Tinda Ki Kheti: फरवरी की यह सब्जी करेगी कमाल, 45 दिन में तैयार देसी टिंडा से होगी मोटी कमाई
कई इलाकों में किसान अब फरवरी में देसी टिंडा की खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. वजह साफ है यह फसल करीब 45 से 50 दिन में तैयार हो जाती है और उस समय बाजार में इसकी आवक सीमित रहती है. जब मंडी में सब्जी कम होती है, तो दाम अपने आप बढ़ जाते हैं. यही कारण है कि सही समय पर देसी टिंडा लगाने वाले किसानों को बढ़िया मुनाफा मिल रहा है.
Round gourd cultivation: खेती में आज के समय में वही किसान टिक पा रहा है, जो समय के साथ अपनी फसल और सोच दोनों बदल रहा है. लंबे समय वाली फसलों में लागत ज्यादा होती है और जोखिम भी बना रहता है. ऐसे में फरवरी का महीना उन किसानों के लिए खास मौका लेकर आता है, जो कम समय में तैयार होने वाली सब्जी लगाकर जल्दी कमाई करना चाहते हैं. देसी टिंडा ऐसी ही एक सब्जी है, जो कम खर्च में उगती है, जल्दी तैयार होती है और बाजार में अच्छे दाम दिलाने की क्षमता रखती है.
कई इलाकों में किसान अब फरवरी में देसी टिंडा की खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. वजह साफ है यह फसल करीब 45 से 50 दिन में तैयार हो जाती है और उस समय बाजार में इसकी आवक सीमित रहती है. जब मंडी में सब्जी कम होती है, तो दाम अपने आप बढ़ जाते हैं. यही कारण है कि सही समय पर देसी टिंडा लगाने वाले किसानों को बढ़िया मुनाफा मिल रहा है.
फरवरी में देसी टिंडा क्यों है फायदे का सौदा
फरवरी का मौसम देसी टिंडा के लिए काफी अनुकूल माना जाता है. इस समय ठंड धीरे-धीरे कम होने लगती है और धूप बढ़ने लगती है, जिससे पौधों की बढ़वार अच्छी होती है. सबसे बड़ी बात यह है कि इस मौसम में कीट और बीमारियों का प्रकोप भी सीमित रहता है, जिससे दवाइयों पर ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता.
अगर फरवरी के पहले पखवाड़े में इसकी बुवाई कर दी जाए, तो मार्च के आखिर या अप्रैल की शुरुआत में तुड़ाई शुरू हो जाती है. इस समय मंडी में देसी टिंडा के भाव 40 से 60 रुपये प्रति किलो तक मिल सकते हैं. बाद में भी इसके दाम 30 से 40 रुपये प्रति किलो के आसपास बने रहते हैं, जो किसानों के लिए फायदेमंद हैं.
कम लागत में जल्दी तैयार होने वाली फसल
देसी टिंडा की खेती की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसमें लागत कम आती है. बीज, खाद और सिंचाई पर ज्यादा खर्च नहीं होता. साथ ही यह फसल तेज धूप और बढ़ते तापमान को भी सहन कर लेती है, जिससे उत्पादन पर ज्यादा असर नहीं पड़ता. जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वैसे-वैसे टिंडा की बेलें तेजी से फैलती हैं और लगातार फल देना शुरू कर देती हैं.
देसी टिंडा की अच्छी किस्में
अच्छी पैदावार के लिए सही किस्म का चुनाव बहुत जरूरी है. किसान अपने क्षेत्र और बाजार की मांग के अनुसार किस्म चुनें तो मुनाफा और बढ़ सकता है. कई किसान देसी किस्मों को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि बाजार में इनकी मांग ज्यादा रहती है. नरेश टिंडा, नामधारी टिंडा और भठिंडा जैसी किस्में अच्छी पैदावार और बेहतर गुणवत्ता के लिए जानी जाती हैं. ये बीज नजदीकी कृषि भंडार या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आसानी से मिल जाते हैं.
खेत की तैयारी और बुवाई का तरीका
देसी टिंडा की खेती शुरू करने से पहले खेत की अच्छी तैयारी जरूरी है. फरवरी में बुवाई से पहले खेत की दो से तीन बार जुताई करें, ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए. अंतिम जुताई के समय सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधे मजबूत बनते हैं.
ठंड के कारण बीजों के अंकुरण में देरी न हो, इसके लिए बुवाई से पहले बीजों को 12 से 24 घंटे गुनगुने पानी में भिगो देना चाहिए. इससे अंकुरण जल्दी और एकसार होता है. खेत में लगभग 5 फीट की दूरी पर बेड बनाएं और एक-एक फीट की दूरी पर बीज बोएं. बीज को बहुत गहराई में न दबाएं, हल्की मिट्टी से ढकना ही काफी होता है.
सिंचाई और देखभाल
बुवाई के बाद पहली सिंचाई तब करें, जब ज्यादातर बीज अंकुरित हो जाएं. इसके बाद 2–3 दिन के अंतर पर हल्की सिंचाई करते रहें. खेत में पानी भरने से बचें, क्योंकि इससे जड़ सड़ने का खतरा रहता है. खरपतवार नियंत्रण के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करें. कई किसान प्लास्टिक मल्च का भी इस्तेमाल करते हैं, जिससे नमी बनी रहती है और घास कम उगती है.
45 दिन में शुरू हो जाती है कमाई
देसी टिंडा की फसल करीब 45 से 50 दिन में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है. एक बार तुड़ाई शुरू होने के बाद लगातार फल मिलते रहते हैं. सही देखभाल और समय पर तुड़ाई से उत्पादन और दाम दोनों बेहतर मिलते हैं. यही वजह है कि फरवरी में देसी टिंडा की खेती आज किसानों के लिए एक स्मार्ट और फायदे का सौदा बनती जा रही है.