ग्लोबल वार्मिंग : हजारों साल से चल रहे कृषि चक्र को अब तोड़ रही तपती धरती

मतलब साफ है कि अभी कम से कम एक दशक तक हर प्रकार के मौसम में हो रहे उतार चढ़ाव की बारंबारता बढ़ती ही जाएगी. इसके बाद ही इसमें ठहराव आना शुरू होगा. स्पष्ट है कि प्राकृतिक संसाधनों के पिछली एक सदी से चल रहे अविवेकपूर्ण दोहन के कारण प्रकृति को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई खुद प्रकृति के द्वारा मौसम चक्र के बदलाव के रूप में की जा रही है.

झांसी | Updated On: 15 Jun, 2026 | 06:23 PM

दुनिया में खेती की परंपरा हजारों साल पुरानी है. विश्व के अलग अलग हिस्सों में मौसम चक्र के मुताबिक ही कृषि चक्र निर्धारित हैं. मौसम की गति के अनुरूप खेती की यह व्यवस्था सहस्त्राब्दियों से चली आ रही है. इसीलिए धरती पर मौसम चक्र की विविधता को देखते हुए ही फसलों की विविधता भी देखने को मिलती है. इस लिहाज से भारतीय उपमहाद्वीप फसल विविधीकरण के मामले में दुनिया का सबसे समृद्ध इलाका माना जाता है. अकेले भारत में ही 72 एग्रो क्लाइमेटिक जोन यानी कृषि-जलवायु क्षेत्र मौजूद है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने पूरे देश को जलवायु, मिट्टी के प्रकार, वर्षा, तापमान और कृषि पद्धतियों के आधार पर 123 एग्रो क्लाइमेटिक जोन में विभाजित किया है. इन सभी कृषि जलवायु क्षेत्रों में अलग अलग प्रकार की फसलें उपजाई जाती है. इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि देश और दुनिया में अनगिनत प्रकार के खाद्यान्न से मिलकर कितनी विविधतापूर्ण खाद्य श्रृंखला आज हमारे भोजन को पोषक बना रही है.

दुनिया भर के लोगों के बीच क्लाइमेट चेंज के चलते बढ़ती कृषि लागत ने चिंता पैदा कर दी है. ऐसे में कृषि उत्पादन पर भी बुरा असर पड़ रहा है. इन चुनौतियों से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास तेज करने होंगे.

खाद्य श्रृंखला पर संकट के बादल मंडरा रहे

मगर अब हजारों साल की मेहनत से तैयार हुई इस खाद्य श्रृंखला पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. इन संकट कारी बादलों की जद में दरअसल दुनिया का विविधतापूर्ण फसल चक्र ही है. इस फसल चक्र पर मामूली सा खतरा भी वैश्विक खाद्य श्रृंखला को तहस नहस करने के लिए पर्याप्त है. हम इंसानों के द्वारा पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाने के कारण धरती का लगातार बढ रहा तापमान इस संकट की एकमात्र वजह है. मौसम एवं कृषि वैज्ञानिक, इसे जलवायु परिवर्तन यानी क्लाइमेट चेंज बता कर इस संकट की भयावहता से भले ही मुंह फेर लें, लेकिन इतना तो तय है कि अब संकट को ज्यादा समय तक टाला नहीं जा सकता है.

दुनिया भर की मौसम एजेंसियां ग्लोबल वार्मिंग को लेकर 21वीं सदी की शुरूआत से ही लगातार आगाह कर रही हैं. नतीजतन, पिछले 5 सालों से अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ रही गर्मी का असर अब फसल चक्र पर पडने लगा है. हालात की गंभीरता का अंदाजा हम इसी एक तथ्य से लगा सकते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से प्रभावित हो रहा यह वही फसल चक्र है, जिसे दुनिया भर में आजीविका की अब तक की सबसे सतत यानी सस्टेनेबल व्यवस्था माना गया है.

