विलुप्ति की कगार पर पहुंची ये गाय.. भारत में बची सिर्फ 200 डुगोंग, सरकार का मेगा कैंपेन शुरू
समुद्र की गहराइयों में रहने वाली डुगोंग यानी समुद्री गाय अब खतरे में है. भारत में इसकी संख्या घटकर करीब 200 रह गई है. समुद्री जैव विविधता के इस अनमोल जीव को बचाने के लिए जल शक्ति मंत्रालय संरक्षण अभियान चला रहा है.
समुद्र की गहराइयों में रहने वाला एक अनोखा जीव अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. कभी भारतीय समुद्री क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नजर आने वाली डुगोंग (Dugong) यानी समुद्री गाय की संख्या अब घटकर लगभग 200 रह गई है. समुद्री घास के विशाल मैदानों की रक्षा करने वाला यह दुर्लभ शाकाहारी स्तनधारी जीव विलुप्ति के खतरे का सामना कर रहा है. इसे बचाने के लिए सरकार ने संरक्षण अभियान तेज कर दिया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस अनमोल समुद्री जीव को देख सकें.
हालांकि भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के सर्वे से डुगोंग संरक्षण को लेकर नई उम्मीद जगी है. WII के अनुसार, पाक खाड़ी और मन्नार की खाड़ी के डुगोंग संरक्षण क्षेत्र में 2023-24 के ड्रोन सर्वे में 200 से अधिक डुगोंग पाए गए हैं. विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस क्षेत्र में इनकी संख्या करीब 300 तक हो सकती है. डुगोंग को बचाने के लिए केंद्र सरकार, तमिलनाडु सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और स्थानीय मछुआरा समुदाय मिलकर संरक्षण अभियान चला रहे हैं. इसके तहत समुद्री घास बचाने, डुगोंग के आवास को सुरक्षित करने और मछुआरों को आर्थिक प्रोत्साहन देने के लिए कई योजनाएं लागू की जा रही हैं.
साइरेनिया गण की एकमात्र समुद्री शाकाहारी स्तनधारी प्रजाति
जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, डुगोंग साइरेनिया गण (Sirenia Order) की दुनिया में बची हुई चार जीवित प्रजातियों में से एक है. यह समुद्र में रहने वाला एकमात्र शाकाहारी स्तनधारी जीव है, जो मुख्य रूप से समुद्री घास खाकर जीवन बिताता है. इसी वजह से इसे समुद्री गाय कहा जाता है. डुगोंग समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. समुद्री घास के मैदान कार्बन को अवशोषित करने के साथ-साथ कई समुद्री जीवों के भोजन और प्रजनन का आधार होते हैं. ऐसे में डुगोंग का संरक्षण समुद्री जैव विविधता को बचाने से जुड़ा हुआ है.
जल शक्ति मंत्रालय कर रहा समुद्री जीवों के संरक्षण प्रयास तेज.
भारत में इन जगहों पर बची है डुगोंग की आबादी
भारतीय वन्यजीव संस्थान के अनुसार, भारत में डुगोंग की मौजूदगी मुख्य रूप से गुजरात की कच्छ की खाड़ी, तमिलनाडु की पाक खाड़ी और मन्नार की खाड़ी तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के समुद्री क्षेत्रों में पाई जाती है. तमिलनाडु का पाक खाड़ी और मन्नार की खाड़ी क्षेत्र डुगोंग के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवासों में शामिल है. वर्ष 2022 में तमिलनाडु सरकार ने पाक खाड़ी के करीब 500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को भारत का पहला डुगोंग संरक्षण रिजर्व घोषित किया था. WII के नेशनल डुगोंग रिकवरी प्रोग्राम के वैज्ञानिकों के अनुसार, इन क्षेत्रों में संरक्षण गतिविधियों के कारण डुगोंग की संख्या में सुधार देखा जा रहा है.
