Rice Export: ईरान युद्ध से 3 हजार करोड़ का माल दांव पर लगा, 300 करोड़ का नुकसान झेल चुके चावल ट्रेडर्स

Rice Export Badly Impacted by Middle East War: ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (AIREA) के महासचिव अजय भलोटिया ने किसान इंडिया से खास बातचीत में कहा कि ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध से बासमती चावल के 12,000 कंटेनरों पर असर बुरा पड़ा है. ये कोई छोटा-मोटा आंकड़ा नहीं है. इसमें करीब 3 लाख मीट्रिक टन चावल है, जिसकी कीमत लगभग 3,000 करोड़ रुपये बैठती है.

नोएडा | Updated On: 23 Mar, 2026 | 05:50 PM

मध्य पूर्व में चल रहे तनाव से दुनिया का शायद ही कोई देश या कोई सेक्टर बचा हो. इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई का असर सीधे भारत के बासमती चावल कारोबार पर असर डाल रहा है. हजारों निर्यातकों के लिए यह लड़ाई बड़ी परेशानी का सबब बन चुकी है. इंडस्ट्री के मुताबिक हालात ऐसे हैं कि लोग समझ नहीं पा रहे—आगे क्या करें, कैसे संभालें.

बासमती चावल के 12,000 कंटेनरों पर समुद्री मार्ग बाधित होने का बुरा असर

ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (AIREA) के महासचिव अजय भलोटिया ने ‘किसान इंडिया’ से खास बातचीत में कहा कि सीधे शब्दों में बात करें तो करीब बासमती चावल के 12,000 कंटेनरों पर असर पड़ा है. ये कोई छोटा-मोटा आंकड़ा नहीं है. इसमें करीब 3 लाख मीट्रिक टन चावल है, जिसकी कीमत लगभग 3,000 करोड़ रुपये बैठती है. सोचिए, इतना बड़ा माल न अपने गंतव्य तक पहुंच पा रहा है, न ही उसका पैसा वापस आ रहा है. यानी पैसा भी अटका है और माल भी.

हर कंटेनर पर औसतन डेढ़ लाख रुपये से ज्यादा का घाटा

अब नुकसान की बात करें तो तस्वीर और साफ हो जाती है. अजय भलोटिया के अनुसार, हर कंटेनर पर औसतन डेढ़ लाख रुपये से ज्यादा का घाटा हो रहा है. अगर कुल जोड़ करें, तो ये नुकसान करीब 300 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है. लेकिन असली झटका सिर्फ इस नुकसान से नहीं है—जो शिपमेंट पहले ही भेजे जा चुके थे, उनका पेमेंट भी पूरी तरह अटक गया है. यानी व्यापारी ऐसी स्थिति में हैं, जहां न उनके पास माल है, न पैसा. कैश फ्लो रुकने का मतलब है कि आगे का काम भी धीरे-धीरे ठप पड़ सकता है.

माल का नुकसान ही नहीं, हर दिन खर्च भी बढ़ रहा

जमीनी स्तर पर दिक्कतें और भी ज्यादा हैं. जिन देशों में ये चावल जाना था, वहां के लिए फिलहाल सभी शिपमेंट रोक दिए गए हैं. कई कंटेनर बीच रास्ते में ही रोक लिए गए हैं, कुछ को दूसरे पोर्ट्स पर उतार दिया गया है. इससे लॉजिस्टिक्स का पूरा हिसाब गड़बड़ा गया है. ऊपर से डिमरेज (कंटेनर खड़ा रहने का चार्ज), ग्राउंड रेंट और अतिरिक्त फ्रेट जैसे खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं. यानी नुकसान सिर्फ माल के फंसने का नहीं है, बल्कि हर दिन नया खर्च भी जुड़ रहा है.

आयातकों से स्पष्टता नहीं मिलने से गहरा रहे संकट के बादल

सबसे ज्यादा परेशानी इस बात की है कि आयातकों की तरफ से कोई साफ जवाब नहीं मिल रहा. न वे पेमेंट कर रहे हैं, न ये बता रहे हैं कि आगे क्या करना है. ऐसे में चावल निर्यातकों के पास इंतजार करने के अलावा ज्यादा विकल्प भी नहीं बचते. यह अनिश्चितता ही सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है, क्योंकि बिजनेस में प्लानिंग तभी होती है जब आगे की तस्वीर साफ हो.

497 करोड़ के राहत पैकेज का ऐलान पर गाइडलाइन का खुलासा नहीं

सरकार ने इस संकट को देखते हुए 497 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की है. यह एक जरूरी कदम तो है, लेकिन अभी तक इसकी डिटेल सामने नहीं आई है. कारोबारियों को समझ नहीं आ रहा कि उन्हें इसमें से कितना और कैसे फायदा मिलेगा. जब तक गाइडलाइंस साफ नहीं होंगी, तब तक इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता.

चावल इंडस्ट्री की सीधी और स्पष्ट मांगें

वैश्विक स्तर पर भारत की साख दांव पर

भलोटिया कहते हैं कि यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ कुछ व्यापारियों की समस्या नहीं है. बासमती चावल भारत का एक बड़ा एक्सपोर्ट प्रोडक्ट है और मध्य पूर्व इसका अहम बाजार रहा है. अगर यह संकट लंबा चलता है, तो इसका असर पूरे एग्री-एक्सपोर्ट सेक्टर पर पड़ सकता है साथ ही, अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख भी प्रभावित हो सकती है और दूसरे देश इस मौके का फायदा उठा सकते हैं.

300 करोड़ रुपये का नुकसान झेल चुकी इंडस्ट्री

आखिर में बात बहुत सीधी है—3,000 करोड़ रुपये का माल दांव पर लगा है और 300 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है. हर दिन के साथ यह आंकड़ा और बढ़ सकता है. ऐसे में जरूरी है कि जल्दी और साफ फैसले लिए जाएं. अगर समय रहते सरकार, बैंक और इंडस्ट्री मिलकर कदम उठाते हैं, तो इस संकट को काफी हद तक संभाला जा सकता है. वरना यह सिर्फ एक अस्थायी झटका नहीं रहेगा, बल्कि लंबे समय तक असर डालने वाला संकट बन सकता है.

Published: 23 Mar, 2026 | 04:36 PM

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