Opinion: खाड़ी संकट से बजी खतरे की घंटी : खेती, खाद और खाद्यान्न का बिगड़ेगा गणित

दुनिया, अमेरिकी पूंजीवाद के भंवर में बुरी तरह फंस चुकी है. ऐसे में मानव जाति के लिए अब अपनी गलतियों को सुधारने के लिए फिलहाल कोई यू-टर्न नहीं दिखता है. इस मकड़जाल से बाहर आने में थोडी बहुत उम्मीद भारत में परंपरागत तौर तरीकों से ही दिखती है.

झांसी | Published: 9 Jun, 2026 | 04:48 PM

अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हुए हमले से होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता बंद होने के कारण दुनिया भर में कच्चे तेल की आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हो चुकी है. इस अविवेकपूर्ण युद्ध का असर अब खाडी देशों पर पडने के कारण कच्चे तेल के अलावा प्राकृतिक और तरल गैस की आपूर्ति लगभग ठप हो गई है. ऐसे में, तेल और गैस के मामले में आयात पर निर्भर भारत जैसे देशों की चिंता बढ़ना लाजमी है. इसी चिंता का नतीजा है कि पहले पीएम मोदी ने देश के नागरिकों से तेल बचाने और किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील की और फिर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आगामी खरीफ सीजन में रासायनिक उर्वरकों से संभावित संकट की ओर इशारा किया है. मतलब साफ है कि सरकार अब अपनी उस मजबूरी के दौर में प्रवेश कर गई है, जहां से संसाधनों के वितरण की आपात स्थिति की सीमा प्रारंभ होती है. हालांकि अभी कानूनी प्रावधानों में वर्णित ’वित्तीय आपात” जैसे हालात आसन्न तो नहीं हैं, लेकिन आगे ऐसे हालात नहीं होंगे, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है.

खेती और खाद्यान्न का गणित बिगड़ने का खतरा

लगभग दो महीने से चल रहे इस युद्ध के भारत पर असर को लेकर कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि आगामी खरीफ सीजन में रासायनिक उर्वरकों की कमी होना अवश्यम्भावी है. बेशक, इससे खेती और खाद्यान्न का गणित बिगडेगा. इससे महज किसान ही नहीं, आम जन की पॉकेट भी प्रभावित होगी. भारत के लिए आसन्न इस संकट के मूल में तेल और उर्वरक ही हैं। इन दोनों से जुडे तथ्य परक आंकड़े तस्वीर को साफ कर देते हैं. सबसे पहला तथ्य तो यही है कि तेल एवं तरल और प्राकृतिक गैस के मामले में भारत खाडी देशों से आयात पर निर्भर है. रासायनिक उर्वरक के घरेलू स्तर पर उत्पादन के मामले में भारत, बीते कुछ सालों में बहुत हद तक आत्मनिर्भर बना है, लेकिन यूरिया के उत्पादन में प्राकृतिक गैस की दरकार ने अरब देशों पर निर्भरता को बढा दिया है.

रासायनिक खादों का घरेलू उत्पादन और स्टॉक

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में रासायनिक उर्वरकों की सालाना औसत खपत लगभग 600 लाख टन है. इसमें अकेले यूरिया की हिस्सेदारी लगभग 400 लाख टन और डीएपी की 150 लाख टन रहती है. भारत में रासायनिक खादों का घरेलू स्तर पर उत्पादन लगभग 500 लाख टन है. इसके बावजूद भारत को हर साल औसतन 150 लाख टन उर्वरकों का आयात करना पडता है. इसके अलावा 500 लाख टन घरेलू उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस की शत प्रतिशत उपलब्धता आयात पर ही निर्भर है. इससे स्पष्ट है कि भारत के लिए रासायनिक खादों का घरेलू उत्पादन भी किसी न किसी रूप में आयात पर ही निर्भर है.

