असम की पहाड़ियों में 180 साल बाद मिला दुर्लभ पौधा, दुनिया भर के वैज्ञानिकों की बढ़ी दिलचस्पी

Rungia mastersii: असम के दीमा हसाओ जिले की जातिंगा पहाड़ियों में वैज्ञानिकों ने करीब 180 साल बाद दुर्लभ पौधे रुंगिया मास्टर्सी (Rungia mastersii) को फिर से खोजा है. यह पौधा 1845 के बाद पहली बार जीवित अवस्था में मिला है. फिलहाल इसकी केवल करीब 40 पौधों की आबादी एक ही प्राकृतिक स्थान पर मिली है.

नोएडा | Updated On: 29 Jul, 2026 | 05:14 PM

Assam Rare Plant: प्रकृति कई बार ऐसे रहस्य अपने भीतर छिपाकर रखती है, जिनका जवाब वैज्ञानिकों को दशकों बाद मिलता है. ऐसा ही एक हैरान करने वाला मामला असम से सामने आया है. करीब 180 साल पहले दर्ज किया गया एक दुर्लभ फूल वाला पौधा रुंगिया मास्टर्सी, जिसे वैज्ञानिक लगभग लुप्त मान चुके थे, अब फिर से मिल गया है. इस खोज ने न सिर्फ वनस्पति वैज्ञानिकों को उत्साहित किया है, बल्कि जैव विविधता संरक्षण की जरूरत को भी एक बार फिर सामने ला दिया है.

असम विश्वविद्यालय (Assam University) के रिसर्चर्स ने दीमा हसाओ जिले की जातिंगा पहाड़ियों में इस दुर्लभ पौधे की फिर से पहचान की है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर समय रहते इसकी सुरक्षा नहीं की गई, तो यह पौधा दोबारा हमेशा के लिए गायब हो सकता है.

1845 में पहली बार मिला था यह पौधा

इस दुर्लभ पौधे का नाम रुंगिया मास्टर्सी (Rungia mastersii) है. इसे पहली बार साल 1845 में ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक जे. डब्ल्यू. मास्टर्स ने असम की सुंदर नदी के किनारे दर्ज किया था. इसके बाद लगभग 180 सालों तक दुनिया के किसी भी हिस्से में इसका जीवित पौधा नहीं मिला.

वनस्पति विज्ञान की दुनिया में यह पौधा सिर्फ पुराने रिकॉर्ड और एक संरक्षित नमूने तक ही सीमित रह गया था. भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI) के पास भी इसका केवल एक संरक्षित नमूना मौजूद था. इसलिए लंबे समय तक इसकी मौजूदगी को लेकर रहस्य बना रहा.

असम की पहाड़ियों में फिर मिली नई उम्मीद

असम विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ लाइफ साइंस एंड बायोइन्फॉर्मेटिक्स के रिसर्चर्स ने फील्ड सर्वे के दौरान जातिंगा पहाड़ियों में एक छोटे से जलस्रोत के पास चट्टानों की नम और छायादार दरारों में इस पौधे को देखा. इस पौधे पर हल्के हरे और सफेद रंग के फूल खिलते हैं, जिन पर बैंगनी रंग की महीन डिजाइन दिखाई देती है. यह पौधा सिर्फ नम, ठंडी और छायादार जगहों पर ही उगता है. यानी इसके जीवित रहने के लिए बहुत खास तरह का प्राकृतिक वातावरण जरूरी होता है.

बेहद कम संख्या में मिले पौधे

इस खोज की खुशी के साथ वैज्ञानिकों की चिंता भी बढ़ गई है. अब तक केवल एक ही प्राकृतिक स्थान पर इस पौधे की मौजूदगी मिली है, जहां इसकी करीब 40 पौधों की आबादी दर्ज की गई है.

रिसर्चर्स के अनुसार, इतनी कम संख्या और सीमित क्षेत्र में होने के कारण यह पौधा किसी भी छोटे बदलाव से प्रभावित हो सकता है. बारिश के पानी का बहाव बदलना, लैंडस्लाइड, जंगलों की कटाई, मानव गतिविधियां या प्राकृतिक आवास का नुकसान इसके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं.

संरक्षण की जरूरत पर वैज्ञानिकों का जोर

रिसर्च को लीड करने वाले प्रोफेसर देबज्योति भट्टाचार्य और उनकी टीम का कहना है कि, इस पौधे का संरक्षण बेहद जरूरी है. फिलहाल IUCN रेड लिस्ट में इस प्रजाति का संरक्षण स्तर तय नहीं किया गया है, लेकिन फील्ड स्टडी बताती है कि इसकी स्थिति गंभीर हो सकती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर जल्द संरक्षण के कदम नहीं उठाए गए, तो करीब दो शताब्दियों तक छिपा रहा यह पौधा फिर से हमेशा के लिए गायब हो सकता है.

जैव विविधता के लिए अहम खोज

यह खोज सिर्फ एक दुर्लभ पौधे के मिलने तक सीमित नहीं है. इससे यह भी साबित होता है कि भारत के जंगलों और पहाड़ी इलाकों में आज भी कई ऐसी प्रजातियां मौजूद हो सकती हैं, जिनके बारे में वैज्ञानिकों को पूरी जानकारी नहीं है. रुंगिया मास्टर्सी की दोबारा खोज अब वैज्ञानिकों को इसके जीवन चक्र, पारिस्थितिकी और पर्यावरण में इसकी भूमिका को समझने का मौका देगी. साथ ही यह खोज इस बात का भी संदेश देती है कि जैव विविधता का संरक्षण सिर्फ पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बेहद जरूरी है.

Published: 28 Jul, 2026 | 10:32 PM

Topics: