भारत का ऑयलमील बना चीन की पहली पसंद, 7.79 लाख टन निर्यात का रिकॉर्ड… लेकिन आगे राह आसान नहीं

1 मार्च 2026 से चीन ने कनाडा के रेपसीड मील पर लगा 100 फीसदी टैरिफ हटा दिया है, जो 31 दिसंबर 2026 तक लागू रहेगा. इसका मतलब है कि कनाडा फिर से चीन के बाजार में वापसी कर सकता है. इससे भारतीय निर्यातकों के सामने चुनौती बढ़ सकती है.

नई दिल्ली | Published: 20 Mar, 2026 | 10:42 AM

India oilmeal exports: भारत का कृषि निर्यात लगातार मजबूत हो रहा है और इसी कड़ी में ऑयलमील (तेल बीजों से बनने वाला पशु चारा) ने इस साल एक बड़ा रिकॉर्ड बना दिया है. खास बात यह है कि चीन जैसे बड़े बाजार में भारत का दबदबा अचानक बहुत तेजी से बढ़ा है. लेकिन इस सफलता के साथ-साथ कुछ ऐसी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं, जिन पर ध्यान देना जरूरी है.

20 गुना से ज्यादा बढ़ा निर्यात

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच भारत ने चीन को 7,79,016 टन ऑयलमील निर्यात किया है. पिछले साल इसी अवधि में यह सिर्फ 38,240 टन था. यानी एक साल में 20 गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है, जो अपने आप में बड़ी उपलब्धि है.

इस निर्यात में सबसे बड़ा हिस्सा रेपसीड मील (सरसों खली) का रहा है. चीन ने इस दौरान भारत से 7,71,435 टन रेपसीड मील और 7,581 टन कैस्टरसीड मील खरीदा है. इससे साफ है कि चीन में भारतीय ऑयलमील की मांग तेजी से बढ़ी है.

सस्ती कीमत बनी सबसे बड़ा कारण

इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण भारतीय ऑयलमील की कम कीमत है. भारत का रेपसीड मील करीब 225 डॉलर प्रति टन (कांडला बंदरगाह से) मिल रहा है, जबकि यूरोप में यही करीब 297 डॉलर प्रति टन है. कीमत में इतना अंतर होने की वजह से चीन के खरीदार भारत की तरफ ज्यादा आकर्षित हुए. सस्ती कीमत के साथ-साथ भारत की लगातार सप्लाई ने भी बाजार में भरोसा बनाया, जिससे ऑर्डर तेजी से बढ़े.

चीन के फैसले से मिला बड़ा मौका

मार्च 2025 में चीन ने कनाडा के रेपसीड मील और तेल पर 100 फीसदी टैरिफ लगा दिया था. यह कदम कनाडा द्वारा चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर टैक्स लगाने के जवाब में उठाया गया था. इस फैसले के बाद कनाडा से आयात बहुत महंगा हो गया और चीन को नए सप्लायर की जरूरत पड़ी. इस स्थिति का सबसे ज्यादा फायदा भारत को मिला और उसने तेजी से इस खाली जगह को भर दिया.

अब बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. 1 मार्च 2026 से चीन ने कनाडा के रेपसीड मील पर लगा 100 फीसदी टैरिफ हटा दिया है, जो 31 दिसंबर 2026 तक लागू रहेगा. इसका मतलब है कि कनाडा फिर से चीन के बाजार में वापसी कर सकता है. इससे भारतीय निर्यातकों के सामने चुनौती बढ़ सकती है, क्योंकि अब उन्हें पहले से ज्यादा प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा.

कुल निर्यात में आई गिरावट

जहां चीन को निर्यात तेजी से बढ़ा है, वहीं कुल ऑयलमील निर्यात में गिरावट देखने को मिली है. फरवरी 2026 में भारत का कुल निर्यात 22 फीसदी घटकर 2,57,961 टन रह गया, जबकि पिछले साल इसी महीने यह 3,30,319 टन था. पूरे वित्त वर्ष (अप्रैल से फरवरी) में भी कुल निर्यात 11 फीसदी घटकर 34,93,823 टन रह गया, जो पिछले साल 39,33,349 टन था.

वैश्विक तनाव का भी असर

इस गिरावट की एक बड़ी वजह वैश्विक हालात भी हैं. अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण पश्चिम एशिया और यूरोप में निर्यात प्रभावित हुआ है. भारत का करीब 20 फीसदी ऑयलमील निर्यात पश्चिम एशिया और 15 फीसदी यूरोप जाता है. लेकिन अब शिपिंग कंपनियां रेड सी और होरमुज जैसे रास्तों से बच रही हैं, जिससे सप्लाई में देरी हो रही है और लागत भी बढ़ गई है. अब जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है, जिससे 10 से 15 दिन ज्यादा लग रहे हैं और कंटेनर की कमी भी देखने को मिल रही है.

वहीं अभी के हालात बताते हैं कि भारत के लिए यह समय मौका भी है और चुनौती भी. एक तरफ चीन जैसे बड़े बाजार में भारत की पकड़ मजबूत हुई है, तो दूसरी तरफ प्रतिस्पर्धा और वैश्विक समस्याएं बढ़ रही हैं. अगर भारत को इस मौके का पूरा फायदा उठाना है, तो उसे अपनी कीमतें प्रतिस्पर्धी रखनी होंगी, सप्लाई मजबूत बनाए रखनी होगी और नए बाजारों की तलाश करनी होगी.

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