किसी ने सूखी जमीन पर उगाया जंगल, तो किसी ने बदली किसानों की तकदीर, जानें पद्मश्री पाने वाले हीरोज की कहानी

Padma Awards 2026: खेती, पर्यावरण और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कई लोग ऐसे होते हैं, जो बिना ज्यादा चर्चा में आए चुपचाप समाज के लिए बड़ा काम करते रहते हैं. किसी ने बंजर जमीन को हरा-भरा जंगल बना दिया, तो किसी ने नई खेती तकनीकों से किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद की. वहीं कुछ लोगों ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और पर्यावरण बचाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दी. ऐसे ही कई प्रेरणादायक लोगों को इस बार पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया गया है.

Isha Gupta
नोएडा | Updated On: 26 May, 2026 | 12:18 PM
1 / 6डॉ. अशोक कुमार सिंह ने कृषि अनुसंधान और बासमती धान की नई किस्में विकसित कर किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने 27 चावल किस्में विकसित कीं, जिनमें 11 बासमती किस्में शामिल हैं. उनकी तैयार की गई कम अवधि, अधिक उपज और जलवायु-सहिष्णु किस्मों ने भारत के 90 फीसदी से अधिक बासमती क्षेत्र को कवर किया और देश को हजारों करोड़ रुपये की विदेशी कमाई दिलाई.

डॉ. अशोक कुमार सिंह ने कृषि अनुसंधान और बासमती धान की नई किस्में विकसित कर किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने 27 चावल किस्में विकसित कीं, जिनमें 11 बासमती किस्में शामिल हैं. उनकी तैयार की गई कम अवधि, अधिक उपज और जलवायु-सहिष्णु किस्मों ने भारत के 90 फीसदी से अधिक बासमती क्षेत्र को कवर किया और देश को हजारों करोड़ रुपये की विदेशी कमाई दिलाई.

2 / 6देवकी अम्मा को ‘फॉरेस्ट ग्रैंडमा’ के नाम से जाना जाता है. उन्होंने केरल में अपनी 5 एकड़ बंजर तटीय जमीन को ‘कोल्लकल थपोवनम’ नाम के घने जंगल में बदल दिया. आज वहां 3,000 से ज्यादा पेड़ और दुर्लभ औषधीय पौधे मौजूद हैं. जैविक खाद, जल प्रबंधन और प्राकृतिक खेती के जरिए उन्होंने पर्यावरण संरक्षण की अनोखी मिसाल पेश की.

देवकी अम्मा को ‘फॉरेस्ट ग्रैंडमा’ के नाम से जाना जाता है. उन्होंने केरल में अपनी 5 एकड़ बंजर तटीय जमीन को ‘कोल्लकल थपोवनम’ नाम के घने जंगल में बदल दिया. आज वहां 3,000 से ज्यादा पेड़ और दुर्लभ औषधीय पौधे मौजूद हैं. जैविक खाद, जल प्रबंधन और प्राकृतिक खेती के जरिए उन्होंने पर्यावरण संरक्षण की अनोखी मिसाल पेश की.

3 / 6डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी को ‘गांव पुरुष’ और ‘किसान मित्र’ के नाम से जाना जाता था. उन्होंने 34 वर्षों तक गांवों में रहकर किसानों की आय और खेती की उत्पादकता बढ़ाने पर काम किया. बिहार में उन्होंने मछली आधारित खेती मॉडल को बढ़ावा दिया और मक्का उत्पादन को दोगुना करने में अहम योगदान दिया.

डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी को ‘गांव पुरुष’ और ‘किसान मित्र’ के नाम से जाना जाता था. उन्होंने 34 वर्षों तक गांवों में रहकर किसानों की आय और खेती की उत्पादकता बढ़ाने पर काम किया. बिहार में उन्होंने मछली आधारित खेती मॉडल को बढ़ावा दिया और मक्का उत्पादन को दोगुना करने में अहम योगदान दिया.

4 / 6डॉ. सुशीलम्मा ने पांच दशकों तक जनजातीय समुदायों और ग्रामीण महिलाओं के उत्थान के लिए काम किया. उन्होंने महिला स्व-सहायता समूह, माइक्रोक्रेडिट योजनाएं और टिकाऊ खेती मॉडल शुरू किए. उनके नेतृत्व में कर्नाटक में 40 लाख से ज्यादा पौधे लगाए गए, जिसने पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा दी.

डॉ. सुशीलम्मा ने पांच दशकों तक जनजातीय समुदायों और ग्रामीण महिलाओं के उत्थान के लिए काम किया. उन्होंने महिला स्व-सहायता समूह, माइक्रोक्रेडिट योजनाएं और टिकाऊ खेती मॉडल शुरू किए. उनके नेतृत्व में कर्नाटक में 40 लाख से ज्यादा पौधे लगाए गए, जिसने पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा दी.

5 / 6हैली वार मेघालय के जाने-माने पर्यावरण प्रेमी हैं. उन्होंने पेड़ों की जड़ों से बने खास प्राकृतिक पुलों को बचाने और लोगों तक उनकी अहमियत पहुंचाने का काम किया है. वे पिछले करीब 50 सालों से पर्यावरण बचाने, स्थानीय परंपराओं को संभालने और प्रकृति से जुड़े पर्यटन को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं.

हैली वार मेघालय के जाने-माने पर्यावरण प्रेमी हैं. उन्होंने पेड़ों की जड़ों से बने खास प्राकृतिक पुलों को बचाने और लोगों तक उनकी अहमियत पहुंचाने का काम किया है. वे पिछले करीब 50 सालों से पर्यावरण बचाने, स्थानीय परंपराओं को संभालने और प्रकृति से जुड़े पर्यटन को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं.

6 / 6श्रीरंग देवबा लाड को कपास तकनीक का जनक कहा जाता है. उनकी विकसित तकनीक से कपास और ज्वार की पैदावार 5–6 क्विंटल से बढ़कर 25–30 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गई. उनकी तकनीकों को केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान (CICR) ने भी मान्यता दी, जिससे लाखों किसानों को बेहतर उत्पादन और ज्यादा मुनाफा मिला.

श्रीरंग देवबा लाड को कपास तकनीक का जनक कहा जाता है. उनकी विकसित तकनीक से कपास और ज्वार की पैदावार 5–6 क्विंटल से बढ़कर 25–30 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गई. उनकी तकनीकों को केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान (CICR) ने भी मान्यता दी, जिससे लाखों किसानों को बेहतर उत्पादन और ज्यादा मुनाफा मिला.

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Published: 26 May, 2026 | 12:18 PM

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