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की हाल ही में प्रकाशित हुई एक साझा रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर पड रही भीषण गर्मी, धरती की कृषि प्रणालियों को तबाही के कगार पर धकेल रही हैं. इसका असर पर वैश्विक खाद्य श्रृंखला की कारगर व्यवस्था पर भी दिखने लगा है. इस कारण से पूरी दुनिया में लगभग 100 करोड़ से ज्यादा लोगों की आजीविका और उनकी सेहत पर प्रत्यक्ष संकट आसन्न हो गया है.

बदलता तापमान धरती के फसल चक्र को उलट पुलट रहा

रिपोर्ट के अनुसार अत्यधिक गर्मी, तापमान में इजाफा करके मनुष्यों एवं अन्य जीवों की कार्यक्षमता को तो प्रभावित कर ही रही है, साथ ही धरती के फसल चक्र को भी उलट पुलट कर रही है. इतना ही नहीं, इससे मछली पालन सहित खेती से जुड़ी पशुपालन की सभी विधाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं. और तो और, कृषि वानिकी पर भी वैश्विक ताप वृद्धि का बुरा असर देखने को मिल रहा है. आलम यह है कि बीते दो सालों में भीषण गर्मी का दौर असंतुलित होने लगा है. इसके तहत ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन के दौरान भीषण गर्मी का 15 से 25 दिन लंबा चलने वाला दौर अब पिछले दो तीन सालों में उतार चढाव से भर गया है.

इसके बदलते पैटर्न में तीन से चार दिन की भीषण गर्मी के बाद अचानक मौसमी विक्षोभ के कारण आंधी, बारिश और ओलावृष्टि जैसी चरम घटनाएं तापमान के उतार चढाव की बारंबारता को बढावा दे रही हैं. ऐसे में फसल चक्र को लगातार बदलते मौसम के अनुकूल बनने में खासी परेशानी हो रही है. फसल चक्र की सततता के लिए मौसम चक्र के स्थायित्व की दरकार होती है. जबकि मौसम चक्र में लगातार उतार चढ़ाव आने के कारण फसल चक्र की सततता पर बहुत ही ज्यादा बुरा असर पड़ रहा है.

ऐसे में किसानों, मछुआरों और पशुपालकों को भीषण गर्मी के रुख को देखकर ही यह तय करना पड रहा है कि वे कब क्या उगा सकते हैं और कैसे पशुपालन की दिशा एवं दशा को तय कर सकते हैं. स्पष्ट है कि खेती बाड़ी से जुडे लोगों के लिए भीषण गर्मी से युक्त बदलते मौसम का यह दौर सबसे ज्यादा चुनौती पेश कर रहा है. यह स्थिति भारत जैसे उन देशों में किसानों की परेशानी को, विकसित देशों के साधन संपन्न किसानों की तुलना में और भी ज्यादा मुसीबत भरा बना रही है.

विदर्भ और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में मुश्किलें बढ़ रहीं

कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले देशों में किसानों के लिए खेती के संसाधन जुटाना बहुत भारी पड रहा है. भारत के अधिकांश एग्रो क्लाइमेटिक जोन में सदियों से समशीतोष्ण जलवायु होने के कारण बागवानी सहित अन्य पारंपरिक फसलें उगाने वाले किसानों के लिए जलवायु परिवर्तन से पहले वाले दौर में सिंचाई हेतु जितने पानी की जरूरत होती थी, अब पानी यह मात्रा नाकाफी साबित हो रही है. खासकर, विदर्भ और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में तमाम तरह की सरकारी मदद के बावजूद किसानों के लिए खेती के संसाधन जुटाना बेहद महंगा सौदा साबित हो रहा है.