इस पूरे परिदृश्य में दूसरी बडी चुनौती भंडारण की है. तेल की तरह कोई भी देश रासायनिक खादों का साल भर भंडारण नहीं कर सकता है. तेल संकट से निपटने के लिए सभी देश 90 दिन तक का ऑयल स्टॉक साल भ्रर रखते हैं. जबकि रासायनिक खाद का सीमित समय के लिए ही स्टॉक करना संभव है. इसलिए खेती के समय जब खाद की जरूरत होती है, तभी इसकी आपूर्ति करना एकमात्र विकल्प है. आपूर्ति में अगर देरी हुई, तो कृषि उपज का उत्पादन 20 से 40 प्रतिशत तक कम होना तय है. रासायनिक खेती के चंगुल में फंस चुकी दुनिया के लिए खाद्यान्न की आपूर्ति श्रृंखला को बरकरार रखने का अब एकमात्र विकल्प रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति को बहाल रखना है.

देश के 3 प्रमुख यूरिया प्लांट का उत्पादन घटा

खासकर, भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए अपनी विशाल आबादी को सस्ता राशन उपलब्ध कराने में रासायनिक खेती के एकाधिकार ने खेती और खाद्यान्न के संकट को गहरा दिया है. यही वजह है कि देश के प्रधानमंत्री को अपने नागरिकों से तेल बचाने, सोना नहीं खरीदने और किसानों से परंपरागत खेती अपनाने की अपील करनी पड़ी है.
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस साल आसन्न खरीफ सीजन किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा. क्योंकि आगामी खरीफ सीजन में रासायनिक खादों की अनुमानित मांग 390 लाख टन होगी. जबकि अभी देश में अनुमानित मांग का लगभग 50 फीसदी यानी 200 लाख टन उर्वरक का भंडार है. हाल ही में कतर से प्राकृतिक गैस की सप्लाई में तेजी से आई गिरावट के कारण देश के 3 प्रमुख यूरिया प्लांट का उत्पादन भी बहुत कम हो गया है.

जानकारों का कहना है कि किसी भी यूरिया प्लांट का ठप होना रेल के इंजन को बंद करने जैसा महंगा सौदा है. इसके मद्देनजर ही सरकार को इस बात का अहसास है कि अगर आज युद्ध बंद हो जाए और तेल एवं गैस की आपूर्ति भी बहाल हो जाए, तो भी बंद पडे यूरिया संयंत्रों को दोबारा चालू करने में 4 से 6 सप्ताह लगेंगे. इस बीच यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमत भी लगभग दोगुनी होकर 720 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई हैं. इससे भारत में सरकार के यूरिया की सब्सिडी के बिल (1.71 लाख करोड़ रुपए) में खासी बढ़ोतरी होना तय है. इससे इतना तो समझा ही जा सकता है कि सरकार, खेती और खाद्यान्न आपूर्ति से जुडे संसाधनों की बढी कीमतों का असर फिलहाल खरीफ सीजन में भले ही किसानों पर न पडने दे, लेकिन जब अक्टूबर में फसल कटकर आएगी, तब बढ़ी हुई कीमतों के रूप में यह असर रबी सीजन के दौर में किसानों और आम जन पर पड़ना तय है.

अमेरिकी पूंजीवाद के भंवर में बुरी तरह फंसी दुनिया

ऐसे में युद्ध से उपजे वैश्विक हालात का सामान्य विश्लेषण इस बात की ताकीद करता है कि दुनिया, अमेरिकी पूंजीवाद के भंवर में बुरी तरह फंस चुकी है. ऐसे में मानव जाति के लिए अब अपनी गलतियों को सुधारने के लिए फिलहाल कोई यू-टर्न नहीं दिखता है. इस मकड़जाल से बाहर आने में थोडी बहुत उम्मीद भारत में परंपरागत तौर तरीकों से ही दिखती है. वह भी छोटी इकाइयों के रूप में खेती से लेकर आजीविका के अन्य पारंपरिक विकल्पों को अपना कर परिवार, कुटुंब और समाज के स्तर पर आत्मनिर्भर जीवन की राह चुनना ही सुरक्षित रास्ता हो सकता है. शायद, इसी आपदा से गांधी के ग्राम स्वराज का स्वप्न भी साकार करने का अवसर हम भारतीयों को मिल सके, बशर्ते कि ’हम भारत के लोग’ गांधी के दर्शन को सरल स्वरूप में आत्मसात करने की योग्यता अर्जित कर पाएं.

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