तिलहन रकबा बढ़ाने में सरकारी प्रयास फेल.. 19 लाख हेक्टेयर में नहीं हुई बुवाई, आत्मनिर्भरता को झटका

Oilseed crops Acreage Fall Down: तिलहन इंडस्ट्री की शीर्ष बॉडी SEA इंडिया ने तिलहन फसलों के गिरते रकबे और इन फसलों से किसानों के मुंह मोड़ने को बेहद चिंताजनक बताया है. एसोसिएशन ने कहा कि मूंगफली और सोयाबीन की खेती में इस बार किसानों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई है, जिसके नतीजे में रिकॉर्ड 19 लाख हेक्टेयर रकबा घट गया है.

रिजवान नूर खान
नोएडा | Published: 2 Jul, 2026 | 07:45 PM

केंद्र सरकार ने किसानों को तिलहन की खेती में आत्मनिर्भरता लाने के लिए राष्ट्रीय खाद्य तिलहन मिशन शुरू किया. तिलहन फसलों को बढ़ावा देने के लिए इस साल विकसित भारत संकल्प अभियान चलाया गया. हर खेत वैज्ञानिक कैंपेन के तहत कृषि वैज्ञानिक खेतों तक पहुंचे और अभी खेत बचाओ अभियान चलाया जा रहा है. इन अभियानों के दौरान दलहन, तिलहन फसलों की खेती करने समेत कई बिंदुओं पर किसानों को प्रोत्साहित किया गया. लेकिन, खरीफ सीजन में तिलहन फसलों की बुवाई प्रगति आंकड़े बेहद निराशाजनक हैं. 19 लाख हेक्टेयर में तिलहन फसलों की खेती इस बार नहीं की गई है. यह स्थिति दर्शाती है कि सरकारी प्रयासों का असर जमीन पर नहीं दिखा है.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि इस खरीफ सीजन तिलहन फसलों की बुवाई का कुल क्षेत्रफल 30 जून के अपडेट तक केवल 16.99 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है. जबकि, बीते साल की समान अवधि तक यह रकबा 36.41 लाख हेक्टेयर के पार पहुंच गया था. तिलहन फसलों में आने वाली मूंगफली, सोयाबीन की बुवाई में कमी दर्ज की गई है. मूंगफली का बुवाई क्षेत्रफल 6.42 लाख हेक्टेयर घट गया है. जबकि, सोयाबीन की खेती का क्षेत्रफल 13 लाख हेक्टेयर घट गया है.

19 लाख हेक्टेयर में नहीं बोई जा सकीं तिलहन फसलें

तिलहन इंडस्ट्री की शीर्ष बॉडी द सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने तिलहन फसलों के गिरते रकबे और इन फसलों से किसानों के मुंह मोड़ने को बेहद चिंताजनक बताया है. एसोसिएशन ने कहा कि मूंगफली और सोयाबीन की खेती में इस बार किसानों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई है. इसके चलते कुल मिलाकर 19.4 लाख हेक्टेयर में तिलहन फसलों की बुवाई ही नहीं की गई है.

क्या मॉनसून में देरी से तिलहन फसलों की बुवाई घटी

तिलहन फसलों की बुवाई का क्षेत्रफल घटने की सबसे बड़ी वजह मॉनसून में देरी को माना जा रहा है. क्योंकि, जून में फसलों की बुवाई की जाती है. लेकिन, इस बार 28 जून तक कई राज्यों में मॉनसून की एंट्री ही नहीं हुई, जिसके नतीजे में मिट्टी को नमी नहीं मिली और किसान बारिश का इंतजार करते थक गए और दूसरी फसलों में शिफ्ट कर गए जो कम पानी लागत में पैदा हो जाती हैं. भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार जून महीने में मौसमी बारिश सामान्य से 40 फीसदी से कम रही है. जाहिर है बारिश पर निर्भर इलाकों के किसान खेतों में उतरने से पहले मिट्टी में बेहतर नमी का इंतजार करते रहे.

अगले दो सप्ताह बेहद अहम – डॉ. बीवी मेहता

द सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. बीवी मेहता ने बयान में कहा कि खाद्य तेल क्षेत्र के लिए अगले दो तीन हफ्ते बहुत अहम होंगे. मॉनसून का समय पर जोर पकड़ना घरेलू तिलहन उत्पादन के लिए बहुत जरूरी है. कम उत्पादन आयात पर निर्भरता को प्रभावित कर सकता है और आने वाले महीनों में बाजार की कीमतों की दिशा तय कर सकता है. उन्होंने कहा कि हालांकि, बुवाई का मौसम अभी शुरुआती दौर में है और आने वाले हफ्तों में मॉनसून की अच्छी बारिश से इसमें तेजी लाएगी.

सरकारी जागरूकता और प्रचार अभियानों का कितना असर

केंद्र सरकार और राज्यों की ओर से लगातार तिलहन फसलों को बढ़ावा देने के लिए अभियान चलाए जाते रहे हैं. कृषि एक्सपर्ट बताते हैं कि अभियान सही तरीके से 100 फीसदी किसानों तक नहीं पहुंच सके, जिसके नतीजे में किसानों का भरोसा नहीं बन सका. कृषि विज्ञान केंद्रों की सीमित भूमिका भी इसके लिए कम दोषी नहीं है. सरकारी अभियान किसानों तक पहुंचाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) का सहारा लिया जाता है. जानकार बताते हैं कि केवीके जिन इलाकों स्थापित हैं वे वहीं आसपास के गांवों के किसानों तक सीमित रहते हैं. पूरे जिले में उनकी सक्रियता हमेशा से सवालों के घेरे में रही है.

..तो फिर कैसे बनेंगे खाद्य तेल में आत्मनिर्भर

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत अपनी कुल खपत का करीब 60 फीसदी खाद्य तेल विदेशों से आयात करता है और 40 फीसदी घरेलू उत्पादन से पूर्ति की जाती है. देश हर साल लगभग 167 लाख मीट्रिक टन खाद्य तेल मंगाता है और इस पर सालाना करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं. मई 2026 के आंकड़े बताते हैं कि खाद्य तेल आयात मई तक 7 महीने में 6.7 फीसदी बढ़ गया. खाद्य तेल पर विदेशी निर्भरता खत्म करने के लिए राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन शुरू किया गया और तमाम जागरूकता अभियान चलाए गए हैं. लेकिन, खाद्य तेल उत्पादन करने के लिए तिलहन फसलों की बुवाई प्रगति ने चिंता बढ़ा दी है.

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