Soymeal exports: देश में जैसे-जैसे पोल्ट्री सेक्टर फिर से रफ्तार पकड़ रहा है, वैसे-वैसे सोयामील बाजार में भी हलचल दिखने लगी है. चिकन और अंडे की मांग बढ़ने से फीड इंडस्ट्री सक्रिय हुई है, जिसका सीधा फायदा सोयामील को मिल रहा है. लंबे समय से दबाव में चल रहे सोयामील उद्योग के लिए यह राहत की खबर जरूर है, लेकिन तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है. सस्ते विकल्प के तौर पर सामने आए डिस्टिलर्स ड्राई ग्रेन विद सॉल्युबल्स (DDGS) ने प्रोसेसरों की चिंता अभी खत्म नहीं होने दी है. मांग बढ़ने के बावजूद प्रतिस्पर्धा और कीमतों का दबाव बाजार पर बना हुआ है.
पोल्ट्री सेक्टर से लौटी उम्मीद
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA) के अनुसार, पोल्ट्री सेक्टर की स्थिति फिलहाल बेहतर बनी हुई है. बिजनेस लाइन की खबर के मुताबिक, SOPA के कार्यकारी निदेशक डीएन पाठक का कहना है कि पोल्ट्री उद्योग के अच्छा प्रदर्शन करने से फीड निर्माताओं की ओर से सोयामील की खपत में सुधार दिख रहा है. हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि DDGS के बढ़ते इस्तेमाल के कारण यह सुधार सीमित दायरे में ही नजर आ रहा है. यानी मांग बढ़ रही है, लेकिन उतनी मजबूत नहीं है जितनी उद्योग चाहता है.
खपत के आंकड़े क्या कहते हैं
अगर ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो दिसंबर महीने में सोयामील की कुल खपत करीब 5 लाख टन रही, जो पिछले महीने के बराबर है. अक्टूबर से दिसंबर 2025-26 के दौरान फीड सेगमेंट से सोयामील की खपत 16 लाख टन दर्ज की गई. पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 17 लाख टन था, यानी यहां भी हल्की गिरावट देखने को मिलती है. फूड सेगमेंट की बात करें तो वहां से मांग 2.05 लाख टन रही, जबकि एक साल पहले यह 2.10 लाख टन थी. इससे साफ है कि मांग में सुधार जरूर है, लेकिन अभी वह पूरी मजबूती के साथ वापस नहीं आई है.
उत्पादन और आवक में नरमी
मांग के साथ-साथ उत्पादन और आवक के मोर्चे पर भी हल्की कमजोरी देखी गई है. मौजूदा सीजन में सोयामील का कुल उत्पादन 23.67 लाख टन रहा, जबकि पिछले साल यह 24.07 लाख टन था. इसी तरह बाजार में सोयाबीन की आवक घटकर 43 लाख टन रह गई, जो एक साल पहले 46 लाख टन थी. क्रशिंग का स्तर भी थोड़ा नीचे आया है और यह 30 लाख टन रहा, जबकि पिछले वर्ष 30.5 लाख टन की क्रशिंग हुई थी.
दिसंबर के अंत तक उद्योग के पास सोयामील का स्टॉक 1.73 लाख टन और सोयाबीन का स्टॉक 66.53 लाख टन रहा. जानकारों का कहना है कि फिलहाल स्टॉक की स्थिति संतुलित है, लेकिन अगर मांग अचानक बढ़ती है तो कच्चे माल की उपलब्धता पर दबाव आ सकता है.
निर्यात से नहीं मिल पा रहा पूरा सहारा
सोयामील के निर्यात मोर्चे पर भी हालात बहुत उत्साहजनक नहीं हैं. अक्टूबर से दिसंबर 2025-26 के दौरान भारत से सोयामील का कुल निर्यात 5.07 लाख टन रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 5.18 लाख टन था. यानी निर्यात में हल्की गिरावट दर्ज की गई है.
यूरोप अब भी भारतीय सोयामील का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है. इस अवधि में फ्रांस ने 81,728 टन और जर्मनी ने 65,201 टन सोयामील खरीदा. इसके अलावा बांग्लादेश से 60,758 टन, नेपाल से 58,872 टन और संयुक्त अरब अमीरात से 41,029 टन की मांग रही. इसके बावजूद निर्यात की रफ्तार उद्योग की उम्मीदों के मुताबिक नहीं है.
DDGS बना सबसे बड़ी चुनौती
सोयामील उद्योग के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती DDGS है. अनाज आधारित एथेनॉल उत्पादन से निकलने वाला यह उप-उत्पाद फीड के लिए काफी सस्ता पड़ता है. यही वजह है कि कई फीड निर्माता लागत घटाने के लिए सोयामील की जगह DDGS का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं. इससे सोयामील की बाजार हिस्सेदारी पर सीधा दबाव पड़ रहा है. प्रोसेसरों का मानना है कि जब तक DDGS की उपलब्धता और कीमत पर संतुलन नहीं बनता, तब तक सोयामील बाजार पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाएगा.
सोयाबीन उत्पादन से जुड़ी उम्मीद
इस बीच SOPA ने 2025-26 तेल वर्ष के लिए देश में सोयाबीन उत्पादन का अनुमान 105.36 लाख टन लगाया है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह अनुमान सही साबित होता है और पोल्ट्री सेक्टर की मांग बनी रहती है, तो आने वाले महीनों में सोयामील उद्योग को कुछ राहत मिल सकती है. हालांकि इसके लिए जरूरी है कि फीड इंडस्ट्री की रणनीति संतुलित रहे और बाजार में कीमतों का दबाव बहुत ज्यादा न बढ़े.