खाद पर बढ़ता खर्च बना चुनौती! यूरिया पॉलिसी बदलने की तैयारी में केंद्र, किसानों पर क्या होगा असर?
Fertilizer Shortage: भारत में बढ़ती ग्लोबल खाद कीमतों, सप्लाई में रुकावट और कमजोर मॉनसून के बीच यूरिया को लेकर सरकार की चिंता बढ़ रही है. किसानों को 45 किलो यूरिया की बोरी करीब 266.5 रुपये में मिलती है, जबकि इसकी वास्तविक खरीद लागत काफी ज्यादा है. बढ़ते सब्सिडी खर्च के चलते सरकार अब यूरिया पॉलिसी में बदलाव पर विचार कर रही है.
Fertilizer Crisis: भारत में खाद, खासकर यूरिया को लेकर एक बड़ी चुनौती सामने आ रही है. ग्लोबल मार्केट में बढ़ती कीमतें, सप्लाई में रुकावट और कमजोर मॉनसून ने सरकार के लिए खाद की लागत बढ़ा दी है. दूसरी तरफ किसानों को यूरिया कम कीमत पर उपलब्ध कराने की पुरानी नीति के कारण सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ रहा है. हालांकि, भारत सरकार ने यूरिया के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए जुलाई 2026 में नेशनल इन्वेस्टमेंट पॉलिसी फॉर यूरिया (NIPU-2026) को मंजूरी दी है. लेकिन, सिर्फ उत्पादन बढ़ाना ही इस समस्या का पूरा समाधान नहीं माना जा रहा है. बढ़ते सब्सिडी खर्च और यूरिया के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को देखते हुए मौजूदा यूरिया पॉलिसी में बदलाव की जरूरत पर भी गंभीरता से चर्चा हो रही है.
सरकार पर बढ़ता सब्सिडी बोझ
केंद्रीय उर्वरक मंत्रालय के अनुसार देश के किसानों को यूरिया काफी सस्ती कीमत पर दिया जाता है. अभी किसान 45 किलो की यूरिया बोरी के लिए करीब 266.5 रुपये यानी 2.80 डॉलर चुकाते हैं. यह कीमत उस लागत के मुकाबले बेहद कम है, जिस पर सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार से यूरिया खरीदती है. अप्रैल में हुई एक खरीद निविदा में सरकार ने जिस कीमत पर यूरिया खरीदा, वह किसानों से ली जाने वाली कीमत से 10 गुना से भी ज्यादा थी. यानी किसान को खाद सस्ती मिलती है, लेकिन इसकी वास्तविक लागत का बड़ा हिस्सा सरकार सब्सिडी के जरिए उठाती है.
यूरिया का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा क्यों?
यूरिया नाइट्रोजन आधारित खाद है, जो फसलों की बढ़वार में मदद करती है. हरित क्रांति के बाद से यह भारतीय खेती का अहम हिस्सा बन गई है. खाद्य उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने लंबे समय तक किसानों को इसे सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराया. लेकिन अब यूरिया के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को लेकर चिंता बढ़ रही है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भारत के किसान अमेरिका और ब्राजील मिलाकर जितना यूरिया इस्तेमाल करते हैं, उससे भी ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल करते हैं. सस्ती कीमत इसकी एक बड़ी वजह मानी जाती है. जब किसी खाद की कीमत दूसरी खादों के मुकाबले कम होती है, तो किसान उसका ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित हो सकते हैं. इससे मिट्टी के संतुलन और खेती की लागत पर भी असर पड़ सकता है.
1960 के दशक के संकट से शुरू हुई थी सब्सिडी
कई सरकारी रिपोर्ट बताती हैं कि यूरिया पर सस्ती कीमत की नीति अचानक नहीं बनी. 1960 के दशक में भारत गंभीर खाद्य संकट से जूझ रहा था. उस समय देश का मकसद कृषि उत्पादन बढ़ाना और अनाज के आयात पर निर्भरता कम करना था. इसी दौर में किसानों को खाद सस्ती उपलब्ध कराने की व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया. हरित क्रांति के साथ यूरिया और दूसरी खादों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा और देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा. लेकिन दशकों बाद खेती और खाद की जरूरतें बदल चुकी हैं. अब सरकार के सामने उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ सब्सिडी का खर्च और खाद के संतुलित इस्तेमाल की चुनौती भी है.
ग्लोबल कीमत और सप्लाई ने बढ़ाई मुश्किल
भारत की परेशानी सिर्फ घरेलू नीति तक सीमित नहीं है. ग्लोबल बाजार में खाद की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई में रुकावट से सरकार की खरीद लागत प्रभावित हो रही है. हालांकि, जून में भारत की एक खरीद निविदा में खाद की कीमत अप्रैल के मुकाबले आधे से भी कम रही थी. लेकिन अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से माल की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों में दोबारा तेजी आ सकती है.
कमजोर मॉनसून ने बढ़ाई चिंता
एक्सपर्ट का कहना है कि खाद की चुनौती के बीच कमजोर मॉनसून ने भी स्थिति को मुश्किल बना दिया है. जून में पिछले 12 साल में सबसे कम बारिश हुई और सितंबर तक बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान कृषि उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ा रहा है. अल नीनो का संभावित असर भी मॉनसून और फसल उत्पादन के लिए जोखिम बढ़ा सकता है. अगर उत्पादन प्रभावित हुआ तो आगे चलकर खाद्य कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है.
40 जिलों में खाद की प्री-बुकिंग का परीक्षण
सरकार अब खाद वितरण को बेहतर बनाने के लिए 40 जिलों में नया सिस्टम टेस्ट कर रही है. इसमें किसान अपनी जमीन के रकबे और बोई गई फसल के आधार पर पहले से खाद बुक कर सकेंगे. इससे सरकार को यह समझने में मदद मिलेगी कि किस इलाके में कितनी खाद की जरूरत है. इससे मांग के हिसाब से सप्लाई प्लान करने और खाद की कमी जैसी स्थिति को कम करने में मदद मिल सकती है.
यूरिया उत्पादन बढ़ेगा, लेकिन पॉलिसी में बदलाव भी जरूरी
सरकार सालाना यूरिया उत्पादन क्षमता में 1 करोड़ टन की बढ़ोतरी करने की योजना बना रही है. इससे घरेलू सप्लाई मजबूत करने में मदद मिल सकती है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ उत्पादन बढ़ाना काफी नहीं होगा. अगर यूरिया का इस्तेमाल लगातार बढ़ता रहा तो सब्सिडी का खर्च भी बढ़ता रहेगा. इसलिए मांग को मैनेज करना और किसानों को खाद के संतुलित इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना भी जरूरी है. यही वजह है कि अब यूरिया पॉलिसी में सुधार की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है. आने वाले समय में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि किसानों को सस्ती और समय पर खाद भी मिले और यूरिया पर बढ़ता सरकारी खर्च भी काबू में रहे.