Edible oil prices: देश में खाने के तेल की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर लोगों की चिंता बढ़ा दी है. रसोई का बजट संभालना पहले ही मुश्किल हो रहा था, और अब पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर सीधे खाद्य तेल बाजार पर दिखाई देने लगा है. पाम ऑयल से लेकर सोयाबीन तेल तक, लगभग सभी प्रमुख खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी आई है. सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने हालात को देखते हुए केंद्र सरकार से मदद की मांग की है.
उद्योग संगठन का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय हालात, महंगी समुद्री ढुलाई, बढ़े हुए बीमा खर्च और रुपये की कमजोरी ने खाद्य तेल आयात को काफी महंगा बना दिया है. इसका असर अब आम लोगों की थाली तक पहुंचने लगा है.
युद्ध और तनाव का असर बाजार पर साफ दिख रहा
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष के बाद वैश्विक बाजार में काफी अस्थिरता देखने को मिली है. भारत खाद्य तेल के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में थोड़ी सी हलचल भी यहां कीमतों को प्रभावित कर देती है.
SEA के अनुसार पाम ऑयल की लैंडेड कॉस्ट 105 डॉलर प्रति टन से ज्यादा बढ़ गई है, जबकि सोयाबीन तेल करीब 80 डॉलर प्रति टन महंगा हो चुका है यानी जो तेल पहले कम कीमत पर भारत पहुंच रहा था, अब उसकी लागत काफी बढ़ चुकी है. यही वजह है कि घरेलू बाजार में भी खाने के तेल महंगे हो रहे हैं.
पाम ऑयल और सोयाबीन तेल में बड़ा उछाल
रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई में RBD पामोलीन की कीमत 1115 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 1235 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई. वहीं क्रूड पाम ऑयल 1150 डॉलर से बढ़कर 1255 डॉलर प्रति टन हो गया है. सोयाबीन तेल की कीमतों में भी अच्छी-खासी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इसकी कीमत 1230 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 1310 डॉलर प्रति टन तक पहुंच चुकी है.
समुद्री माल ढुलाई ने बढ़ाई मुश्किल
खाद्य तेल उद्योग की सबसे बड़ी परेशानी इस समय समुद्री माल ढुलाई की बढ़ती लागत बन गई है. युद्ध और वैश्विक अस्थिरता की वजह से जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है और कई समुद्री रूट्स पर खर्च लगभग दोगुना हो गया है. उदाहरण के तौर पर अर्जेंटीना से भारत आने वाले कार्गो का फ्रेट पहले 70 से 75 डॉलर प्रति टन था, जो अब बढ़कर 140 से 145 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया है. रूस से आने वाले माल की ढुलाई भी काफी महंगी हो गई है. वहीं मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों से आने वाले पाम ऑयल की लागत में भी तेजी आई है.
बीमा और पैकेजिंग खर्च ने भी बढ़ाया दबाव
सिर्फ माल ढुलाई ही नहीं, बल्कि समुद्री बीमा भी अब पहले से काफी महंगा हो गया है. युद्ध जोखिम बढ़ने के कारण कंपनियों को ज्यादा प्रीमियम देना पड़ रहा है. इसके अलावा पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल जैसे पॉलीथीन और पॉलीप्रोपाइलीन की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इनकी कीमतों में 50 से 60 प्रतिशत तक का उछाल आया है. खाद्य तेल कंपनियों का कहना है कि बढ़ती लागत का असर उनके मुनाफे और बाजार कीमत दोनों पर पड़ रहा है.
रुपये की कमजोरी ने और बढ़ाई परेशानी
डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की गिरावट भी उद्योग के लिए बड़ी चिंता बन गई है. रिपोर्ट के अनुसार रुपया करीब 4.8 प्रतिशत कमजोर हुआ है. कुछ समय पहले जहां एक डॉलर लगभग 91 रुपये के आसपास था, वहीं अब यह बढ़कर 95 रुपये से ज्यादा हो गया है. इससे आयात बिल और ज्यादा बढ़ गया है. जब कंपनियों को डॉलर में ज्यादा भुगतान करना पड़ता है, तो उसका असर आखिरकार बाजार में तेल की कीमतों पर दिखाई देता है.
आम लोगों की जेब पर असर
खाने के तेल की कीमत बढ़ने का सबसे ज्यादा असर आम परिवारों पर पड़ता है. रसोई का खर्च पहले से ही बढ़ा हुआ है और अब तेल महंगा होने से लोगों का मासिक बजट और बिगड़ सकता है. शहरी इलाकों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग महंगाई को लेकर चिंता जता रहे हैं. कई घरों में लोग तेल की खपत कम करने की कोशिश कर रहे हैं.
सरकार से राहत की उम्मीद
SEA ने सरकार से मांग की है कि खाद्य तेल आयात पर फ्रेट सब्सिडी दी जाए ताकि लागत कम हो सके. इसके अलावा बंदरगाहों पर खाद्य तेल वाले जहाजों को प्राथमिकता देने की भी अपील की गई है. उद्योग संगठन का कहना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो घरेलू बाजार में कीमतों पर और दबाव बढ़ सकता है.
क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में हालात सामान्य होते हैं तो कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है. लेकिन फिलहाल वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है. भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है. आने वाले समय में सरकार की नीतियां और वैश्विक हालात तय करेंगे कि खाने के तेल की कीमतें किस दिशा में जाएंगी. फिलहाल लोगों की नजर इस बात पर टिकी हुई है कि बाजार कब स्थिर होगा और रसोई का बढ़ता खर्च कब कम होगा.