एक घोल से बदल जाएगी खेती की तकदीर, जानिए जीवामृत बनाने का आसान तरीका
जीवामृत एक तरल जैविक खाद है, जिसे देसी गाय के गोबर और गौमूत्र से तैयार किया जाता है. इसमें गुड़, बेसन और खेत की उपजाऊ मिट्टी मिलाई जाती है. कुछ दिनों तक इसे सड़ने और पकने के लिए छोड़ दिया जाता है. इसके बाद यह एक असरदार प्राकृतिक घोल बन जाता है.
Natural Farming: आज के समय में खेती सिर्फ ज्यादा अनाज उगाने तक सीमित नहीं रह गई है. किसान अब ऐसी खेती करना चाहते हैं, जिसमें जमीन की सेहत भी बनी रहे, खर्च कम हो और फसल की गुणवत्ता भी अच्छी हो. लंबे समय से रासायनिक खाद और कीटनाशकों के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी कमजोर होती जा रही है. कई जगह जमीन की उर्वरता घट गई है और उत्पादन लागत बढ़ गई है. ऐसे में प्राकृतिक खेती की ओर किसानों का झुकाव तेजी से बढ़ रहा है. इसी प्राकृतिक खेती का एक अहम हिस्सा है- जीवामृत.
जीवामृत को एक आसान और सस्ता जैविक घोल माना जाता है, जो मिट्टी को ताकत देता है और फसल को बेहतर बनाता है.
जीवामृत क्या है?
जीवामृत एक तरल जैविक खाद है, जिसे देसी गाय के गोबर और गौमूत्र से तैयार किया जाता है. इसमें गुड़, बेसन और खेत की उपजाऊ मिट्टी मिलाई जाती है. कुछ दिनों तक इसे सड़ने और पकने के लिए छोड़ दिया जाता है. इसके बाद यह एक असरदार प्राकृतिक घोल बन जाता है.
यह सीधे-सीधे पौधों को पोषण नहीं देता, बल्कि मिट्टी में मौजूद अच्छे सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाता है. यही सूक्ष्म जीव मिट्टी में छिपे पोषक तत्वों को पौधों तक पहुंचाने का काम करते हैं. इस तरह मिट्टी खुद ही पौधों को ताकत देने लगती है.
मिट्टी की सेहत में सुधार
रासायनिक खादों के लगातार उपयोग से मिट्टी सख्त और कमजोर हो जाती है. जीवामृत मिट्टी को फिर से जीवित करने का काम करता है. इसके उपयोग से मिट्टी में जैविक गतिविधियां बढ़ती हैं. केंचुए और लाभकारी जीवाणु सक्रिय हो जाते हैं.
जब मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ बनती है, तो पौधों की जड़ें गहराई तक जाती हैं. इससे पौधे ज्यादा पोषक तत्व लेते हैं और मजबूत बनते हैं. मिट्टी में नमी भी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे पानी की बचत होती है.
जीवामृत कैसे तैयार करें?
जीवामृत बनाना बहुत आसान है. किसान इसे घर या खेत पर ही तैयार कर सकते हैं. एक बड़े ड्रम में लगभग 200 लीटर पानी लें. उसमें 10 किलो देसी गाय का गोबर, 10 लीटर गौमूत्र, 2 किलो गुड़, 2 किलो बेसन और थोड़ी-सी खेत की मिट्टी डालें.
इस मिश्रण को लकड़ी की डंडी से अच्छी तरह मिलाएं. रोज सुबह-शाम इसे हिलाना जरूरी है, ताकि इसमें मौजूद सूक्ष्म जीव सक्रिय रहें. करीब 7 से 10 दिनों में यह घोल तैयार हो जाता है. तैयार जीवामृत को सिंचाई के पानी के साथ खेत में डाला जा सकता है. चाहें तो पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव भी किया जा सकता है.
उत्पादन और गुणवत्ता में फायदा
कई किसानों का अनुभव है कि जीवामृत के उपयोग से फसल ज्यादा हरी-भरी होती है. पौधे मजबूत रहते हैं और उनमें फूल व फल अधिक आते हैं. अनाज वाली फसलों में दाने भरे हुए और चमकदार बनते हैं.
सब्जियों और फलों में स्वाद भी बेहतर होता है. बाजार में रसायन-मुक्त फसल की मांग बढ़ रही है, इसलिए ऐसी उपज को अच्छा दाम भी मिल सकता है.
खर्च कम, मुनाफा ज्यादा
खेती की लागत लगातार बढ़ रही है. रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर किसान का काफी पैसा खर्च होता है. जीवामृत अपनाने से इन चीजों पर निर्भरता कम हो जाती है. क्योंकि इसकी सामग्री गांव में ही आसानी से मिल जाती है, इसलिए इसकी लागत बहुत कम आती है. इससे खेती ज्यादा लाभकारी बन सकती है.
प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ता कदम
सरकार और कृषि विभाग भी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं. कई जगह प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, ताकि किसान कम खर्च में अच्छी खेती कर सकें.
जीवामृत केवल एक खाद नहीं है, बल्कि मिट्टी, किसान और उपभोक्ता—तीनों के लिए फायदेमंद उपाय है. इससे जमीन की सेहत सुधरती है, किसान की लागत घटती है और लोगों को सुरक्षित भोजन मिलता है.
आने वाले समय में जीवामृत जैसी प्राकृतिक तकनीकें खेती की दिशा बदल सकती हैं. अगर किसान सही तरीके से इसका उपयोग करें, तो खेती ज्यादा टिकाऊ और मुनाफेदार बन सकती है.