हालांकि विकसित देशों में भी किसान इस संकट से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं. बडी जोत के किसानों की बहुलता वाले इन देशों में जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष असर, फसल प्रबंधन पर पडा है. आम तौर पर ठंडी जलवायु वाले इन देशों में तापमान की मामूली सी वृद्धि फसल चक्र को गर्म देशों की तुलना में ज्यादा प्रभावित कर रही है. इससे फसलों पर रोग एवं कीट प्रकोप तेजी से बढ रहा है. इस कारण किसानों के लिए फसल प्रबंधन की लागत में तेजी से उछाल आया है. साथ ही इस प्रकोप के कारण फसल से नष्ट होने की दर भी गर्म जलवायु वाले देशों की तुलना में तेजी से बढ रही है. स्पष्ट है कि इससे किसानों को बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान भी उठाना पड रहा है. यूरोप के तमाम देशों में इसी आर्थिक नुकसान की भरपाई को लेकर बड़े किसान आंदोलन हो रहे हैं.

मौसम में बदलाव का दौर साल 2034 तक जारी रहेगा- केजे रमेश

ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस वैश्विक संकट का तात्कालिक समाधान क्या है? जानकारों की मानें तो बदलाव के दौर से गुजर रहे मौसम चक्र को स्थायित्व प्राप्त होने तक इंतजार करना ही इस संकट का एकमात्र समाधान है. भारत में मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ केजे रमेश ने तो शोधपरक अध्ययनों के आधार बहुत पहले ही कह दिया था कि मौसम में बदलाव का यह दौर साल 2034 के बाद स्थायित्व की ओर अग्रसर होगा.

मतलब साफ है कि अभी कम से कम एक दशक तक हर प्रकार के मौसम में हो रहे उतार चढ़ाव की बारंबारता बढ़ती ही जाएगी. इसके बाद ही इसमें ठहराव आना शुरू होगा. स्पष्ट है कि प्राकृतिक संसाधनों के पिछली एक सदी से चल रहे अविवेकपूर्ण दोहन के कारण प्रकृति को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई खुद प्रकृति के द्वारा मौसम चक्र के बदलाव के रूप में की जा रही है. इससे धरती के संतुलन को बनाए रखने वाले अवयवों की उपलब्धता अब प्रकृति अपने तरीके से मौसम चक्र में बदलाव करके सुनिश्चित कर रही है.

फसल चक्र में बदलाव अब जरूरत बन गया

कुदरत का साफ संकेत है हम इंसानों के द्वारा प्रकृति के साथ कदमताल करते हुए कायम किए गए फसल चक्र में भी अब बदलाव करना पडेगा. इसमें ध्यान इस बात का रखना होगा कि प्रकृति की व्यवस्था में बदलाव की गति बहुत धीमी होती है. इसलिए मौसम चक्र में बदलाव के इस दौर में स्थायित्व आने में कम से कम डेढ़ दशक का समय अभी लगेगा. इसलिए फसल चक्र को भी इसी गति से बदलने की जरूरत को ध्यान में रखना लाजमी होगा.

एक बात और ध्यान में रखनी होगी कि खेती किसानी का काम सीधे तौर पर प्रकृति से जुडा है, इसलिए किसान प्राकृतिक बदलाव से प्रभावित होने वाले प्राथमिक स्टेकहोल्डर हैं. इसके मद्देनजर सभी देशों की सरकारों का यह फर्ज है कि वे अपनी सभी प्रकार की नीतियों को किसान केंद्रित करके बनाएं. खासकर कृषि, खाद्य आपूर्ति एवं बाजार संबंधी नीतियों में किसान हितों को सर्वोपरि रखना समय की मांग है. इससे सिर्फ किसानों का ही भला नहीं होगा, बल्कि ऐसा करने से समूची अर्थव्यवस्था को बल मिलना तय है. इसके लिए दरकार सिर्फ इतनी सी है कि सरकारें सिर्फ इंडस्ट्री के हितों को ध्यान में रखने की संकुचित सोच से बाहर आएं.

Published: 15 Jun, 2026 | 06:19 PM

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