नई स्टडी में बड़ा खुलासा: खेती से बढ़ रहा प्रदूषण, भारत का नाम टॉप छह देशों में शामिल

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ज्यादा उत्पादन पाने के लिए खेतों में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ा है. इन उर्वरकों से नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें निकलती हैं, जो पर्यावरण के लिए नुकसानदायक हैं. खासकर चीन, भारत, अमेरिका और ब्राजील जैसे बड़े उत्पादक देशों में यह समस्या ज्यादा देखी गई है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 17 Feb, 2026 | 07:50 AM

जलवायु परिवर्तन की बात जब भी होती है तो ज्यादातर लोग फैक्ट्रियों, गाड़ियों और कोयले की बात करते हैं. लेकिन अब एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने बताया है कि खेती भी ग्रीनहाउस गैसों का बड़ा स्रोत है. इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत उन छह देशों में शामिल है, जो मिलकर दुनिया की फसली जमीनों से निकलने वाली 61 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों के लिए जिम्मेदार हैं. यह अध्ययन नेचर क्लाइमेट चेंज जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

कौन-कौन से देश आगे?

यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित हुआ है. रिपोर्ट में चीन, इंडोनेशिया, भारत, अमेरिका, थाईलैंड और ब्राजील का नाम शामिल है. इन छह देशों में खेती बड़े पैमाने पर होती है, इसलिए यहां से गैसों का उत्सर्जन भी ज्यादा है. भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह आंकड़ा चिंता का विषय है, क्योंकि यहां करोड़ों लोग खेती पर निर्भर हैं.

सबसे ज्यादा जिम्मेदार है धान की खेती

रिपोर्ट की सबसे बड़ी बात यह है कि धान यानी चावल की खेती अकेले 43 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है. जब धान के खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहता है, तो उससे मीथेन गैस निकलती है. यह गैस वातावरण को गर्म करने में कार्बन डाइऑक्साइड से भी ज्यादा ताकतवर मानी जाती है.

इसके अलावा मक्का, ऑयल पाम और गेहूं जैसी फसलें भी उत्सर्जन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं. कुल मिलाकर ये चार फसलें लगभग तीन-चौथाई उत्सर्जन का कारण बनती हैं.

उर्वरक भी बढ़ा रहे हैं समस्या

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ज्यादा उत्पादन पाने के लिए खेतों में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ा है. इन उर्वरकों से नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें निकलती हैं, जो पर्यावरण के लिए नुकसानदायक हैं. खासकर चीन, भारत, अमेरिका और ब्राजील जैसे बड़े उत्पादक देशों में यह समस्या ज्यादा देखी गई है.

कितनी बड़ी है समस्या?

शोधकर्ताओं के अनुसार, साल 2020 में दुनिया भर की फसली जमीनों से लगभग 2.5 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर गैसों का उत्सर्जन हुआ. खेती की जमीन पूरी दुनिया की जमीन का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा घेरती है, लेकिन कृषि क्षेत्र से होने वाले कुल उत्सर्जन का 25 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ फसली जमीनों से आता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि समाधान भी खेती के तरीके बदलने में ही छिपा है. धान की खेती में पानी का बेहतर प्रबंधन किया जाए, तो मीथेन गैस कम निकल सकती है. उर्वरकों का सही और संतुलित इस्तेमाल किया जाए तो नाइट्रस ऑक्साइड कम हो सकती है.

रिपोर्ट के मुख्य लेखक प्रोफेसर मारियो हेरेरो का कहना है कि उन्होंने ऐसे नक्शे तैयार किए हैं, जिनसे हर देश और हर क्षेत्र यह समझ सकेगा कि कहां से ज्यादा गैस निकल रही है और उसे कैसे कम किया जा सकता है.

भारत के लिए क्या मतलब?

भारत में धान, गेहूं और मक्का की खेती बड़े पैमाने पर होती है. ऐसे में अगर हम खेती के तरीके थोड़ा सुधारें, पानी और खाद का सही उपयोग करें, तो उत्सर्जन को कम किया जा सकता है. इससे न सिर्फ पर्यावरण को फायदा होगा, बल्कि मिट्टी की सेहत भी बेहतर होगी. सीधी बात यह है कि खेती जरूरी है, लेकिन उसे थोड़ा समझदारी से करने की जरूरत है. अगर हम अभी से ध्यान दें, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए खेती भी बचेगी और पर्यावरण भी.

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