटे से तकनीकी दोष पर भी पूरा कारोबार दांव पर लग सकता है.

निर्यातकों के अनुसार, इंडोनेशिया ने अब केवल सीमित संख्या में निर्यातकों को ही अनुमति दी है. पहले जहां कई सौ कारोबारी इस बाजार से जुड़े थे, अब स्वीकृत निर्यातकों की संख्या घटकर करीब 75 के आसपास रह गई है. इससे प्रतिस्पर्धा तो बढ़ी ही है, साथ ही जोखिम भी कई गुना हो गया है.

अफ्लाटॉक्सिन विवाद से शुरू हुई परेशानी

दरअसल, यह पूरा मामला अफ्लाटॉक्सिन नामक विषैले तत्व से जुड़ा है. सितंबर 2025 में इंडोनेशिया ने यह कहकर भारतीय मूंगफली पर रोक लगा दी थी कि कुछ खेपों में तय सीमा से ज्यादा अफ्लाटॉक्सिन पाया गया है. भारतीय निर्यातकों का तर्क है कि जांच रिपोर्ट उन्हें बहुत देर से सौंपी गई. कई मामलों में खेप पहुंचने के करीब तीन महीने बाद रिपोर्ट दी गई, जबकि इस दौरान मूंगफली किस तरह और किन हालात में रखी गई, इसकी कोई जानकारी साझा नहीं की गई.

निर्यातकों का मानना है कि लंबे समय तक गलत भंडारण की वजह से भी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, लेकिन इसकी जिम्मेदारी सीधे भारत पर डाल दी गई.

जांच प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

भारतीय व्यापारियों ने इंडोनेशिया की जांच व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं. उनका कहना है कि वहां अपनाई जा रही सैंपलिंग प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल नहीं खाती. इंडोनेशिया में एक पूरी खेप से केवल एक किलो मूंगफली का नमूना लेकर जांच की जाती है, जबकि भारत में निर्यात से पहले 20 किलो तक का सैंपल जांचा जाता है. इतना बड़ा अंतर नतीजों को प्रभावित कर सकता है.

भारत दौरे के बाद और कड़े नियम

अक्टूबर 2025 में इंडोनेशिया की एक टीम भारत आई थी. इस टीम ने किसानों, निर्यातकों और लैब्स की कार्यप्रणाली को करीब से देखा. इस दौरे के बाद इंडोनेशिया ने कुछ नए नियम लागू कर दिए, जैसे जियो-टैगिंग और ट्रेसबिलिटी को अनिवार्य करना. अब अगर किसी एक खेप में भी अफ्लाटॉक्सिन की शिकायत आती है, तो उस निर्यातक का लाइसेंस तक निलंबित किया जा सकता है. यही बात निर्यातकों को सबसे ज्यादा डरा रही है.

रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद ऊंचे दाम

इस बीच भारत में मूंगफली का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक खरीफ सीजन में उत्पादन 11 मिलियन टन से ज्यादा रहने का अनुमान है. इसके बावजूद घरेलू बाजार में मूंगफली के दाम काफी ऊंचे बने हुए हैं. एक साल में कीमतों में करीब 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई है. मजबूत मांग और निर्यात में अनिश्चितता की वजह से बाजार संतुलन बिगड़ा हुआ है.

इंडोनेशिया की अहम भूमिका

इंडोनेशिया भारतीय मूंगफली के लिए एक बड़ा बाजार रहा है. कुल निर्यात का लगभग एक-तिहाई हिस्सा वहीं जाता है. हालांकि हालिया रोक के बावजूद भारत ने दूसरे देशों में निर्यात बढ़ाकर कुछ हद तक नुकसान की भरपाई कर ली है. फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर इंडोनेशिया के साथ भरोसेमंद और स्थिर व्यापार दोबारा शुरू हो जाए, तो इसका फायदा किसानों और निर्यातकों दोनों को मिलेगा.

फिलहाल स्थिति यह है कि रोक हटने के बाद भी भारतीय मूंगफली की आपूर्ति इंडोनेशिया में सीमित बनी हुई है. निर्यातक चाहते हैं कि नियम पारदर्शी हों, जांच प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो और व्यापार में अचानक फैसलों से बचा जाए. जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक इंडोनेशिया के लिए मूंगफली निर्यात पूरी रफ्तार नहीं पकड़ पाएगा.

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