डुगोंग बचाने के लिए लाखों रुपये की मदद और प्रोत्साहन राशि
डुगोंग संरक्षण अभियान के तहत सरकार और संस्थाओं की ओर से कई आर्थिक सहायता दी जा रही है. तमिलनाडु में डुगोंग के प्राकृतिक आवास को दोबारा तैयार करने के लिए तमिलनाडु बायोडायवर्सिटी कंजर्वेशन एंड ग्रीनिंग प्रोजेक्ट फॉर क्लाइमेट चेंज रिस्पॉन्स (TBGPCR) के तहत वर्ष 2023-24 और 2024-25 में समुद्री घास बहाली के लिए धनराशि जारी की गई. पाक खाड़ी क्षेत्र में समुद्री घास की बहाली के काम पर करीब 10 लाख रुपये खर्च किए गए. इसके तहत पेरावुरानी के पास वल्लवनपट्टिनम तट क्षेत्र में समुद्र के अंदर चार मीटर गहराई पर समुद्री घास उगाने के लिए विशेष तकनीक अपनाई गई.
इसके अलावा जाल में फंसे डुगोंग को बचाने वाले मछुआरों के लिए मिलने वाली प्रोत्साहन राशि को बढ़ाकर 10 हजार रुपये से 50 हजार रुपये प्रति बचाव अभियान कर दिया गया है. इससे मछुआरे अब डुगोंग को बचाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.
साइरेनिया गण की दुर्लभ प्रजाति है डुगोंग
मछुआरों को जोड़कर चलाया जा रहा संरक्षण अभियान
तमिलनाडु के पुदुक्कोट्टई और थंजावुर जिले के तटीय गांवों में डुगोंग संरक्षण को लेकर बड़े स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए हैं. वर्ष 2024-25 में तमिलनाडु वन विभाग ने करीब 80 जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए. वहीं स्वयंसेवी संस्था अरुम्बुगल ट्रस्ट ने आदिरामपट्टिनम-अम्मापट्टिनम तटीय क्षेत्र की करीब 50 मछुआरा बस्तियों में जागरूकता अभियान चलाया. वल्लवनपट्टिनम गांव के मछुआरे अब समुद्री घास लगाने और डुगोंग बचाने के काम में भाग ले रहे हैं. पहले जिन क्षेत्रों में डुगोंग का शिकार होता था, वहां अब लोग इनके संरक्षण को अपनी जिम्मेदारी मान रहे हैं.
डुगोंग संरक्षण से जुड़े सामाजिक कार्यों के तहत ओमकार फाउंडेशन द्वारा डुगोंग स्कॉलरशिप प्रोग्राम भी चलाया जा रहा है. इसके तहत मछुआरा समुदाय के अनाथ बच्चों को हर साल करीब 18 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है.
सैटेलाइट ट्रैकिंग से होगी निगरानी, चुनौतियां अभी बाकी
डुगोंग संरक्षण को और मजबूत करने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान सैटेलाइट आधारित टेलीमेट्री तकनीक पर काम कर रहा है. इससे यह पता लगाया जाएगा कि डुगोंग मौसम के अनुसार अपना आवास क्षेत्र कैसे बदलते हैं. हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार, अभी भी कई खतरे मौजूद हैं. मछली पकड़ने वाले जालों में फंसना, समुद्री प्रदूषण, अत्यधिक मछली पकड़ना और तेज गति वाली नावों के प्रोपेलर से टकराना डुगोंग के लिए बड़ी चुनौती हैं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि डुगोंग अर्ध-प्रवासी जीव हैं और समुद्री घास की तलाश में 100 मील से अधिक दूरी तक जा सकते हैं. इसलिए इनके संरक्षण के लिए केवल एक क्षेत्र नहीं बल्कि पूरे समुद्री क्षेत्र को ध्यान में रखकर योजनाएं बनानी होंगी. भारतीय वन्यजीव संस्थान के अनुसार, पाक खाड़ी और मन्नार की खाड़ी में डुगोंग की बढ़ती संख्या संरक्षण प्रयासों की सफलता दिखाती है. सरकार और स्थानीय समुदायों के सहयोग से इस दुर्लभ समुद्री जीव को विलुप्त होने से बचाने की उम्मीद बढ़ी है.