गरीबों के लिए बेहतर राशन या इथेनॉल के लिए कच्चा माल? किसे होगा टूटे चावल पर सरकार के फैसले से ज्यादा फायदा

सरकार का कहना है कि राशन कार्ड धारकों को अब बेहतर गुणवत्ता वाला चावल मिलेगा. लेकिन इसी फैसले से इथेनॉल उद्योग को बड़ी मात्रा में 100 प्रतिशत टूटा चावल भी उपलब्ध होगा. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ किसे मिलेगा.

नई दिल्ली | Updated On: 3 Jul, 2026 | 01:22 PM

कैबिनेट का एक फैसला आया, जो पहली नजर में पूरी तरह गरीबों को बेहतर क्वालिटी का राशन मुहैया कराने वाला लग रहा है. केंद्र सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत मिलने वाले चावल की गुणवत्ता सुधारने का फैसला किया है. इसका मतलब यह है कि गरीबों को बेहतर चावल मिलेंगे. पहली नजर में यह फैसला करोड़ों राशन कार्ड धारकों के हित में दिखाई देता है. लेकिन इसी फैसले का दूसरा पक्ष यह भी है कि मिलिंग के दौरान अलग होने वाला 100 प्रतिशत टूटा चावल अब बड़े पैमाने पर इथेनॉल उत्पादन और अन्य औद्योगिक उपयोग के लिए उपलब्ध होगा.
सवाल यह भी है कि इससे ज्यादा फायदा किसका होगा. गरीबों का या उद्योग का? इस फैसले को केवल खाद्य गुणवत्ता सुधार के रूप में नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और इथेनॉल नीति के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है.

गरीबों को क्या मिलेगा?

पहले गरीबों की बात कर लेते हैं, क्योंकि सबसे पहले उन्हीं की बात होती है. काम भले ही उनके पक्ष में न हो. सरकार ने कच्चे चावल में टूटे दानों की अधिकतम सीमा 25 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत और उसना (parboiled) चावल में 16 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दी है.
इसका सीधा असर उन करोड़ों परिवारों पर पड़ेगा, जो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मुफ्त या रियायती चावल प्राप्त करते हैं. लंबे समय से सरकारी राशन में मिलने वाले चावल की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं. ऐसे में सरकार इसे लाभार्थियों के लिए गुणवत्ता सुधार का बड़ा कदम बता रही है. सरकार का दावा है कि राशन की मात्रा में कोई कमी नहीं होगी और केवल गुणवत्ता बेहतर होगी.

लेकिन इथेनॉल वाला पहलू भी उतना ही बड़ा है

अब दूसरा पक्ष. यह उद्योग जगत के पक्ष में है. इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मिलिंग के दौरान अलग किए गए 100 प्रतिशत टूटे चावल को अब अलग से संग्रहित कर उत्पादक तरीके से इस्तेमाल किया जाएगा.
सरकार ने आधिकारिक तौर पर केवल इतना कहा है कि इसका उपयोग इथेनॉल और अन्य औद्योगिक कार्यों में होगा. हालांकि, अंग्रेजी अखबार बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, एक सरकारी सूत्र ने कैबिनेट ब्रीफिंग के दौरान नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि चूंकि इथेनॉल का मुद्दा हाल के समय में काफी संवेदनशील रहा है, इसलिए सरकार ने नियमित प्रेस ब्रीफिंग में इस पहलू का विशेष उल्लेख नहीं किया. सूत्र के मुताबिक, अलग किया गया 100 प्रतिशत टूटा चावल बायोफ्यूल (इथेनॉल) कार्यक्रम की ओर भेजे जाने की संभावना है.
यानी जिस टूटे चावल को अब तक कम गुणवत्ता वाला माना जाता था, वही अब एक आर्थिक संसाधन बन जाएगा. इस बात को फिलहाल ज्यादा प्रचारित इसलिए नहीं किया जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ दिन से इथेनॉल के खिलाफ सोशल मीडिया पर मुहिम जैसी चल रही है. इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ी के इंजन को नुकसान, माइलेज में कमी जैसे मुद्दों पर आम राय बनती दिख रही है. यहां तक कि कुछ विशेषज्ञों ने भी माना है कि माइलेज पर काफी असर पड़ रहा है. बीच-बीच में सरकार की तरफ से इन मुद्दों पर सफाई भी दी जा रही है, लेकिन राय इथेनॉल ब्लेंडिंग के खिलाफ बनती नजर आ रही है.

सरकार के लिए भी बड़ा आर्थिक फायदा

इसीलिए सरकार ने फैसला सतर्कता बरतते हुए लिया है. यह फैसला केवल गुणवत्ता सुधार तक सीमित नहीं है. सरकार के अनुसार- हर साल लगभग 2,161 करोड़ रुपये की लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग और भंडारण लागत बचेगी. इस फैसले से टूटे हुए चावल की नीलामी सीधे राइस मिलों से होगी, जिससे परिवहन खर्च कम होगा. टूटे चावल की बिक्री से अतिरिक्त राजस्व मिलेगा, जिससे खाद्य सब्सिडी का बोझ भी घटाने में मदद मिलेगी. यानी इस फैसले से सरकार को गुणवत्ता सुधार के साथ-साथ वित्तीय लाभ भी मिलने की उम्मीद है.

क्या यह इथेनॉल नीति से भी जुड़ा कदम है?

पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने पर जोर दे रही है. हालांकि, खाद्यान्न से इथेनॉल बनाने को लेकर समय-समय पर बहस भी होती रही है, खासकर तब जब खाद्य महंगाई या उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ती है.
ऐसे में यह फैसला सरकार को एक नया रास्ता देता है. अब राशन के लिए बेहतर गुणवत्ता वाला चावल अलग होगा, जबकि पूरी तरह टूटे दानों का उपयोग औद्योगिक और इथेनॉल उत्पादन में किया जा सकेगा. इससे खाद्यान्न की बर्बादी भी कम होगी और इथेनॉल उद्योग को अतिरिक्त कच्चा माल भी मिलेगा.

तो आखिर यह फैसला किसके लिए ज्यादा है?

यदि केवल लाभार्थियों के नजरिए से देखें तो उन्हें पहले से बेहतर गुणवत्ता का चावल मिलेगा, जो निश्चित रूप से सकारात्मक बदलाव है. लेकिन यदि व्यापक आर्थिक नजरिए से देखें तो यह फैसला तीन लक्ष्यों को एक साथ साधने की कोशिश करता दिखता है— पहला, गरीबों को बेहतर गुणवत्ता वाला राशन. दूसरा, सरकार के खर्च में कमी और तीसरा इथेनॉल क्षेत्र के लिए अतिरिक्त कच्चे माल की उपलब्धता.
यानी यह केवल राशन सुधार का फैसला नहीं है, बल्कि खाद्य प्रबंधन, लागत नियंत्रण और बायोफ्यूल नीति को साथ लेकर चलने वाली एक व्यापक रणनीति भी माना जा सकता है.
इसके साथ ही, पिछले दिनों लिए गए एक और फैसले को इससे जोड़कर देखा जा सकता है. सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (NFSA) के तहत प्रति परिवार की जगह प्रति व्यक्ति राशन वितरण का प्रस्ताव लाई है, वहीं अब राशन में बेहतर गुणवत्ता का चावल देने और अलग हुए टूटे चावल को इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने का फैसला किया गया है. इससे संकेत मिलता है कि सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली को गुणवत्ता, लक्ष्य आधारित वितरण और संसाधनों के अधिकतम उपयोग वाले मॉडल की ओर ले जाना चाहती है.

Published: 3 Jul, 2026 | 12:40 PM

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