PF को लेकर बदल गए हैं नियम, क्या इससे नौकरी को लेकर भारतीयों का सपना भी बदलेगा…
नौकरी करने वालों के लिए पीएफ सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा कवच माना जाता है. अब केंद्र सरकार ने नई EPF Scheme, 2026 लागू कर दी है. योगदान की दर तो पहले जैसी ही रहेगी, लेकिन अब यह साफ कर दिया गया है कि कंपनी कब पीएफ देने के लिए बाध्य होगी और कब नहीं.
भारत में शायद ही कोई ऐसा मां-बाप होगा, जिसकी इच्छा न हो कि उसका बेटा या बेटी अच्छी नौकरी करे. हम किसान इंडिया की तरफ से जब भी किसानों से बात करते हैं, तो उसमें एक बात उभरकर आती है कि किसान का बेटा किसान नहीं बनना चाहता. किसान की ख्वाहिश होती है कि उसका बेटा सरकारी नौकरी करे. सरकारी न मिले, तो प्राइवेट ही सही. पहली पसंद सरकारी नौकरी होती है, लेकिन अगर वह नहीं मिलती तो किसी अच्छी निजी कंपनी में नौकरी भी परिवार के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है.
नौकरी की बात आते ही लोगों के दिमाग में सबसे पहले सैलरी आती है. नौकरी की असली ताकत केवल हर महीने मिलने वाली तनख्वाह ही नहीं होती. भविष्य की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है. यही सुरक्षा देता है प्रोविडेंट फंड यानी पीएफ. इसी में बदलाव हुए हैं, जो नौकरी को लेकर सोच को बदलने वाले साबित हो सकते हैं.
हर महीने कर्मचारी की बेसिक सैलरी से कुछ रकम (12 प्रतिशत) कटती है और कंपनी भी उतनी ही रकम (कुछ मामलों में दस फीसदी) उसके पीएफ खाते में जमा करती है. इस पर सरकार से ब्याज मिलता है, जो अभी 8.25 प्रतिशत है. वर्षों बाद यही पैसा रिटायरमेंट के समय एक बड़ी पूंजी बन जाता है. इसलिए नौकरी चुनते समय पीएफ की व्यवस्था हमेशा एक बड़ा आकर्षण रही है.
पीएफ को लेकर क्या है नया नियम
अब सरकार ने 74 साल पुराने EPF Scheme, 1952 की जगह EPF Scheme, 2026 लागू कर दी है. पहली नजर में यह बदलाव मामूली लग सकता है क्योंकि पीएफ की दर में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, लेकिन नए नियमों ने एक ऐसी बात बिल्कुल साफ कर दी है, जिसका असर आने वाले समय में लाखों कर्मचारियों पर पड़ सकता है. बल्कि नौकरी को लेकर सोच बदलने का काम भी यह नियम कर सकता है.
नई योजना के मुताबिक कर्मचारी और नियोक्ता दोनों पहले की तरह योगदान देंगे. यानी योगदान की दर में कोई बदलाव नहीं हुआ है. लेकिन अब यह एक अमाउंट के बाद कानूनन नहीं है. असल बदलाव इस बात को लेकर है कि कानूनन कंपनी की जिम्मेदारी आखिर कितनी है. आइए, समझते हैं. सरकार ने पहली बार स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अनिवार्य पीएफ योगदान केवल वैधानिक वेतन सीमा तक ही लागू होगा. फिलहाल यह सीमा 15 हजार रुपये प्रति माह है. यानी कानून के मुताबिक कर्मचारी के लिए अनिवार्य पीएफ योगदान 15 हजार रुपये का 12 प्रतिशत, यानी 1,800 रुपये प्रति माह होगा.
समझिए कैसा होगा पीएफ का हिसाब-किताब
यहीं से नया नियम महत्वपूर्ण हो जाता है. अब तक ज्यादातर कंपनियां कर्मचारियों की बेसिक सैलरी पर पीएफ जमा करती थीं. मान लीजिए किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 50 हजार रुपये है. ऐसी स्थिति में कई कंपनियां पूरे 50 हजार रुपये पर 12 प्रतिशत की दर से पीएफ जमा करती थीं. यह रकम होती है छह हजार रुपए. यानी छह हजार कर्मचारी से और छह हजार कंपनी की तरफ से. कुल 12 हजार रुपए.
