हर बार ’87 पैसे’ ही क्यों बढ़ रहा पेट्रोल का दाम? इसके पीछे है तेल कंपनियों का नया फॉर्मूला

अगर तेल कंपनियां एक ही बार में पेट्रोल या डीजल के दाम 5 से 10 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दें, तो इसका असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर तुरंत दिखाई देगा. ट्रांसपोर्ट महंगा हो जाएगा, जिससे सब्जियां, दूध, राशन और रोजमर्रा की चीजों के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं. इसी वजह से कंपनियां “कैलिब्रेटेड प्राइसिंग” यानी धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाने की रणनीति अपनाती हैं.

नई दिल्ली | Published: 23 May, 2026 | 01:30 PM

petrol price hike: देश में पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है. पिछले 10 दिनों में तीन बार ईंधन के दाम बढ़ चुके हैं. ताजा बढ़ोतरी में पेट्रोल 87 पैसे प्रति लीटर और डीजल 91 पैसे प्रति लीटर महंगा हुआ है. लेकिन लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर पेट्रोल के दाम बार-बार 87 पैसे ही क्यों बढ़ाए जा रहे हैं? क्या इसके पीछे कोई खास वजह है या यह सिर्फ संयोग है?

असल में इसके पीछे तेल कंपनियों की एक सोची-समझी रणनीति और अंतरराष्ट्रीय बाजार का गणित काम करता है. विशेषज्ञों का कहना है कि तेल कंपनियां अचानक बड़े झटके देने के बजाय धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाने का तरीका अपनाती हैं ताकि बाजार में घबराहट और महंगाई का असर एकदम से न बढ़े.

अचानक बड़ा झटका देने से बच रही कंपनियां

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर तेल कंपनियां एक ही बार में पेट्रोल या डीजल के दाम 5 से 10 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दें, तो इसका असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर तुरंत दिखाई देगा. ट्रांसपोर्ट महंगा हो जाएगा, जिससे सब्जियां, दूध, राशन और रोजमर्रा की चीजों के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं. इसी वजह से कंपनियां “कैलिब्रेटेड प्राइसिंग” यानी धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाने की रणनीति अपनाती हैं. छोटी-छोटी बढ़ोतरी से लोगों पर अचानक ज्यादा बोझ नहीं पड़ता और बाजार भी धीरे-धीरे नई कीमतों को स्वीकार कर लेता है.

मिडिल ईस्ट संकट से बढ़ा दबाव

इस समय पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर पूरी दुनिया के तेल बाजार पर दिखाई दे रहा है. कई देशों के बीच संघर्ष और सप्लाई रूट पर खतरे के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है.

भारत अपनी जरूरत का करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होते ही उसका असर सीधे भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ता है. तेल कंपनियों को अब ज्यादा कीमत पर कच्चा तेल खरीदना पड़ रहा है. इसी बढ़ती लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों से वसूला जा रहा है.

डायनेमिक प्राइसिंग सिस्टम कैसे करता है काम?

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें रोजाना तय होती हैं. इसे डायनेमिक प्राइसिंग सिस्टम कहा जाता है. इस व्यवस्था में कई चीजों को ध्यान में रखा जाता है. सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत देखी जाती है. इसके बाद डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति, रिफाइनिंग लागत, ट्रांसपोर्ट खर्च और टैक्स जोड़े जाते हैं. इन सभी गणनाओं के बाद अंतिम कीमत तय होती है.

इसी वजह से कई बार कीमतें 87 पैसे, 91 पैसे या 73 पैसे जैसी सटीक संख्या में बढ़ती हैं. यह कोई तय आंकड़ा नहीं होता, बल्कि बाजार की स्थिति और लागत के हिसाब से निकलने वाला अंतिम मूल्य होता है.

पेट्रोल-डीजल के साथ CNG भी महंगी

पिछले कुछ दिनों में सिर्फ पेट्रोल और डीजल ही नहीं बल्कि CNG की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी हुई है. दिल्ली में CNG अब 81 रुपये प्रति किलो के पार पहुंच चुकी है. इससे ऑटो, टैक्सी और कमर्शियल वाहन चालकों की चिंता बढ़ गई है. ट्रांसपोर्ट महंगा होने से आने वाले समय में खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है.

टैक्स भी बढ़ा रहे बोझ

विशेषज्ञों का कहना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में टैक्स की भी बड़ी भूमिका होती है. दिल्ली में पेट्रोल की बेस कीमत करीब 66 रुपये के आसपास है, लेकिन उस पर एक्साइज ड्यूटी, VAT और डीलर कमीशन जुड़ने के बाद अंतिम कीमत लगभग 100 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाती है.

इसी कारण अब पेट्रोल और डीजल को GST के दायरे में लाने की मांग भी तेज हो गई है. व्यापारिक संगठनों का कहना है कि अगर ऐसा होता है तो लोगों को कुछ राहत मिल सकती है.

आम लोगों की बढ़ी चिंता

लगातार बढ़ती ईंधन कीमतों का असर अब हर वर्ग पर पड़ रहा है. निजी वाहन चलाने वालों से लेकर ट्रांसपोर्ट कारोबार और किसानों तक सभी की लागत बढ़ रही है.

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