Jammu Kashmir poultry sector: जम्मू-कश्मीर में कभी तेजी से बढ़ता हुआ पोल्ट्री सेक्टर आज मुश्किल दौर से गुजर रहा है. राज्य सरकार ने अपने ताजा बजट में इस क्षेत्र के लिए बड़े लक्ष्य तय किए हैं, लेकिन उद्योग से जुड़े लोग मानते हैं कि केवल घोषणाओं से हालात नहीं बदलेंगे. उनका कहना है कि 2019 में लखनपुर टोल टैक्स खत्म किए जाने के बाद से स्थानीय पोल्ट्री उद्योग लगातार गिरावट की ओर बढ़ा है और अब इसे बचाने के लिए ठोस सुरक्षात्मक कदम जरूरी हैं.
कैसे बदला बाजार का संतुलन
कुछ साल पहले तक जम्मू-कश्मीर का पोल्ट्री सेक्टर स्थानीय खाद्य अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता था. कुल खपत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय उत्पादन से पूरा हो जाता था. हजारों छोटे और मध्यम किसान, फीड सप्लायर, हैचरी संचालक और ट्रांसपोर्टर इस उद्योग से जुड़े हुए थे. यह एक पूरी वैल्यू चेन थी, जो अलग-अलग जिलों में रोजगार का बड़ा स्रोत बनी हुई थी.
लेकिन 2019 में लखनपुर टोल प्लाजा पर लगने वाला टोल टैक्स खत्म कर दिया गया. यह टोल पोस्ट जम्मू-कश्मीर का मुख्य प्रवेश द्वार था. पहले बाहरी राज्यों से आने वाली वयस्क मुर्गियों पर करीब 9 रुपये प्रति किलो का शुल्क लगाया जाता था. यह शुल्क स्थानीय उत्पादकों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता था, जिससे वे बड़े बाहरी सप्लायर्स से मुकाबला कर पाते थे.
टोल हटने के बाद बाहर से आने वाली पोल्ट्री सस्ती हो गई और बड़े पैमाने पर बाजार में पहुंचने लगी. इससे स्थानीय किसानों की लागत और बिक्री मूल्य के बीच का संतुलन बिगड़ गया. सस्ती बाहरी सप्लाई ने स्थानीय उत्पादकों के मुनाफे को बुरी तरह प्रभावित किया.
स्थानीय हिस्सेदारी में भारी गिरावट
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर वैली पोल्ट्री फार्मर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष गुलाम मोहम्मद भट का कहना है कि टोल हटने के बाद से बाजार का स्वरूप पूरी तरह बदल गया. उनके मुताबिक पहले जहां स्थानीय उत्पादन का बाजार में करीब 85 प्रतिशत हिस्सा था, वह अब घटकर सिर्फ 15 से 20 प्रतिशत रह गया है.
यह गिरावट केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है. कई छोटे पोल्ट्री फार्म बंद हो चुके हैं या उन्होंने अपना उत्पादन काफी कम कर दिया है. नए निवेश भी लगभग रुक गए हैं, क्योंकि उद्योग में अनिश्चितता बढ़ गई है.
सरकार का नया बजट और उम्मीदें
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने बजट भाषण में पोल्ट्री क्षेत्र को फिर से मजबूत बनाने की बात कही है. उन्होंने घोषणा की कि राज्य में 800 कमर्शियल पोल्ट्री यूनिट और 50,000 बैकयार्ड पोल्ट्री यूनिट स्थापित की जाएंगी. इनसे लगभग 250 मिलियन अंडों का उत्पादन लक्ष्य रखा गया है.
सरकार का मानना है कि इससे पोल्ट्री व्यवसाय अधिक लाभकारी बनेगा और बाहरी सप्लाई पर निर्भरता कम होगी. बजट में यह भी कहा गया कि स्थानीय उत्पादन बढ़ाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाया जाएगा.
उद्योग की मांग: केवल लक्ष्य नहीं, सुरक्षा भी जरूरी
हालांकि पोल्ट्री उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि केवल नए यूनिट स्थापित करने की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी. उनका मानना है कि जब तक बाहरी राज्यों से आने वाली सस्ती पोल्ट्री पर कुछ प्रकार का सेस या शुल्क नहीं लगाया जाएगा, तब तक स्थानीय उत्पादक प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे.
उद्योग जगत का यह भी कहना है कि बाजार समर्थन, मूल्य स्थिरीकरण और स्थानीय उत्पादकों को प्रोत्साहन देने वाली योजनाएं भी लागू की जानी चाहिए. उनका तर्क है कि यदि सुरक्षात्मक तंत्र नहीं बनाया गया, तो नए निवेश भी जोखिम में पड़ सकते हैं.
राजस्व और नीति का संतुलन
लखनपुर टोल प्लाजा सरकार के लिए भी एक बड़ा राजस्व स्रोत था, जिससे हर साल करीब 1,000 करोड़ रुपये तक की आय होती थी. व्यापारी संगठनों के दबाव में इसे हटाया गया था, क्योंकि उनका कहना था कि इससे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है और व्यापार प्रभावित होता है.
लेकिन स्थानीय उद्योगपतियों और पोल्ट्री फार्म मालिकों ने उस समय चेतावनी दी थी कि टोल हटाने से घरेलू उद्योग को नुकसान होगा. आज की स्थिति को देखते हुए उनकी आशंका सही साबित होती दिखाई दे रही है.