कचरा नहीं, कमाई का खजाना! गोबर-पराली से बनेगी गैस, घटेगा विदेशी गैस का भरोसा
भारत में गोबर, पराली और खेती के कचरे से CBG बनाने की बड़ी क्षमता है. हर साल 47.2 करोड़ टन कच्चे माल से 6.2 करोड़ टन CBG तैयार हो सकती है. इससे पराली जलाने, कचरा प्रबंधन और विदेशी गैस पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है.
भारत में गोबर, पराली और खेती से निकलने वाले दूसरे कचरे से कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) बनाने की बड़ी संभावना है. इक्विरस की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर साल करीब 47.2 करोड़ मीट्रिक टन ऐसा कच्चा माल उपलब्ध हो सकता है, जिसका इस्तेमाल बायोगैस उत्पादन में किया जा सकता है. इससे करीब 6.2 करोड़ मीट्रिक टन CBG तैयार करने की क्षमता है. हालांकि, कच्चे माल को एक जगह जुटाना, उसका परिवहन और लंबे समय तक भंडारण करना इस क्षेत्र की बड़ी चुनौतियां हैं.
गोबर से 2.5 करोड़ टन CBG बनाने की क्षमता
रिपोर्ट के अनुसार, गोबर CBG उत्पादन के प्रमुख स्रोतों में शामिल है. भारत में हर साल करीब 19 करोड़ मीट्रिक टन गोबर उपलब्ध होता है. इससे लगभग 2.5 करोड़ मीट्रिक टन गैस तैयार की जा सकती है. लेकिन पूरे गोबर को इकट्ठा करना व्यावहारिक नहीं है. अनुमान है कि कुल उपलब्ध गोबर में से करीब 15 प्रतिशत ही प्रभावी तरीके से जमा किया जा सकता है. इसके लिए गांवों के समूह बनाकर एक सप्लाई चेन तैयार करने की जरूरत होगी. गोबर की अधिक उपलब्धता वाले आसपास के गांवों को जोड़कर उसे बायोगैस प्लांट तक पहुंचाया जा सकता है. हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों के हर गांव को इस व्यवस्था से जोड़ना आसान नहीं होगा.
धान, गेहूं और गन्ने के कचरे से भी बड़ा उत्पादन
खेती से निकलने वाला कचरा CBG के लिए सबसे बड़े कच्चे माल में से एक बन सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, केवल धान, गेहूं और गन्ने से निकलने वाले अवशेषों से करीब 15 करोड़ मीट्रिक टन कच्चा माल मिल सकता है. इससे लगभग 2 करोड़ टन CBG तैयार करने की क्षमता है. लेकिन फसल कटने के बाद अचानक बड़ी मात्रा में निकलने वाले इस कचरे को इकट्ठा करना और सुरक्षित रखना आसान नहीं है. खासकर पराली के मामले में तेज और मजबूत सप्लाई चेन की जरूरत होगी.
शहरों के कचरे और चीनी मिलों से भी बनेगी गैस
CBG उत्पादन में शहरी कचरा, सीवेज और चीनी मिलों से निकलने वाला कचरा भी अहम भूमिका निभा सकता है. करीब 6.2 करोड़ टन शहरी ठोस कचरे से लगभग 50 लाख टन CBG बनाने की क्षमता बताई गई है. शहरों के गीले कचरे और भोजन में करीब 50-55 प्रतिशत हिस्सा ही बायोडिग्रेडेबल होता है. वहीं, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले करीब 5 करोड़ टन बायोमास से लगभग 1 करोड़ टन गैस बनाई जा सकती है. चीनी मिलों से निकलने वाली 2 करोड़ टन प्रेस मड से भी करीब 2 करोड़ टन CBG बनाने की क्षमता है. प्रेस मड का फायदा यह है कि यह बड़ी मात्रा में एक ही जगह मिल जाता है और इसे गैस बनाने से पहले किसी खास प्री-ट्रीटमेंट की जरूरत नहीं पड़ती.
पराली जलाने से राहत, मिट्टी को भी मिलेगा फायदा
CBG उत्पादन बढ़ने से पर्यावरण और खेती दोनों को फायदा मिल सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर साल करीब 87 मिलियन टन फसल अवशेष यानी पराली जलाई जाती है. अगर इस कचरे का इस्तेमाल CBG बनाने में किया जाए, तो प्रति टन कचरे पर करीब 0.8 से 1.2 टन कार्बन उत्सर्जन को रोका जा सकता है. देश में रोजाना निकलने वाले 1.70 लाख टन शहरी ठोस कचरे में से केवल 0.92 लाख टन का ही उचित निपटारा हो पाता है. CBG प्लांटों की मदद से 2,400 से ज्यादा कूड़ाघरों से निकलने वाली हानिकारक मीथेन को कम किया जा सकता है.
गैस बनाने के बाद बचा पदार्थ फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर के रूप में जैविक खाद का काम करता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिल सकती है. रिपोर्ट में वर्बियो संगरूर प्लांट का उदाहरण दिया गया है, जहां रोजाना 33 टन CBG और 600 टन जैविक खाद तैयार होती है. इसके अलावा CBG के बड़े पैमाने पर उत्पादन से आयातित गैस पर निर्भरता भी घट सकती है. PNGRB के अनुमानों के अनुसार, 472 मिलियन टन कच्चे माल से करीब 230 MMSCMD बायोगैस उत्पादन की क्षमता है. इससे भारत की ऊर्जा जरूरतों को घरेलू संसाधनों से पूरा करने की दिशा में बड़ी मदद मिल सकती है.