IMD की चेतावनी: 2027 तक रह सकता है अल नीनो, मानसून और फसलों पर पड़ेगा असर
IMD ने पहले ही 2026 के लिए सामान्य से कम मानसून का अनुमान लगाया है. इस साल बारिश करीब 87 सेंटीमीटर के लंबे औसत का 92 फीसदी रहने की संभावना है, जो सामान्य से कम है. दक्षिण-पश्चिम मानसून के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में 14 से 16 मई के बीच पहुंचने की उम्मीद है. इसके बाद जून की शुरुआत में यह पूरे देश में फैलना शुरू होगा.
El nino india 2026: भारत में मौसम में लगातार बदलाव दर्ज किए जा रहे हैं. मौसम विभाग के ताजा संकेत बता रहे हैं कि अल नीनो का असर फिर से सक्रिय हो सकता है, जिससे बारिश कम हो सकती है और खेती पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. ऐसे में आने वाला खरीफ और रबी सीजन किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है, और पूरे देश के लिए यह मौसम काफी अहम रहने वाला है.
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि अल नीनो का असर अगले साल तक यानी जनवरी 2027 तक बना रह सकता है.
क्या है अल नीनो और क्यों है चिंता
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, ल नीनो एक समुद्री मौसम प्रणाली है, जिसमें प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव होता है. फिलहाल ENSO (El Niño Southern Oscillation) की स्थिति न्यूट्रल है, लेकिन धीरे-धीरे यह अल नीनो की ओर बढ़ रही है. IMD के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र के अनुसार, अगर अल नीनो पूरी तरह विकसित हो जाता है, तो यह भारतीय मानसून को कमजोर कर सकता है. हालांकि, इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) की सकारात्मक स्थिति कुछ हद तक बारिश को बढ़ाने में मदद कर सकती है, लेकिन अल नीनो का असर ज्यादा भारी पड़ सकता है.
मानसून पर असर और बारिश का अनुमान
IMD ने पहले ही 2026 के लिए सामान्य से कम मानसून का अनुमान लगाया है. इस साल बारिश करीब 87 सेंटीमीटर के लंबे औसत का 92 फीसदी रहने की संभावना है, जो सामान्य से कम है. दक्षिण-पश्चिम मानसून के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में 14 से 16 मई के बीच पहुंचने की उम्मीद है. इसके बाद जून की शुरुआत में यह पूरे देश में फैलना शुरू होगा. पिछले साल मानसून समय से पहले आ गया था, लेकिन इस बार स्थिति अलग हो सकती है और देरी या कम बारिश की संभावना जताई जा रही है.
खरीफ और रबी फसलों पर असर
भारत में खरीफ फसलों की बुवाई मानसून के साथ जून में शुरू होती है, जबकि रबी फसलों की बुवाई अक्टूबर में होती है. ऐसे में मानसून कमजोर रहने पर दोनों सीजन की खेती प्रभावित हो सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि कम बारिश की वजह से बुवाई में देरी हो सकती है और फसल की पैदावार पर भी असर पड़ सकता है.
एग्रोकेम फेडरेशन ऑफ इंडिया (ACFI) के महानिदेशक कल्याण गोस्वामी के अनुसार, अगर मई में अच्छी बारिश होती है तो यह खरीफ बुवाई के लिए फायदेमंद हो सकती है. इससे मिट्टी में नमी बनी रहेगी और किसान समय पर बुवाई शुरू कर पाएंगे, खासकर धान, दाल और तिलहन की फसल में.
गर्मी और मौसम का बदलता पैटर्न
IMD के अनुसार मई महीने में देश के कई हिस्सों में सामान्य से ज्यादा गर्मी पड़ सकती है. खासकर हिमालय के आसपास के क्षेत्र, पूर्वी तट, गुजरात और महाराष्ट्र में हीटवेव के दिन बढ़ सकते हैं. वहीं रात का तापमान भी कई हिस्सों में सामान्य से ज्यादा रहने की संभावना है. हालांकि उत्तर-पश्चिम भारत और कुछ मध्य क्षेत्रों में न्यूनतम तापमान सामान्य या थोड़ा कम रह सकता है.
बारिश के मामले में पूर्व और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है, जबकि बाकी क्षेत्रों में सामान्य या उससे अधिक बारिश की संभावना जताई गई है.
कीट और बीमारियों का खतरा
वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार खेती के सामने दोहरी चुनौती हो सकती है. एक तरफ कम बारिश और दूसरी तरफ मौसम में बदलाव के कारण कीट और बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है.
उन्होंने बताया कि सूखे के बाद अचानक नमी बढ़ने से फसलों में कई तरह की बीमारियां फैल सकती हैं. जैसे धान में ब्लास्ट और शीथ ब्लाइट, मक्का में फॉल आर्मीवॉर्म, कपास में रस चूसने वाले कीट और सोयाबीन में चारकोल रॉट जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.
वैश्विक असर और लागत में बढ़ोतरी
इस बार खेती पर अंतरराष्ट्रीय हालात का भी असर पड़ सकता है. पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण मेथनॉल, अमोनिया, एलपीजी और पेट्रोकेमिकल्स जैसे जरूरी इनपुट की सप्लाई प्रभावित हो रही है. इसका सीधा असर किसानों की लागत पर पड़ सकता है. हालांकि सरकार ने कस्टम ड्यूटी में छूट जैसे कदम उठाए हैं, ताकि जरूरी चीजें आसानी से उपलब्ध हो सकें.