मौसम की मार से जूझ रहा कश्मीर का केसर, सरकारी प्रयासों के बावजूद उत्पादन में उतार-चढ़ाव जारी

सरकार का दावा है कि पुनर्जीवन मिशन के कारण केसर की खेती का कुल रकबा स्थिर हुआ है और गिरावट पर रोक लगी है. अब तक 2,500 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को इस योजना के तहत कवर किया जा चुका है. इससे किसानों को तकनीकी सहायता और सिंचाई सुविधाएं मिली हैं. फिर भी असली चुनौती जलवायु परिवर्तन की है.

नई दिल्ली | Published: 18 Feb, 2026 | 10:25 AM

Jammu and Kashmir saffron: जम्मू-कश्मीर की पहचान माने जाने वाला केसर एक बार फिर मुश्किल दौर से गुजर रहा है. यह सिर्फ एक महंगा मसाला नहीं, बल्कि घाटी की संस्कृति, अर्थव्यवस्था और हजारों किसानों की आजीविका का आधार है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मौसम की अनिश्चितता ने केसर की खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है.

विधानसभा में पेश किए गए आंकड़े बताते हैं कि कई बार बाढ़, लंबे सूखे और असामान्य तापमान ने उत्पादन को नीचे गिरा दिया. सरकार ने उत्पादन बढ़ाने के लिए कई योजनाएं शुरू कीं, मगर प्रकृति की मार के सामने ये प्रयास बार-बार चुनौती में घिरते दिखे हैं.

पुनर्जीवन मिशन से बढ़ी उम्मीदें

केसर की गिरती पैदावार को देखते हुए सरकार ने ‘नेशनल मिशन ऑन सैफ्रन’ शुरू किया. इस योजना के तहत पुराने और कमजोर कंदों (Corm) को बदला गया, वैज्ञानिक तरीके से पौधों की दूरी तय की गई और सिंचाई की बेहतर व्यवस्था की गई.

इन सुधारों का सकारात्मक असर भी देखने को मिला. जिन खेतों को पुनर्जीवित किया गया, वहां उत्पादकता 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से ऊपर पहुंची. एक साल तो ऐसा भी आया जब यह आंकड़ा लगभग 7 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गया.

सरकार का कहना है कि इस मिशन ने केसर की खेती को स्थिर करने में मदद की है और कुल रकबे में गिरावट पर रोक लगी है. अब तक 2,500 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र को इस योजना में शामिल किया जा चुका है. किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन और सिंचाई सुविधाएं भी दी गई हैं.

मौसम बना सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि सुधारों के बावजूद उत्पादन में स्थिरता नहीं आ सकी. 2014-15, 2017-18 और 2018-19 जैसे वर्षों में अत्यधिक बारिश और लंबे सूखे ने केसर की पैदावार को काफी नीचे गिरा दिया. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि केसर अत्यंत संवेदनशील फसल है. खासकर जब फूल आने का समय होता है, तब थोड़ी सी भी मौसम की गड़बड़ी भारी नुकसान कर सकती है. अचानक बारिश, तापमान में तेज बदलाव या सूखे जैसी स्थिति से फूलों की संख्या घट जाती है.

केसर के फूल में जो लाल रेशे यानी स्टिग्मा बनते हैं, वही असली उत्पादन होते हैं. यदि इनकी बनावट प्रभावित हो जाए तो पूरी फसल की गुणवत्ता और मात्रा दोनों कम हो जाती हैं. कभी-कभी सिर्फ कुछ दिनों की खराब मौसम की स्थिति ही प्रति हेक्टेयर उत्पादन को तेजी से गिरा देती है.

उत्पादन में उतार-चढ़ाव से बढ़ी चिंता

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि पुनर्जीवित क्षेत्रों से उत्पादन कभी 11 मीट्रिक टन के आसपास रहा, तो कभी 18 मीट्रिक टन से अधिक पहुंच गया. लेकिन इसके बाद फिर गिरावट दर्ज की गई. अधिकारियों का मानना है कि योजना में बड़ी खामियां नहीं हैं, बल्कि मौसम की अनिश्चितता ही इस उतार-चढ़ाव का मुख्य कारण है.

दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के किसान अब्दुल मजीद बताते हैं कि पिछले सीजन में उत्पादन सामान्य का केवल 10 से 15 प्रतिशत ही रहा. उनके अनुसार, खेती की लागत बढ़ती जा रही है, लेकिन मौसम का भरोसा नहीं है. इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ रहा है.

स्थिर रकबा, मगर भविष्य की चिंता

सरकार का दावा है कि पुनर्जीवन योजना ने केसर की खेती के कुल रकबे को स्थिर कर दिया है. लेकिन असली चुनौती जलवायु परिवर्तन है. मौसम की चरम स्थितियां कभी सूखा, कभी बाढ़ अब पहले से ज्यादा बार देखने को मिल रही हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि आगे चलकर सिर्फ तकनीकी सुधार पर्याप्त नहीं होंगे. मौसम पूर्वानुमान पर आधारित खेती, माइक्रो-इरिगेशन, जल संरक्षण और वैज्ञानिक सलाह को और मजबूत करना होगा.

जम्मू-कश्मीर का केसर दुनिया भर में अपनी गुणवत्ता और खुशबू के लिए मशहूर है. लेकिन इस खुशबू को बनाए रखने के लिए अब सिर्फ मेहनत नहीं, बल्कि मौसम से लड़ने की तैयारी भी जरूरी हो गई है.

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