नई योजना में सरकार ने साफ कर दिया है कि 1,800 रुपये से अधिक कर्मचारी जितना भी पीएफ जमा करेगा, उसे स्वैच्छिक योगदान (Voluntary Contribution) माना जाएगा. अब मामला प्रतिशत से हटाकर 1800 रुपए कर दिया गया है. यह अनिवार्य है और इसके ऊपर का योगदान स्वैच्छिक है.
इस पर कंपनी का योगदान भी कानूनन 1800 रुपए कर दिया गया है. कंपनी स्वैच्छिक रूप से इसे बढ़ा सकती है. लेकिन हम और आप जानते हैं कि स्वैच्छिक रूप से किसी को कोई ज्यादा पैसे क्यों ही देगा. यानी अगर कोई कर्मचारी अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए हर महीने 1800 रुपए से ज्यादा पीएफ जमा करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है. सरकार ने उस पर कोई रोक नहीं लगाई है. लेकिन अब कंपनी पर यह कानूनी बाध्यता नहीं होगी कि वह कर्मचारी के अतिरिक्त योगदान के बराबर पैसा भी जमा करे.
नौकरी जॉइन करते समय कंपनी की एचआर पॉलिसी देखना बेहद अहम
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सभी कंपनियां अतिरिक्त योगदान देना बंद कर देंगी. अगर किसी कंपनी की एचआर नीति या नियुक्ति पत्र में पूरे वेतन पर पीएफ देने का प्रावधान है तो वह व्यवस्था पहले की तरह जारी रह सकती है. लेकिन अब यह कानूनी अनिवार्यता नहीं बल्कि कंपनी की नीति या कर्मचारी के साथ हुए समझौते का विषय होगा.
यही वजह है कि अब नौकरी स्वीकार करने से पहले केवल सैलरी पैकेज देखना पर्याप्त नहीं होगा. कर्मचारियों को यह भी समझना होगा कि कंपनी पीएफ किस वेतन पर जमा करती है. कई बार दो कंपनियों का सालाना पैकेज बराबर होता है, लेकिन एक कंपनी पूरे वेतन पर पीएफ देती है जबकि दूसरी केवल वैधानिक सीमा तक. लंबे समय में इससे रिटायरमेंट फंड में लाखों रुपये का अंतर आ सकता है.
इसे ऐसे समझिए- अगर कर्मचारी 1,800 रुपये से अधिक PF में जमा करना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है. लेकिन कंपनी के लिए उस अतिरिक्त राशि के बराबर पैसा जमा करना अब कानूनन अनिवार्य नहीं होगा. पहले अगर 12 फीसदी के नियम से कंपनी अगर छह हजार रुपए जमा करती थी, तो अब वह सिर्फ 1800 रुपए जमा कर सकती है. सरकारी और तमाम प्राइवेट कंपनीज में यह रकम सैलरी से अलग होती थी. तो सैलरी से अलग अगर आपके खाते में छह हजार रुपए आ रहे थे, तो अब 1800 रुपए आएंगे. जिन कंपनियों में सैलरी नहीं, सीटीसी होती है, उसमें कर्मचारी को मिलने वाले पैसे (इन हैंड) बढ़ जाएंगे, लेकिन जमा रकम और उस पर मिलने वाले ब्याज पर बड़ा असर पड़ेगा.
सवाल-जवाब से समझिए कि किसे होगा फायदा, किसे नुकसान
पहला सवाल कि क्या इस नियम से कर्मचारियों का नुकसान होगा? जवाब है- हर मामले में नहीं. निर्भर करता है कि कंपनी अब तक क्या करती है और इसके बाद क्या वो अपनी एचआर पॉलिसी में बदलाव करेगी. दूसरा सवाल, क्या ज्यादा PF जमा नहीं कर सकते? जवाब है -कर सकते हैं. यदि आप रिटायरमेंट के लिए बड़ा फंड बनाना चाहते हैं तो पहले की तरह अधिक योगदान कर सकते हैं. लेकिन ध्यान रखें— उस अतिरिक्त राशि पर कंपनी की तरफ से योगदान नहीं मिलेगा. सरकार को फायदा यह होगा कि अगर कर्मचारी अपनी रकम बढ़ाता भी है, तो कंपनियां आमतौर पर अपना हिस्सा नहीं बढ़ाएंगी. यानी सरकार को ब्याज कम देना होगा. वह पैसा बाजार में आएगा.