Nano Urea benefits: खेती में बढ़ती लागत और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता लंबे समय से किसानों की चिंता का विषय रही है. इसी बीच केंद्र सरकार ने संसद में जानकारी दी है कि नैनो यूरिया के इस्तेमाल से पारंपरिक यूरिया की खपत 25 से 50 प्रतिशत तक कम की जा सकती है, और इसके बावजूद फसल की पैदावार पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा. कुछ फसलों में तो उत्पादन 3 से 8 प्रतिशत तक बढ़ने के संकेत भी मिले हैं. यह दावा खेती को अधिक किफायती और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है.
क्या कहता है सरकार का दावा
राज्यसभा में कृषि एवं किसान कल्याण राज्यमंत्री रामनाथ ठाकुर ने लिखित जवाब में बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों ने देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में नैनो यूरिया पर व्यापक परीक्षण किए हैं. इन परीक्षणों में धान, गेहूं, सरसों, मक्का, टमाटर, पत्ता गोभी, खीरा, शिमला मिर्च और प्याज जैसी प्रमुख फसलों को शामिल किया गया.
परीक्षणों के नतीजों के आधार पर सरकार का कहना है कि यदि किसान फसल बोते समय नाइट्रोजन की अनुशंसित बेसल मात्रा दें और उसके बाद दो बार नैनो यूरिया का छिड़काव करें, तो उन्हें उतनी ही पैदावार मिल सकती है जितनी पूरी मात्रा में पारंपरिक यूरिया देने से मिलती है. कई मामलों में पैदावार में 3 से 8 प्रतिशत तक बढ़ोतरी भी देखी गई.
नैनो यूरिया को मिली आधिकारिक मंजूरी
सरकार ने बताया कि जैव-प्रभावशीलता और जैव-सुरक्षा परीक्षणों के सकारात्मक परिणामों के आधार पर नैनो यूरिया को उर्वरक नियंत्रण आदेश (FCO), 1985 के तहत नैनो नाइट्रोजन उर्वरक के रूप में अधिसूचित किया गया है. इसी तरह नैनो डीएपी और नैनो जिंक को भी परीक्षणों के बाद अधिसूचित किया गया है.
सभी नैनो उर्वरक निर्माताओं को निर्देश दिए गए हैं कि वे ICAR और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों की निगरानी में अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में परीक्षण कराएं, ताकि किसानों तक सुरक्षित और प्रमाणित उत्पाद ही पहुंचे.
लंबी अवधि के असर पर चल रहा अध्ययन
नवंबर 2025 में ICAR ने एक राष्ट्रीय स्तर का नेटवर्क प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसका शीर्षक है “भारत के विविध कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में फसल उत्पादकता और नाइट्रोजन उपयोग दक्षता पर नैनो यूरिया का मूल्यांकन.” यह अध्ययन 14 केंद्रों और 10 प्रमुख कृषि-परिस्थितिकी क्षेत्रों में 12 प्रमुख फसलों पर किया जा रहा है.
इस परियोजना में यह देखा जा रहा है कि लंबे समय तक नैनो यूरिया के इस्तेमाल से मिट्टी की पोषक संतुलन, फसल की गुणवत्ता और उत्पादन पर क्या प्रभाव पड़ता है. सरकार का कहना है कि टिकाऊ खेती की दिशा में यह अध्ययन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
फसल अवशेष प्रबंधन में भी दिखी प्रगति
संसद में फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) योजना को लेकर भी जानकारी दी गई. ICAR-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली की CREAMS प्रयोगशाला की रिपोर्ट के अनुसार, 2017 की तुलना में 2025 में पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं 92.4 प्रतिशत तक कम हुई हैं. हरियाणा में यह कमी 94.9 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 17 प्रतिशत दर्ज की गई है.
सरकार ने बताया कि 2018-19 से 2025-26 (10 फरवरी 2026 तक) के बीच CRM योजना के तहत कुल 4,173.84 करोड़ रुपये राज्यों को जारी किए गए हैं. इसमें से 2,026.45 करोड़ रुपये पंजाब और 1,156.71 करोड़ रुपये हरियाणा को दिए गए. इस राशि से किसानों को मशीनें और उपकरण उपलब्ध कराए गए, जिससे पराली जलाने की घटनाओं में कमी आई है.
किसानों के लिए क्या मायने रखता है यह बदलाव
अगर नैनो यूरिया के दावे बड़े पैमाने पर सही साबित होते हैं, तो इससे किसानों की लागत में कमी आ सकती है. कम यूरिया का मतलब कम खर्च और मिट्टी पर कम रासायनिक दबाव. साथ ही, पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह सकारात्मक कदम माना जा सकता है.
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नई तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाने से पहले उसके दीर्घकालिक प्रभावों को समझना जरूरी है. फिलहाल सरकार का रुख सकारात्मक है और उम्मीद की जा रही है कि नैनो उर्वरक खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने में मदद कर सकते हैं.