खेती का बदल गया गणित! 18.19 लाख किसान प्राकृतिक खेती से जुड़े, मिट्टी भी हो रही स्वस्थ

भारत में पुनर्योजी कृषि तेजी से बढ़ रही है. 18.19 लाख किसान प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं और 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र इससे जुड़ गया है. वहीं 109 लाख हेक्टेयर में सूक्ष्म सिंचाई और 25.89 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड मिट्टी व उत्पादन सुधारने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.

नोएडा | Updated On: 23 Aug, 2026 | 08:09 PM

Natural Farming India: भारत में खेती को टिकाऊ, कम लागत वाली और जलवायु के अनुकूल बनाने की दिशा में पुनर्योजी कृषि (Regenerative Agriculture) तेजी से विस्तार कर रही है. सरकार के ताजा आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 तक 18,786 प्राकृतिक खेती क्लस्टर विकसित किए जा चुके हैं, जिनसे 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र जुड़ा है और 18.19 लाख किसान प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं. वहीं, ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना के तहत मई 2026 तक 109 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सूक्ष्म सिंचाई से कवर हो चुका है, जबकि 25.89 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) जारी कर किसानों को वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन से जोड़ा गया है.

मिट्टी की सेहत सुधारने पर सरकार का बड़ा फोकस

वित्त वर्ष 2015-16 से 2024-25 के दौरान कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों की औसत दशकवार वृद्धि 4.45 प्रतिशत रही है. इसके बावजूद लगातार रासायनिक उर्वरकों का अधिक उपयोग, एक ही फसल चक्र और अनियमित वर्षा के कारण कई क्षेत्रों में मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हुई है. इसी चुनौती से निपटने के लिए सरकार पुनर्योजी कृषि को बढ़ावा दे रही है. इस खेती पद्धति में कम जुताई, मिट्टी को ढककर रखना, जीवित जड़ों का संरक्षण, जैव विविधता बढ़ाना, रासायनिक इनपुट का संतुलित उपयोग और पशुपालन  को खेती से जोड़ने जैसे सिद्धांत अपनाए जाते हैं. इसका उद्देश्य केवल मिट्टी का संरक्षण नहीं, बल्कि उसकी उर्वरता को लगातार बेहतर बनाना है.

प्राकृतिक खेती और सूक्ष्म सिंचाई से बढ़ेगी लाभदायक खेती

राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन  (NMNF) के तहत किसानों को दो वर्षों तक प्रति एकड़ प्रति वर्ष 4,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है. जैविक इनपुट उपलब्ध कराने के लिए देशभर में 10,000 जैव-इनपुट संसाधन केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं. साथ ही 33,676 कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन को प्रशिक्षण देकर किसानों तक तकनीकी मार्गदर्शन पहुंचाया गया है. दूसरी ओर, ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना के तहत छोटे और सीमांत किसानों को ड्रिप व स्प्रिंकलर सिंचाई पर 55 प्रतिशत, जबकि अन्य किसानों को 45 प्रतिशत तक केंद्रीय सहायता मिलती है. अब तक इस योजना के लिए 26,325 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की जा चुकी है.

जैविक खेती, IFS और कृषि वानिकी से आय के नए अवसर

परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) के तहत किसानों को जैविक खेती अपनाने और प्रमाणन के लिए तीन वर्षों में 31,500 रुपये प्रति हेक्टेयर तक सहायता दी जाती है. अक्टूबर 2025 तक 16.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र जैविक खेती के दायरे में आ चुका था. एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) के तहत फसल, पशुपालन, मछली पालन, बागवानी और मधुमक्खी पालन को जोड़कर आय के कई स्रोत विकसित किए जा रहे हैं. वर्ष 2025 तक 9.53 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर हुआ और 15.73 लाख किसान लाभान्वित हुए, जबकि 2,251.98 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता दी गई. कृषि वानिकी को बढ़ावा देने के लिए 27 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में 78.31 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए. इसके तहत 135 नई नर्सरियां स्थापित हुईं, 176.59 लाख पौधे तैयार किए गए और 25,693 किसानों को लाभ मिला.

25.89 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड से वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना  के तहत किसानों की मिट्टी के 12 प्रमुख मानकों की जांच कर फसलवार उर्वरक उपयोग की सलाह दी जाती है. 13 मार्च 2026 तक देश में 25.89 करोड़ SHC जारी किए जा चुके हैं और संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए 7.17 लाख प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि हरी खाद, कवर क्रॉप, मल्चिंग, सूक्ष्म सिंचाई और प्राकृतिक खेती जैसी तकनीकों से मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी, पानी की बचत होगी, खेती की लागत घटेगी और किसान सूखा, अधिक वर्षा तथा जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकेंगे.

Published: 23 Aug, 2026 | 11:30 PM

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