चंबल के बीहड़ में बाढ़ के खतरे को दावत दे रहे हैं किसान, प्रकृति से खिलवाड़ कहीं सदा के लिए खत्म न कर दे खेती
दुर्दांत ’बागियों’ ने भी चंबल के बीहड़ को अपना रैन बसेरा जरूर बनाया, लेकिन इसकी प्राकृतिक संपदा को लूटने की बेवकूफी कभी नहीं की. मगर अब, अत्याधुनिक तकनीक के अहंकार में डूबे आधुनिक समाज ने विकास के नाम पर चंबल का स्वरूप बदलने की सनक पाल ली है, जो आने वाले समय में चंबल की बाढ़ की चपेट में आने का खतरा बढ़ता जा रहा है.
चंबल का स्वरूप बदलने की सनक बड़े खतरे को दावत
हजारों साल के मानव विकास क्रम में कभी भी चंबल के बीहड़ का स्वरूप बदलने का फितूर किसी के दिमाग में नहीं आया. धौलपुर में चंबल के ऊंचे मिट्टी के टीलों पर स्थित एक प्राचीन किले के खंडहर, हमारे पूर्वजों की उस दूरदर्शी सोच के गवाह हैं, जो पिछली पीढ़ियों को चंबल के पर्यावास के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ न करने के लिए आगाह करते आए हैं. यहां तक कि दुर्दांत ’बागियों’ ने भी चंबल के बीहड़ को अपना रैन बसेरा जरूर बनाया, लेकिन इसकी प्राकृतिक संपदा को लूटने की बेवकूफी कभी नहीं की. मगर अब, अत्याधुनिक तकनीक के अहंकार में डूबे आधुनिक समाज ने विकास के नाम पर चंबल का स्वरूप बदलने की सनक पाल ली है. हालांकि, विकास के नाम पर नदी, पहाड़ और जंगलों को मैदान करके कंक्रीट के जंगल उगाने की सनक पूरे देश में देखी जा रही है, लेकिन चंबल के बीहड़ को प्रकृति के नैसर्गिक संरक्षकों यानी धरती पुत्र किसानों से खतरा पैदा हो गया है.
हजारों साल की प्रक्रिया ने चंबल के आसपास पीली मिट्टी के ऊंचे टीले बन गए
इस क्रम में सबसे पहले पर्यावरण के लिहाज से चंबल के बीहड़ की संवेदनशीलता को जानना वाजिब है. यह सर्वविदित है कि मध्य प्रदेश में सतपुड़ा और विंध्य पर्वत मालाओं के वन क्षेत्र से निकलने वाली चार प्रमुख नदियां सोन, चंबल, बेतवा और केन का बहाव, दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर है. इनमें से सोन, बेतवा और केन अपने बहाव के साथ पहाड़ों से कंकड़ पत्थर को पानी के साथ बहाकर लाने के क्रम में हम इंसानों को बालू के रूप में प्रमुख खनिज की आपूर्ति करती हैं. वहीं, चंबल नदी के बहाव क्षेत्र में पीली भुरभुरी मिट्टी की उपलब्धता वाला राजस्थान का इलाका भी आता है. इसलिए यह नदी मध्य प्रदेश के पथरीले इलाकों से बालू को लाकर राजस्थान में छोड देती है और आगे बढते हुए राजस्थान की पीली मिट्टी को अपने बहाव के साथ ले जाकर धौलपुर और मध्य प्रदेश में मुरैना जिले के मध्यवर्ती इलाके में छोड देती है. हजारों साल से चल रही इस प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप ही धौलपुर से मुरैना के बीच में चंबल के आसपास पीली मिट्टी के ऊंचे टीले बन गए हैं.
चंबल की जलधारा से सटे खेत भविष्य के लिए मुसीबत का सबब बनेंगे
धौलपुर से लेकर मुरैना के बीच में पिछली पीढ़ी के किसानों ने नदी के बहाव क्षेत्र से 5-10 किमी दूर अपने खेतों को सीमित रखा था. यानी नदी काे जल भराव के लिए इस इलाके में 5 से 10 किमी तक का क्षेत्र पूरी तरह से मिल रहा था. अब हालत यह है कि चंबल नदी की जलधारा से सटे हुए खेत आसानी से देखने को मिल जाते हैं. मुरैना जिले में चंबल नदी के आसपास भानपुर, राजघाट और मुरादपुर सहित दर्जन भर गांव के किसान सहज भाव से स्वीकार करते हैं कि उनके परिवार का आकार लगातार बढ रहा है. खेती पर निर्भर इन गांव के किसानों के पास रोजगार को कोई अन्य साधन नहीं है. इस कारण ये किसान मजबूरी में बीहड़ पट्टी का अतिक्रमण करके अपनी खेती का रकबा बढ़ा रहे हैं.
तेजी से समतल हो रहे चंबल के बीहड़ों पर दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ रीजनल डेवलपमेंट के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेस में प्रोफेसर पद्मिनी पाणी पिछले 3 दशक से अध्ययन कर रहीं हैं. प्रो पाणी ने अपनी एक रिपोर्ट में किसानों द्वारा चंबल के इलाके को समतल करने के जोखिम का जिक्र करते हुए कहा है कि इससे उत्पन्न खतरे का खामियाजा भविष्य में किसानों को ही प्रकृति के प्रकोप के रूप में भुगतना पडेगा. उनकी दलील है कि चंबल की बीहड़ पट्टी में मौजूद मिट्टी के ऊंचे टीले सदियों से बाढ की आपदा को रोकने का काम करते रहे हैं. इस लिहाज से चंबल की जलधारा के आसपास मिट्टी के टीलों को समतल करके खेती करने से अल्प अवधि में आजीविका का लाभ जरूर मिल सकता है, लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव मिट्टी के भारी कटाव के रूप में भूस्खलन और बाढ़ के खतरे को दावत देने के रूप में अब दिखने लगा है.