Edible oil import duty: देश में खाने के तेल की बढ़ती आयात निर्भरता को कम करने और किसानों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार बड़ा फैसला ले सकती है. सरकार खाद्य तेलों पर आयात शुल्क बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है. माना जा रहा है कि इससे देश के तेलहन किसानों को उनकी फसलों का बेहतर दाम मिल सकेगा और विदेशों से होने वाले आयात पर भी कुछ हद तक रोक लगेगी.
सरकारी सूत्रों के अनुसार घरेलू वनस्पति तेल उद्योग ने सरकार से आयात शुल्क बढ़ाने की मांग की है. इसी मांग को लेकर अब सरकार स्तर पर चर्चा चल रही है. हालांकि अभी अंतिम फैसला नहीं लिया गया है.
किसानों को फायदा पहुंचाने की कोशिश
सरकार का मानना है कि अगर आयात शुल्क बढ़ाया जाता है तो विदेशों से आने वाला सस्ता खाद्य तेल महंगा हो जाएगा. इससे देश में पैदा होने वाले सरसों, सोयाबीन और अन्य तेलहन फसलों के किसानों को अच्छा भाव मिल सकता है. पिछले कुछ समय से किसान लगातार मांग कर रहे हैं कि उन्हें उनकी फसल का उचित दाम मिले. ऐसे में सरकार अब तेलहन किसानों को राहत देने के विकल्प तलाश रही है.
भारत अब भी आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर
भारत दुनिया में खाद्य तेल का सबसे बड़ा आयातक देश माना जाता है. देश अपनी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत खाद्य तेल विदेशों से मंगाता है. पाम ऑयल मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है, जबकि सूरजमुखी तेल का बड़ा हिस्सा रूस और यूक्रेन से आयात किया जाता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि आयात पर इतनी ज्यादा निर्भरता देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर डालती है, क्योंकि इसके लिए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है.
रुपये पर भी बढ़ रहा दबाव
सरकार की चिंता केवल किसानों तक सीमित नहीं है. लगातार बढ़ते आयात के कारण विदेशी मुद्रा का बहाव भी बढ़ रहा है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ रहा है. रिपोर्ट के अनुसार इस साल एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में भारतीय रुपया भी शामिल रहा है. ऐसे में सरकार आयात कम करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की थी अपील
इसी महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से आयातित वस्तुओं पर निर्भरता कम करने की अपील की थी. उन्होंने खाद्य तेल, उर्वरक, सोना और कच्चे तेल जैसी चीजों का जिक्र करते हुए आत्मनिर्भरता पर जोर दिया था. सरकार का मानना है कि अगर देश में तेलहन उत्पादन बढ़ेगा तो आयात खर्च कम होगा और किसानों को भी सीधा फायदा मिलेगा.
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ीं कीमतें
पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी दिखाई दे रहा है. सप्लाई चेन प्रभावित होने के कारण खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी आई है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक खाद्य वस्तुओं की कीमतें पिछले तीन वर्षों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं. इसमें वनस्पति तेल, अनाज और मांस उत्पादों की कीमतों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई है.
पाम ऑयल की कीमतों में बड़ा उछाल
दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले पाम ऑयल की कीमतें युद्ध शुरू होने के बाद करीब 12 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं. इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे बड़े उत्पादक देश अब जैव ईंधन उत्पादन बढ़ा रहे हैं, जिससे खाद्य तेल की उपलब्धता पर असर पड़ रहा है. ऐसे में भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है.
पहले सरकार ने घटाई थी ड्यूटी
पिछले साल सरकार ने खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कच्चे पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया था. उस समय सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में कीमतों को कम करना और उपभोक्ताओं को राहत देना था. साथ ही तेल कंपनियों से कहा गया था कि टैक्स में कटौती का फायदा आम लोगों तक पहुंचाया जाए.
अब बदल सकते हैं हालात
लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं. किसानों को बेहतर दाम दिलाने और आयात कम करने के लिए सरकार फिर से आयात शुल्क बढ़ाने पर विचार कर रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आयात ड्यूटी बढ़ती है तो घरेलू बाजार में खाने के तेल की कीमतों पर असर पड़ सकता है. हालांकि इससे देश के तेलहन किसानों को फायदा मिलने की उम्मीद भी जताई जा रही है.
सरकार जल्द ले सकती है फैसला
फिलहाल सरकार इस पूरे मामले पर विचार कर रही है और उद्योग से जुड़े पक्षों के साथ चर्चा जारी है. अगर आयात शुल्क बढ़ाया जाता है तो आने वाले समय में खाद्य तेल बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. साथ ही यह फैसला किसानों, उपभोक्ताओं और व्यापारियों तीनों पर असर डाल सकता है.